
(डॉ. सीमा दाधीच)
गणगौर पर्व आस्था और समृद्धि के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। महिलाओं द्वारा यह पर्व सुख सौभाग्य की कामना के साथ गोरी पूजन के रूप में मनाया जाने वाला यह त्यौहार सोलह दिन माता गौरी की प्रतीक गणगौर की पूजन के साथ शुरू होता। धुलंडी से शुरू होकर 16दिन बाद गौरी पूजन यानी गणगौर के दिन यह पर्व भारतीय महिलाओं द्वारा सुखी दांपत्य जीवन के साथ ही परिवार की मंगलकामना के लिए मनाया जाता है। इस पर्व को विवाहित और कुंवारी कन्याओं द्वारा सौभाग्य की देवी पार्वती की आराधना के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व को महिलाओं के लिए विशेष उत्साह के रूप में माना गया है। भारतीय नारी को त्याग, तपस्या और समर्पण की मूर्ति के रूप में माना गया है। इसी लिए गणगौर पर्व को सुखी दाम्पत्य जीवन जीने की राह माना गया है। गणगौर राजस्थान और मध्य प्रदेश के साथ भारत के कुछ हिस्सों में मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्योहार है,जो चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए समर्पित है।
16 दिनों तक चलने वाले इस पर्व की मान्यता है की माता पार्वती ने शिवजी को पति रूप में पानी के लिए 15 दिन तपस्या के बाद 16 वे दिन उन्हें मिली थी। अन्य कथा के अनुसार पार्वती जी होली के बाद अपने पीहर आते हैं और 16 से 18 दिन बाद शिव उन्हें लेने आते हैं लम्बे समय बाद पुनर्मिलन का प्रतीक भी है जिसे महिलाएं सौभाग्य, अखंड सुहाग और समृद्धि के लिए व्रत के साथ ईशर गणगौर की पूजा करती हैं। गणगौर दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है गण जो भगवान शिव को और गौर जो देवी पार्वती को दर्शाता है। यह त्यौहार युगल का सम्मान करता है और प्रेम,वैवाहिक निष्ठा और समृद्धि का उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
इस त्यौहार में देवी गौरी और भगवान शिव की पूजा अर्चना कर कुंवारी लड़कियां अच्छे वर की कामना करती हैं और महिलाओं द्वारा अपने पति के स्नेह और लम्बी उम्र की कामना की जाती है इसमें दूर्वा से पूजन का विधान है दूर्वा गणपति को बहुत प्रिय है और हमारे देश में सबसे पहले गणपति की पूजा की जाती है जिससे विघ्न और बाधा दूर हो जाती हैं दूर्वा शीतलता का भी प्रतीक है इसलिए महिलाओं द्वारा दूर्वा से पूजन का विशेष महत्व है। दूर्वा में दिव्य ऊर्जा को आकर्षित करने की क्षमता होती है जो पूजा स्थान को शुद्ध करता है। यह त्यौहार होलिका दहन के दूसरे दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल तृतीया तक, 18 दिनों तक चलने वाला त्योहार है। यह माना जाता है की गणगौर के दिन माता पार्वती शिव के साथ कैलाश लौटते हैं।
महिलाएं इस दिन सोलह सिंगार करके पार्वती और शिवजी की मूर्तियां बनाकर पूजन करते हैं गणगौर के दिन मेहंदी लगाना, गीत गाना और व्रत रखना शुभ माना जाता है। पूजन के बाद औरतें पार्वती की मूर्तियों को तालाब में या कुएं में विसर्जित करती हैं मान्यता है की देवी गोरी अपने पति के पास जा रही है। महिलाएं गीत गाकर गाजे बाजे के साथ उन्हें विदा करती हैं। प्रेम और वैवाहिक जीवन में निष्ठा का त्योहार संदेश देता है कि आधुनिक युग में भी पति पत्नी एक दूसरे के प्रति निष्ठावान रहे और उनका सम्मान करे और आगे बढ़ने में उनका पूर्ण सहयोग करें तभी गणगौर पूजना सार्थक है।






