अप्रैल ने मार्च की डिस्टार्शन (विकृतियों)को ठीक किया और यह भी दिखाया कि निवेशकों का असली भरोसा कहाँ है।
– पी एस यू और बी एफ एस आई ने वैल्यू-सीकिंग फ्लो को आकर्षित किया, जबकि टेक्नोलॉजी सेक्टर का आकर्षण कम होता गया।
नई दिल्ली, दिव्यराष्ट्र:/ वैलम कैपिटल की ‘मंथली मैक्रो ग्रिड चार्टबुक’ रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल में मार्च की कई अस्थायी विकृतियां ठीक हो गईं, और साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि निवेशकों का असली भरोसा अभी भी किन क्षेत्रों पर केंद्रित है। सिप -आधारित आवंटन मुख्य रूप से लार्ज-कैप शेयरों की ओर निर्देशित थे, जबकि और पी एस यू और बी एफ एस आई शेयरों में वैल्यू-सीकिंग (सस्ते और अच्छे शेयरों की तलाश) देखी गई, इस दौरान बाज़ार में टेक्नोलॉजी सेक्टर से दूर हटने का एक ढांचागत बदलाव जारी रहा। जब तक व्यापक इक्विटी बाज़ार वाईटीडी आधार पर सकारात्मक नहीं हो जाता, तब तक भारतीय पूंजी आक्रामक रवैये के बजाय अनुशासन पर केंद्रित दिखाई देती है।
सभी एसेट क्लास (संपत्ति श्रेणियों) में, अप्रैल की मुख्य स्थिति एक व्यापक बदलाव की थी। इक्विटी में 73,639 करोड़ रूपये का निवेश आया, जो मार्च की तुलना में 25,931 करोड़ रूपये अधिक था, वहीं मनी मार्केट और फिक्स्ड इनकम, दोनों ही भारी आउटफ्लो (पैसे के बाहर जाने) की स्थिति से बाहर निकले, जिससे मार्च के तिमाही-अंत की उथल-पुथल के बाद अब सामान्य स्थिति लौटने के संकेत मिले।
इक्विटी: फ्लो बढ़ा, लेकिन चयनशीलता भी बढ़ी*
इक्विटी के भीतर, ‘डायनामिक स्ट्रैटेजीज’ ने इस महीने सबसे बड़ा बदलाव दिखाया, इसमें 15,242 करोड़ रूपये के आउटफ्लो से पलटकर 19,755 करोड़ रूपये का निवेश दर्ज किया गया—यानी कुल 34,997 करोड़ रूपये का बदलाव आया। यह इक्विटी की सभी उप-श्रेणियों में अब तक का सबसे बड़ा मासिक बदलाव था। इस बदलाव का मुख्य कारण ‘आर्बिट्रेज फण्ड ‘ थे, जिन्होंने अकेले इस बदलाव में 33,173 करोड़ रूपये का योगदान दिया; ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि संस्थागत निवेशकों ने अपनी पोजीशन को समेटा।
लार्ज-कैप फंडों में निवेश कम होकर 17,756 करोड़ रूपये रह गया, जो पिछली अवधि की तुलना में 10,911 करोड़ रूपये कम था। हालाँकि, -8.0% साल-दर-साल का प्रदर्शन दर्ज करने के बावजूद—जो सभी सेगमेंट में सबसे कमजोर प्रदर्शन था—यह अभी भी निवेशकों की सबसे पसंदीदा जगह बनी हुई है। निवेशक खराब प्रदर्शन वाले शेयरों से अपना पैसा निकालकर कहीं और लगाने के बजाय, व्यवस्थित रूप से सिप के जरिए उनमें निवेश करना जारी रखे हुए हैं; यह भारत की परिपक्व होती सिप संस्कृति की एक प्रमुख पहचान है।
‘फैक्टर’ के क्षेत्र में, ‘ग्रोथ’ (विकास) एकमात्र ऐसा फैक्टर रहा जिसने दोनों मोर्चों पर बेहतरीन प्रदर्शन किया: अप्रैल में +2.2 प्रतिशत और वाई टी डी आधार पर +2.9 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की, और साथ ही इसमें 1,022 करोड़ रूपये का बढ़ता हुआ निवेश भी आया। दूसरी ओर, फोकस्ड फंड’ में निवेश में सबसे बड़ी गिरावट (1,008 करोड़ रूपये ) देखी गई; यह दर्शाता है कि अस्थिर बाज़ार के माहौल में, किसी एक या कुछ चुनिंदा शेयरों पर केंद्रित (को सेंटरड ) निवेश को लेकर निवेशकों का भरोसा कम हो रहा है।
पीएसयू ने थीम के हिसाब से सबसे बड़ा बदलाव दिखाया, 4,497 करोड़ रूपये के आउटफ्लो से बढ़कर 489 करोड़ रूपये का इनफ्लो हुआ, जो 4,986 करोड़ रूपये का बड़ा बदलाव है।
बी एस एफ आई ने इस अंतर को और मज़बूत किया। बीएफएसआई सेक्टर ने सभी थीम में औसत से कम प्रदर्शन किया, फिर भी इसने बीएफएसआई ग्रुप और पूरे थीम वाले सेक्टर, दोनों में भारी नेट इनफ्लो आकर्षित किया। बीएफएसआई के अंदर, कैपिटल मार्केट्स ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया, जिसमें साल-दर-साल 18.1 प्रतिशत और एक महीने में 7.4 प्रतिशत की बढ़त हुई, जिसे निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी से समर्थन मिला।
मेटल्स का अच्छा प्रदर्शन*:
कमोडिटीज़ में, मेटल्स ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया, जिसमें साल-दर-साल 19.3 प्रतिशत और अप्रैल में +6.0 प्रतिशत की बढ़त हुई। हेल्थकेयर सभी सब-कैटेगरीज़ में मज़बूत बना रहा, हालाँकि फार्मा के अप्रैल के 8.8 प्रतिशत रिटर्न को 62 करोड़ रूपये के नेट आउटफ्लो ने कम कर दिया। टेक्नोलॉजी इस चार्टबुक का सबसे गहरा घाव बनी हुई है। आईटी इंडेक्स साल-दर-साल -26.3 प्रतिशत और अप्रैल में -11.9 प्रतिशत नीचे है; सिर्फ़ ‘डिजिटल इंडिया’ ने ही गिरावट के दौरान 42 करोड़ रूपये का निवेश आकर्षित किया।
ग्लोबल और फ़ॉरेक्स*
देशों के हिसाब से निवेश में साउथ कोरिया, ताइवान और चीन के बाहर के बाज़ारों का दबदबा है, जबकि भारत, वैश्विक बाज़ार में सुधार के बावजूद, कम समय के लिए पीछे बना हुआ है। वैश्विक थीम में बढ़त वाले सेक्टरों का दबदबा है, सेमीकंडक्टर, सॉफ़्टवेयर, रोबोटिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग और इलेक्ट्रिफ़िकेशन ने बेहतर प्रदर्शन किया है, जबकि वैश्विक रक्षा क्षेत्र की रफ़्तार हाल ही में धीमी पड़ी है।ज़्यादातर बड़ी और एशियाई मुद्राओं के मुक़ाबले रूपये की कमजोरी, वैश्विक स्तर पर जोखिम लेने की बढ़ती प्रवृत्ति और एशिया-केंद्रित निवेश के माहौल को मज़बूत करती है; लेकिन साथ ही यह आयातित महँगाई और बाहरी जोखिमों को भी बढ़ाती है।
अप्रैल में मार्च की विसंगतियाँ दूर हुईं और यह साफ़ हो गया कि असली भरोसा कहाँ है: सिप -आधारित लार्ज-कैप निवेश, पीएसयू/बीएफएसआई में सस्ते शेयरों की तलाश, और टेक्नोलॉजी से धीरे-धीरे दूरी बनाना। जब तक इक्विटी बाज़ार साल-दर-साल सकारात्मक नहीं हो जाता, भारतीय पूँजी बाज़ार अनुशासित बना रहेगा, न कि साहसी।



