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ग्यारसपुर की बारह सौ वर्ष प्राचीन प्रतिमा

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(दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, इन्दौर)

श्रमण संस्कृति के पुरातत्त्व का परिचय मध्यप्रदेश के विदिशा जिलान्तर्गत आने वाले ग्यारसपुर के पुरातत्त्व का उल्लेख कियेे बिना पूर्ण नहीं होता। ग्यारसपुर में मालादेवी मंदिर और बजरामठ जैन मंदिर 9वीं-10वीं शताब्दी में एक पहाड़ी पर कुछ पहाड़ी काटकर बनाये गये। यहाँ की पच्चीसों तीर्थंकर मूूर्तियाँ व सरस्वती, चक्रेश्वरी, अम्बिका आदि शासन देवी-देवों का उल्लेख प्राचीनता के कारण कई पुराविदों ने अपनी पुस्तकों, आलेखों आदि में किया है। इसी पहाड़ी के लगभग एक किलोमीटर की दूूरी पर श्री 1008 दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र चौबीसी मन्दिर है। इस मंदिर का कई बार जीर्णोद्धार हुआ। वर्तमान में भी जीर्णोद्धार हुआ है। इसके जीर्णोद्धार की ताम्र-प्रशस्ति बनने हेतु जब मेरे पास आई तब यहाँ की प्रतिमाओं की ओर मेरा ध्यान आकृष्ट हुआ। यहाँ कई प्राचीन प्रतिमाएँ हैं, जिसपर सम्भवतः पुराविदों का ध्यान नहीं गया।

पार्श्वनाथ चतुर्विंशतिका प्रतिमा—

ग्यारसपुर का चौबीसी मन्दिर क्षेत्र कमेटी के अधीन है। सभी पूज्य प्रतिमाएँ हैं और प्रतिदिन अभिषेक पूजा होती है। यहाँ एक 4 फीट 9 इंच उत्सेधवाली भूूूरे बलुआ पाषाण की तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा है, यह कायोत्सर्ग मुद्रा में है। इसका कमलपुष्प से अलंकृृृत पादपीठ है, जिसके दोनों ओर एक-एक आराधिका बैठी हुई हैं। दायें ओर की आराधिका पादपीठाभिमुख अंजलिबद्ध है, बांई ओर की आराधिका के दाहिने हाथ में पूजा का कुछ द्रव्य है, वह सम्मुख है। पार्श्वनाथ-प्रतिमाजी के दोनों पार्श्वों में चॅवरधारियों के स्थान पर तीर्थंकर के यक्ष-यक्षी ललितासन मुद्रा में हैं। प्रतिमाशास्त्रानुसार दाहिनी ओर चतुर्भुज यक्ष है, जिसके आयुध- कमलनाल, फल और वरदमुद्रा है। बांई ओर बैठी यक्षी की भी चार भुजाएँ हैं। दो हाथों में कमलनाल, एक में फल और एक वरदमुद्रा में है। यक्ष-यक्षी दोनों के शिर पर तीन-तीन सर्प-फण दर्शाये गयेा हैं, जो भग्न हैं। इन दोनों यक्ष-यक्षी के पादपीठ में भी कमल-पुष्प रेखांकित है। मुख प्रतिमा के पीछे से ऊपर को जाती हुई सर्पकुण्डली बनाई गई है, जो ऊपर जाकर तीर्थंकर के शिर पर सप्तफणों का छत्र बनाये हुए है। पारम्परिक त्रिछत्र भी है। प्रतिमा के उदर पर त्रिवली, वक्ष पर श्रीवत्स, कर्णों का स्कंधस्पृष्टन और सुन्दर उष्णीष युक्त कुंचित केश हैं। परिकर में बायें ओर ग्यारह और र्दाईं ओर बारह पद्मासनस्थ लघु जिन प्रतिमाएँ हैं। इस तरह परिकर की 23 और 1 मूलनायक मिलाकर चौबीसी बनती है। वितान में सप्तफण के दोनों ओर माल्यधारी गगनचर देव हैं, त्रिछत्र के ऊपर दुंदुभिवादक दर्शाया गया है, जो कुछ भग्न है। धरणेन्द्र यक्ष और पद्मावती यक्षी तथा सप्त सर्पफणों के अंकन से यह पार्श्वनाथ प्रतिमा है, और परिकर में 23 अन्य तीर्थंकर होने से चतुर्विंशतिका अभिहित की जाती है। ग्यारसपुर की प्रतिमाओं के चित्र हमें विदिशा के डॉ. पं. महेन्द्र जैन ‘विस्किट’ के सहयोग से सुलभ जैन ने सुलभ करवाये हैं।

विश्लेषण- इस प्रतिमा के परिकर में चॅवरवाहक नहीं हैं, जबकि 10वीं शताब्दी के उपरान्त की प्रायः सभी सपरिकर प्रतिमाओं में चॅवरवाहक अनिवार्यरूप से उत्कीर्णित किये जाने की परम्परा है। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित जैन कला एवं स्थापत्य के प्रथम भाग में ग्यारसपुर टेकरी के मंदिरों की प्रतिमाओं का एक चित्र प्रकाशित हुआ है, जिसमें बहुत निचली पत्थर की चहार दीवारी के सहारे खुले आकाश में पाँच प्रतिमाएँ रखीं हैं। उनमें एक खण्डित चतुर्विंशतिका प्रतिमा भी है, जो 9वीं शताब्दी की निर्धारित की गई है। उस प्रतिमा से प्रस्तुत चौबीसी प्रतिमा में समानता है। चॅवरवाहकों की अनुपस्थिति, आराधक, यक्ष-यक्षी के अंकन आदि समान विशेषताएँ हैं। अतः यह प्रतिमा एक ही स्थान, समान पाषाण, समान शिल्पांकन के कारण उसके समकालीन 9वीं शताब्दी की है।

अन्य प्राचीन प्रतिमाएँ—
उपरोक्त प्रतिमा के साथ ही वेदिका पर कई अन्य प्रतिमाएँ हैं। उनमें कुछ तो अर्वाचीन हैं और कुछ अत्यंत प्राचीन हैं। उनमें श्वेत पाषाण की संवत् 1593 की पद्मासन चन्द्रप्रभ भगवान्, संवत् 1665 कायोत्सर्गस्थ पार्श्वनाथ, श्याम पाषाण की पद्मासनस्थ चार लघु प्रतिमाएँ हैं। इनमें दो में एक-एक पंक्ति की प्रशस्ति है। एक में उल्टा स्वस्तिक बना है जो तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ की हो सकती है। एक श्वेत पाषाण की कायोत्सर्गस्थ पार्श्वनाथ की प्रतिमा है, इसके पादपीठ पर प्रशस्ति है, किन्तु वेदी पर स्थित किये जानेे के कारण सफेद सीमेन्ट लगने से अवाच्य है। यहाँ एक और पार्श्वनाथ की धातु की पद्मासन प्रतिमा उल्लेखनीय है। इसके 11 फणों का फलक व पादपीठ अलग भी हो जाते हैं। इस प्रतिमा के तलुओं व हथेलियों में रेखाएँ तो हैं ही, हथेली पर दो पुष्प और अंगूठे पर गुलाब-पुष्प का पत्र बना है। इस तरह की प्रतिमा अन्यत्र देखने में नहीं आयी है।

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