
(*दिव्यराष्ट्र के लिए लेखाराम बिश्नोई *)
उच्च शैक्षणिक संस्थानों से लेकर सुदूर ग्रामीण क्षेत्र तक लव जिहाद की घटनाओं ने एक बार फिर समाज को सोचने के लिए विवश कर दिया है कि बदलते समय में हमारी युवा पीढ़ी किन चुनौतियों का सामना कर रही है। किशोरावस्था और युवावस्था जीवन का ऐसा दौर होता है, जब भावनाएँ प्रबल होती हैं, अनुभव सीमित होता है और सही-गलत के बीच संतुलित निर्णय लेना कठिन हो जाता है। यही कारण है कि परिवार, समाज और संस्कृति की भूमिका इस अवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारतीय संस्कृति में परिवार को केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं माना गया है, बल्कि उसे संस्कारों की प्रथम पाठशाला का स्थान दिया गया है। माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य के लिए त्याग, तपस्या और संघर्ष करते हैं। उनके अनुभव और जीवन दृष्टि युवाओं को संभावित संकटों से बचाने का कार्य करती है। किंतु आधुनिक समय में सोशल मीडिया, आभासी संबंधों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की नई व्याख्याओं के कारण कई बार युवा बिना दूरगामी परिणामों पर विचार किए ऐसे निर्णय ले लेते हैं, जिनका प्रभाव पूरे जीवन पर पड़ सकता है।
हिन्दुत्व केवल किसी धार्मिक पहचान का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक सांस्कृतिक पद्धति, नैतिक मूल्यों और राष्ट्र चेतना का व्यापक दर्शन है। हिन्दुत्व हमें अपने परिवार, समाज और परंपराओं के प्रति उत्तरदायित्व का बोध कराता है। यह सिखाता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ विवेक, मर्यादा और कर्तव्यबोध भी आवश्यक हैं।
आज समाज में यह चिंता भी व्यक्त की जाती है कि कुछ मामलों में युवतियों को भावनात्मक रूप से प्रभावित कर, झूठे वादों, छल-कपट अथवा पहचान छिपाकर संबंध स्थापित किए जाते हैं। यदि किसी भी व्यक्ति द्वारा बहला-फुसलाकर, मानसिक दबाव बनाकर अथवा धोखे से किसी युवती को उसके परिवार और सामाजिक परिवेश से दूर करने का प्रयास किया जाता है, तो ऐसी घटनाओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। कानून का उद्देश्य किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि पीड़ित को न्याय दिलाना और अपराधी को दंडित करना होना चाहिए।
यह भी सत्य है कि अठारह वर्ष की आयु के बाद युवतियाँ कानूनी रूप से अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होती हैं। परंतु केवल कानूनी वयस्कता ही परिपक्व निर्णय की गारंटी नहीं होती। जीवन के अनुभव, सामाजिक समझ और परिस्थितियों का आकलन करने की क्षमता समय के साथ विकसित होती है। ऐसे में न्यायपालिका और प्रशासन को भी प्रत्येक मामले की परिस्थितियों, अभिभावकों की आशंकाओं और संबंधित युवती की वास्तविक स्वतंत्र इच्छा का संवेदनशीलता के साथ परीक्षण करना चाहिए।
समाज का दायित्व केवल घटना घटने के बाद विरोध करना नहीं, बल्कि उससे पहले जागरूकता का वातावरण बनाना भी है। परिवारों को अपने बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना चाहिए। संस्कार, धार्मिक शिक्षा, भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक मूल्यों का परिचय नई पीढ़ी को देना आवश्यक है। युवाओं में आत्मविश्वास, विवेक और चरित्र निर्माण की भावना विकसित करनी होगी, ताकि वे किसी भी प्रकार के प्रलोभन, मानसिक प्रभाव या भ्रम से स्वयं को सुरक्षित रख सकें। हिन्दू समाज की शक्ति उसकी एकता, संगठन और जागरूकता में निहित रही है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी संतानों को भारतीय संस्कृति से जोड़ें, परिवार संस्था को मजबूत करें, सामाजिक संवाद बढ़ाएँ और कानून व्यवस्था को निष्पक्ष तथा प्रभावी बनाएँ। हिंदुत्व का वास्तविक स्वरूप भी यही है—धर्म की रक्षा, संस्कृति का संरक्षण, नारी सम्मान, परिवार की प्रतिष्ठा और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना।
यदि समाज जागरूक होगा, परिवार संस्कारित होंगे और युवा विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम बनेंगे, तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति स्वतः कम होगी। सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और न्यायपूर्ण व्यवस्था ही सुरक्षित एवं सशक्त समाज का आधार बन सकती है।



