(दिव्यराष्ट्र के लिए सुरेंद्र चतुर्वेदी, जयपुर,सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट)
।महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लिए लाए गए संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में गिरा कर विपक्ष ने अपने गले में एक ऐसा ढोल बांध लिया है, जिसे भाजपा अगले लोकसभा चुनावों तक होने वाले हर विधानसभा चुनावों में विपक्ष के खिलाफ ना केवल बजाएगी अपितु ये भी साबित करेगी कि ग़ैर भाजपाई पार्टियाँ महिला विरोधी हैं।
इसी के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने अगले लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा को आधारभूमि बना कर दे दी है। इस मुद्दे का सबसे पहले असर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडू में होने वाले विधानसभा चुनावों में दिखेगा और उसके बाद उत्तरप्रदेश में भाजपा इसको मुद्दा बनाएगी। विपक्ष भले ही चीख चीख कर कहता रहे कि उनका विरोध परिसीमन को लेकर था, लेकिन महिला मतदाताओं को केवल यही समझ में आयेगा कि मोदी सरकार उनको विधानसभा और लोकसभा में पहुँचने का मौका देना चाहती थी लेकिन विपक्षी दलों ने ऐसा नहीं होने दिया और उनसे उनका हक छीन लिया।
दरअसल, महिलाओं को विधानसभा और लोकसभा में आरक्षण देने का निर्णय एक ऐसा विषय है जो सीधा सीधा सत्ता में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करता है। इसको लागू करने का जितना राजनीतिक लाभ भाजपा को मिल सकता है , उसका दसवां हिस्सा भी ग़ैर भाजपाई दलों को नहीं मिलेगा, और इसका सबसे बड़ा कारण राजनीतिक दलों की संगठन संरचना है। भाजपा के अलावा केवल तृणमूल कांग्रेस ही है जिसके पास महिला कार्यकर्ताओं की फ़ौज है, लेकिन उसका प्रभाव केवल पश्चिम बंगाल तक ही सीमित है जबकि भाजपा का विस्तार दक्षिण भारत तक पहुँच रहा है। भारत की सबसे प्राचीन पार्टी कांग्रेस का प्रभाव तो राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब के अलावा हिमाचल प्रदेश कर्नाटक और तेलंगाना में ही है। यानि केवल आठ राज्य ऐसे हैं जहाँ कांग्रेस कह सकती है कि वहाँ वो प्रमुख राजनीतिक दल है। बाक़ी जगह तो उसकी राजनीतिक ज़मीन या तो समाप्त हो चुकी या उन्हें अन्य राजनीतिक दलों से समझौता करके अपनी उपस्थिति दर्ज करानी पड़ती है। हालात यह है कि भारत में राजनीतिक दृष्टि से बड़े और महत्वपूर्ण राज्य तमिलनाडू (39), महाराष्ट्र(48), उत्तर प्रदेश(80),बिहार (40), पश्चिम बंगाल (42) यानि 249 लोकसभा सीटों पर वह अपने दम पर चुनाव नहीं लड़ सकती ! इसके लिए कांग्रेस को किसी ना किसी का सहारा लेना ही पड़ेगा । इसके अलावा अन्य छोटे राज्य तो अलग हैं।
इसी प्रकार समाजवादी पार्टी- उत्तर प्रदेश, राजद – बिहार, डीएमके- तमिलनाडू, वाम दल – केरलम, आम आदमी पार्टी – पंजाब और दिल्ली तक ही सीमित हैं। कांग्रेस सहित इन दलों में महिला नेतृत्व को आगे लाने का प्रयास संगठनात्मक कौशल से ना होकर नेतृत्व की पसंद और ना पसंद के आधार पर ज़्यादा होता है। इसलिए यदि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का संविधान संशोधन हो भी जाता तो इन दलों के पास ऐसे कार्यकर्ता और नेता ही नहीं थे, जिनको आगे रखकर वो चुनावों में जा सकें !
तो कुल मिलाकर विपक्ष मोदी सरकार के ऐसे चक्रव्यूह में फँस गया है जिससे निकलने का रास्ता फ़िलहाल तो किसी के पास है नहीं। उसपर विपक्ष का बिल पास नहीं होने पर सदन में उल्लास मनाना एक ऐसा घटनाक्रम बन गया है जिसकी तुलना महाभारत काल में द्रौपदी के चीर हरण पर उल्लासित कौरव सभा के अट्टहास से ही की जा सकती है।
*सुरेंद्र चतुर्वेदी, जयपुर*
*सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट*





