
दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ. शुचि चौहान
25 जून 1975 की मध्यरात्रि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की वह दिनांक है, जिसे संविधान लागू होने के बाद का सबसे काला अध्याय कहा जाता है। जिस लोकतंत्र को लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष और बलिदान से प्राप्त किया गया था, उसी लोकतंत्र का गला उसके अपने शासकों ने घोट दिया। मौलिक अधिकार स्थगित कर दिए गए, न्यायपालिका पर दबाव बढ़ा, प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई, विपक्ष जेलों में बंद कर दिया गया और पूरे देश को भय तथा दमन के वातावरण में जीने के लिए विवश कर दिया गया। यही कारण है कि भारतीय इतिहास में आपातकाल केवल एक संवैधानिक व्यवस्था नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर लगा एक स्थायी कलंक माना जाता है।
1970 के दशक के प्रारंभ तक इंदिरा गांधी का न्यायपालिका से टकराव लगातार बढ़ता जा रहा था। बैंकों के राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स की समाप्ति तथा संसद की संशोधन शक्ति जैसे अनेक प्रश्नों पर सरकार और सर्वोच्च न्यायालय आमने-सामने थे। दूसरी ओर देश महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से जूझ रहा था। गुजरात और बिहार में छात्र आंदोलनों ने व्यापक जनसमर्थन प्राप्त कर लिया था और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में व्यवस्था परिवर्तन की मांग पूरे देश में फैल रही थी। कांग्रेस की लोकप्रियता लगातार घट रही थी और राजनीतिक परिस्थितियाँ सरकार के लिए चुनौती बन चुकी थीं।
इसी बीच 1971 के आम चुनाव हुए। उस समय तक लोकसभा और अधिकांश राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ होते थे, किंतु राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए दोनों चुनाव अलग-अलग कराने की रणनीति अपनाई गई। लोकसभा चुनाव “गरीबी हटाओ” के नारे पर लड़ा गया और कांग्रेस को 518 में से 352 सीटें प्राप्त हुईं। रायबरेली से इंदिरा गांधी ने लगभग 1.10 लाख मतों से विजय प्राप्त की, जबकि संयुक्त विपक्ष के प्रत्याशी राज नारायण को लगभग 71 हजार मत मिले।
राज नारायण ने परिणाम स्वीकार नहीं किया और इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनाव याचिका दायर कर दी। उन्होंने इंदिरा गांधी पर आठ प्रमुख आरोप लगाए। इनमें सरकारी अधिकारी तथा अपने तत्कालीन ओएसडी यशपाल कपूर की चुनाव में सहायता लेना, सरकारी मशीनरी का उपयोग, चुनाव व्यय की सीमा का उल्लंघन, मतदाताओं को प्रलोभन देना तथा अन्य चुनावी अनियमितताएँ शामिल थीं।
यह याचिका अप्रैल 1971 में दायर हुई, किंतु उसका निर्णय 12 जून 1975 को आया, अर्थात् आपातकाल घोषित होने से मात्र तेरह दिन पहले। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने की। निर्णय सुरक्षित रखे जाने के बाद उस पर प्रभाव डालने के अनेक प्रयास किए गए। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अपनी पुस्तक दा केश देट शोक इंडिया में उल्लेख किया है कि निर्णय जानने तथा उसे प्रभावित करने के प्रयास हुए। तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के माध्यम से भी संपर्क साधने का प्रयास किया गया, किंतु न्यायमूर्ति सिन्हा अपने निर्णय पर अडिग रहे। यहाँ तक कि निर्णय टाइप करने वाले उनके निजी सचिव से भी जानकारी प्राप्त करने का प्रयास असफल रहा।
12 जून 1975 का दिन इंदिरा गांधी के लिए अत्यंत कठिन सिद्ध हुआ। उसी दिन उन्हें अपने निकट सहयोगी डी. पी. धर के निधन का समाचार मिला। इसके कुछ समय बाद गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय का समाचार आया और फिर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनका रायबरेली निर्वाचन निरस्त कर दिया। न्यायालय ने उन्हें सरकारी अधिकारी यशपाल कपूर की चुनावी सहायता लेने तथा सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी माना। उनका चुनाव अमान्य घोषित किया गया और उन्हें छह वर्षों तक किसी निर्वाचित पद के लिए अयोग्य ठहरा दिया गया। हालाँकि तत्काल प्रभाव से प्रधानमंत्री पद छोड़ने का आदेश नहीं दिया गया।
इंदिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की। 24 जून 1975 को अवकाशकालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर ने अंतरिम आदेश दिया कि अंतिम निर्णय तक वे प्रधानमंत्री बनी रह सकती हैं, किंतु लोकसभा में मतदान नहीं कर सकेंगी तथा सांसद के रूप में मिलने वाले कुछ विशेषाधिकारों का उपयोग नहीं कर पाएँगी। यह निर्णय राजनीतिक संकट को समाप्त करने के बजाय और अधिक गहरा कर गया।
उधर लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली आयोजित हुई। उन्होंने लोकतांत्रिक तरीकों से संघर्ष जारी रखने का आह्वान किया। उसी रात प्रधानमंत्री आवास पर पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री और संवैधानिक विशेषज्ञ सिद्धार्थ शंकर रे से परामर्श हुआ। आंतरिक अशांति के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रीय आपातकाल लगाने का निर्णय लिया गया। रात लगभग 11 बजे राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर कर दिए।
उसके बाद जो हुआ, उसने भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को झकझोर दिया। आधी रात को जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी सहित हजारों विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। समाचार पत्रों के कार्यालयों की बिजली काट दी गई ताकि अगले दिन समाचार प्रकाशित न हो सकें। आश्चर्यजनक रूप से अधिकांश केंद्रीय मंत्रियों को भी इस निर्णय की पूर्व सूचना नहीं थी। अगले दिन सुबह कैबिनेट की बैठक में उन्हें केवल इस निर्णय की जानकारी दी गई।
इसके बाद देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगभग समाप्त कर दी गई। सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने समाचारों पर राजनीतिक नियंत्रण स्वीकार करने से इंकार किया तो उन्हें पद से हटा दिया गया और उनके स्थान पर विद्याचरण शुक्ल को नियुक्त किया गया। प्रेस पर पूर्व सेंसरशिप लागू कर दी गई। अनेक समाचार पत्रों को बंद करना पड़ा, सरकारी विज्ञापन रोक दिए गए और पत्रकारों को मीसा के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया , यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया , हिंदुस्तान समाचार तथा समाचार भारती को मिलाकर ‘समाचार’ नामक एकीकृत एजेंसी बनाई गई, जिससे समाचार प्रवाह पर सरकारी नियंत्रण और सुदृढ़ हो गया।
आपातकाल के दौरान हजारों राजनीतिक कार्यकर्ता जेलों में डाले गए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित अनेक संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया। सरकार के बीस सूत्रीय कार्यक्रम और संजय गांधी के पाँच सूत्रीय कार्यक्रम के नाम पर झुग्गियाँ हटाने तथा परिवार नियोजन अभियान को आक्रामक रूप से लागू किया गया। अनेक स्थानों पर जबरन नसबंदी के आरोप लगे, जिनमें अविवाहित युवकों और अल्पवयस्कों तक को नहीं बख्शा गया। इन घटनाओं ने जनता में गहरा असंतोष उत्पन्न किया।
कला और संस्कृति भी सरकारी नियंत्रण से नहीं बच सकीं। मनोज कुमार ने यदि सरकार समर्थक फिल्म बनाने से इंकार किया तो उनकी फिल्मों के साथ प्रतिकूल व्यवहार किया गया। किशोर कुमार ने सरकारी प्रचार गीत गाने से मना किया तो आकाशवाणी और दूरदर्शन पर उनके गीतों का प्रसारण रोक दिया गया। अमृत नाहटा की फिल्म किस्सा कुर्सी का पर प्रतिबंध लगाया गया और उसके प्रिंट नष्ट कर दिए गए। फिल्मों और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पर भी सेंसरशिप का कठोर प्रभाव दिखाई दिया।
आपातकाल केवल राजनीतिक दमन तक सीमित नहीं था। इस दौरान संविधान में भी व्यापक संशोधन किए गए। 1971 से 1976 के बीच कई संविधान संशोधन हुए, जिनमें 42वाँ संविधान संशोधन सबसे अधिक विवादास्पद माना जाता है। इसे कभी-कभी “मिनी संविधान” भी कहा जाता है क्योंकि इसने संसद की शक्तियों का विस्तार किया, न्यायपालिका की समीक्षा-शक्ति को सीमित करने का प्रयास किया और केंद्र सरकार को अभूतपूर्व अधिकार प्रदान किए। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद 44वें संविधान संशोधन द्वारा इन प्रावधानों में से अनेक को वापस लिया गया तथा भविष्य में आपातकाल के दुरुपयोग की संभावना कम करने के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपाय जोड़े गए।
21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ, किंतु उसके घाव भारतीय लोकतंत्र पर स्थायी रूप से अंकित हो गए। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष प्रेस, सक्रिय विपक्ष और नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जीवित रहता है। जब ये सभी संस्थाएँ एक साथ दबाव में आ जाएँ, तब लोकतंत्र का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है।
इसलिए भारतीय इतिहास में आपातकाल केवल इक्कीस महीनों की एक प्रशासनिक अवधि नहीं है। यह उस चेतावनी का नाम है कि यदि सत्ता पर संवैधानिक नियंत्रण कमजोर पड़ जाए और लोकतांत्रिक संस्थाएँ निष्क्रिय हो जाएँ, तो स्वतंत्र राष्ट्र भी तानाशाही की ओर बढ़ सकता है। यही कारण है कि 1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अभिशाप और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी लोकतांत्रिक चेतावनी के रूप में स्मरण किया जाता है।





