
डॉ. यशवंत सिंह परमार : सादगी, ईमानदारी और हिमाचल निर्माण के शिल्पकार
नई दिल्ली, दिव्यराष्ट्र*
हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार का जीवन भारतीय राजनीति में सादगी, ईमानदारी और दूरदर्शी नेतृत्व का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करता है। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि आधुनिक हिमाचल प्रदेश के वास्तविक निर्माता के रूप में जाने जाते हैं।
डॉ. परमार का जन्म 4 अगस्त 1906 को सिरमौर जिले के चन्हालग गाँव में हुआ। उस समय यह क्षेत्र अत्यंत पिछड़ा था, किंतु उन्होंने अपनी प्रतिभा और दृढ़ संकल्प से शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही प्राप्त करने के बाद उन्होंने नाहन से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई के लिए वे लाहौर और लखनऊ गए, जहाँ से उन्होंने बीए (ऑनर्स), एमए और एलएलबी की डिग्रियाँ प्राप्त कीं तथा बाद में पीएचडी की उपाधि हासिल की। उनकी विद्वता के सम्मान में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट ऑफ लॉ (LL.D.) की मानद उपाधि प्रदान की।
राजनीतिक जीवन में डॉ. परमार का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। वे 1952 में हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने और 1956 तक इस पद पर रहे। जब 1956 में हिमाचल प्रदेश को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया, तब उन्होंने संसद सदस्य के रूप में सेवा दी। वर्ष 1963 में पुनः विधानसभा गठन के बाद वे फिर मुख्यमंत्री बने और 1977 तक निरंतर इस पद पर रहते हुए प्रदेश के विकास की मजबूत नींव रखी। इस प्रकार वे लगभग 18 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे और प्रदेश के विकास को नई दिशा दी।
उनकी सादगी और ईमानदारी की मिसाल आज भी दी जाती है। कहा जाता है कि 1977 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने सरकारी वाहन का उपयोग नहीं किया, बल्कि पैदल शिमला बस स्टैंड पहुँचे और साधारण यात्री की तरह बस से अपने गृह जनपद लौट गए। लंबे समय तक उच्च पदों पर रहने के बावजूद उन्होंने कभी निजी संपत्ति अर्जित नहीं की। 2 मई 1981 को उनके निधन के समय उनके बैंक खाते में मात्र 563.30 रुपये शेष थे, जो उनके निष्कलंक जीवन का प्रमाण है।
डॉ. परमार को आधुनिक हिमाचल प्रदेश का शिल्पकार कहा जाता है। उन्होंने दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कों का व्यापक जाल बिछाया और यह माना कि “सड़कें पहाड़ की भाग्य रेखा हैं।” उनके प्रयासों से भूमि संरक्षण के लिए धारा 118 लागू की गई, जिससे बाहरी लोगों द्वारा भूमि खरीद पर नियंत्रण स्थापित हुआ। वे पर्यावरण संरक्षण के भी प्रबल समर्थक थे और हिमालयी क्षेत्र की हरियाली बनाए रखने के लिए लोगों को वृक्षारोपण हेतु प्रेरित करते थे। उनके मार्गदर्शन में सोलन के नौणी में स्थित डॉ. वाई.एस. परमार विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, जो आज कृषि एवं बागवानी शिक्षा का प्रमुख केंद्र है।
राजनीति के साथ-साथ वे एक गंभीर चिंतक और लेखक भी थे। उन्होंने हिमालयी समाज, संस्कृति और राज्य की अवधारणा पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं, जिनमें The Social and Economic Background of Himalayan Polyandry, Himachal Pradesh: Case for Statehood तथा Himachal Pradesh: Area and Languages प्रमुख हैं। उनकी रचनाएँ उनके गहन अध्ययन और दूरदृष्टि को दर्शाती हैं।
उनकी महान सेवाओं के सम्मान में भारत सरकार ने उनके नाम पर डाक टिकट जारी किया, जो राष्ट्र की ओर से उन्हें दी गई श्रद्धांजलि का प्रतीक है। आज भी हिमाचल प्रदेश के विकास की चर्चा डॉ. परमार के उल्लेख के बिना अधूरी मानी जाती है।
निस्संदेह, यशवंत सिंह परमार का जीवन यह सिद्ध करता है कि सच्ची निष्ठा, सादगी और जनसेवा के आदर्शों के साथ भी सार्वजनिक जीवन में महान उपलब्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं।




