मुंबई दिव्यराष्ट्र*: नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल ने एक जटिल हृदय हस्तक्षेप प्रक्रिया — पीडीए स्टेंटिंग — के माध्यम से जन्मजात गंभीर डक्ट-निर्भर हृदय दोष से पीड़ित पाँच दिन के नवजात शिशु का सफलतापूर्वक जीवन बचाया।
नवजात को महाराष्ट्र के एक छोटे शहर में त्वचा के अत्यधिक नीलेपन (सायनोसिस) की शिकायत के साथ बाल रोग विशेषज्ञ के पास लाया गया था। जाँच में ऑक्सीजन संतृप्ति खतरनाक रूप से केवल 65 प्रतिशत पाई गई। गंभीर सायनोटिक जन्मजात हृदय रोग की आशंका होने पर, जहाँ फेफड़ों तक पर्याप्त रक्त नहीं पहुँच पाता, स्थानीय चिकित्सक ने तुरंत मुंबई स्थित नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल के विशेषज्ञों से संपर्क कर आपातकालीन स्थानांतरण की व्यवस्था की।
बाल हृदय रोग विशेषज्ञ टीम, जिसका नेतृत्व डॉ. सुप्रतिम सेन, बाल ह्रदयरोग – वरिष्ठ सलहाकार , नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल, मुंबई कर रहे थे, की सलाह पर नवजात को एंबुलेंस से स्थानांतरित करने से पहले जीवनरक्षक दवा प्रोस्टाग्लैंडिन ई1 दी गई। 12 घंटे की लंबी यात्रा के बावजूद शिशु अस्पताल सुरक्षित अवस्था में पहुँचा।
विस्तृत जाँच के बाद शिशु में पल्मोनरी एट्रेसिया विथ वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट तथा छोटा पेटेंट डक्टस आर्टेरियोसस (पीडीए) होने की पुष्टि हुई। इस स्थिति में हृदय के दाएँ हिस्से और फेफड़ों को जोड़ने वाली सामान्य धमनी (पल्मोनरी आर्टरी) अनुपस्थित होती है। नवजात अस्थायी रूप से पीडीए के माध्यम से रक्त प्रवाह के कारण जीवित रहता है, जो भ्रूण अवस्था की एक प्राकृतिक संरचना है। चूँकि जन्म के दो से सात दिनों के भीतर अधिकांश पीडीए स्वतः बंद हो जाते हैं, इसलिए जीवनरक्षक हस्तक्षेप अत्यंत आवश्यक था।
कार्डियक टीम ने कार्डियक कैथेटराइजेशन लैब में पीडीए स्टेंटिंग की, जो न्यूनतम इनवेसिव लेकिन तकनीकी रूप से अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। लगभग एक घंटे चली इस प्रक्रिया के दौरान पीडीए में सफलतापूर्वक एक छोटा स्टेंट स्थापित किया गया, जिससे फेफड़ों तक रक्त प्रवाह निर्बाध सुनिश्चित हुआ और शिशु के ऑक्सीजन स्तर तुरंत स्थिर हो गए।
नवजात की स्थिति में तेजी से सुधार हुआ और पाँच दिन बाद उसे स्थिर अवस्था में छुट्टी दे दी गई। छह से आठ महीने की आयु में शिशु की निर्णायक सुधारात्मक हृदय शल्य चिकित्सा की योजना बनाई गई है।
मामले पर प्रकाश डालते हुए नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल डॉ. सुप्रतिम सेन ने कहा, “डक्ट-निर्भर हृदय दोषों में समय सबसे महत्वपूर्ण कारक होता है। प्रारंभिक पहचान, त्वरित चिकित्सीय स्थिरीकरण और समय पर हस्तक्षेप जीवन और मृत्यु के बीच अंतर तय कर सकते हैं। इस मामले में स्थानीय बाल रोग विशेषज्ञ, ट्रांसपोर्ट टीम और हमारे अस्पताल की कार्डियक यूनिट के बीच बेहतर समन्वय ने नवजात का जीवन बचाने में निर्णायक भूमिका निभाई।”
नवजातों में पीडीए स्टेंटिंग को अत्यंत जटिल प्रक्रिया माना जाता है, क्योंकि मरीज केवल कुछ दिन के होते हैं और उनका वजन 3.5 किलोग्राम से कम होता है। पिछले कुछ वर्षों में नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल की बाल हृदय रोग टीम ने गंभीर एवं जटिल जन्मजात हृदय दोष से पीड़ित शिशुओं में लगभग 50 पीडीए स्टेंटिंग प्रक्रियाएँ सफलतापूर्वक पूरी की हैं, जिनके तात्कालिक और मध्यम अवधि के परिणाम उत्कृष्ट रहे हैं।


