
(डॉ.सीमा दाधीच, प्रधान संपादक, दिव्यराष्ट्र)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का युवा पीढ़ी को लेकर हालिया वक्तव्य न सिर्फ समकालीन राजनीतिक चर्चा का केंद्र बना है, बल्कि समाज और शासन व्यवस्था के लिए एक गहरी सोच का आईना भी पेश करता है। मुंबई में जेन-जी और जेन-अल्फा युवाओं के साथ हुए संवाद कार्यक्रम में भागवत ने स्पष्ट और निडर शब्दों में कहा कि विरोध प्रदर्शन करने से जेन-जी देशद्रोही या एंटी-नेशनल नहीं बन जाते। वे हमारे अपने लोग हैं, हमारी अगली पीढ़ी हैं। उन्होंने उन्हें मौजूदा पीढ़ी से अधिक ईमानदार और देशभक्त बताया। यह बयान युवाओं के प्रति एक सकारात्मक और दूरदर्शी दृष्टिकोण को रेखांकित करता है, जो केवल शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के भविष्य को आकार देने वाली सोच का प्रतीक है।
भागवत ने अपनी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि जब वे युवा थे, तो बड़ों की बात बिना सवाल किए मान ली जाती थी। लेकिन आज की जेन-जी और जेन-अल्फा हर विषय पर तार्किक, तथ्यपरक और शासकीय जवाब चाहती है। उन्हें सिर्फ आदेश नहीं, बल्कि अपनापन, स्नेह और मान्यता की भी जरूरत है। यह टिप्पणी युवा मनोविज्ञान की गहरी समझ को दर्शाती है। डिजिटल युग में पली-बढ़ी यह पीढ़ी सूचनाओं की बाढ़, वैश्विक संपर्क और सोशल मीडिया के प्रभाव में जी रही है। वे पुरानी व्यवस्थाओं को बिना समझे स्वीकार नहीं करते। उनका सवाल करना विद्रोह नहीं, बल्कि जागरूकता और जिम्मेदारी का संकेत है। भागवत ने इस बात को स्वीकार करके समाज को याद दिलाया कि युवाओं को दबाने के बजाय उन्हें सुनना और समझना होगा।
शिक्षा व्यवस्था पर भागवत का जोर विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने कहा कि युवाओं की शिकायतें जायज हैं। भारत की शिक्षा प्रणाली में बहुत कुछ सुधार की जरूरत है। अगर समय रहते संवाद होता तो दिल्ली के जंतर-मंतर जैसे प्रदर्शन की स्थिति ही नहीं बनती। उन्होंने शिक्षा बजट को सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत करने की वकालत की। यह सुझाव मात्र औपचारिक नहीं है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार के अवसर और भविष्य की अनिश्चितताओं से जूझ रही युवा पीढ़ी के लिए शिक्षा ही सबसे बड़ा आधार है। भागवत का यह रुख सरकार और नीति-निर्माताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि युवा असंतोष को नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है। संवाद की कमी ही आंदोलनों को जन्म देती है। लोकतंत्र में आंदोलन भी संवाद का एक माध्यम है, बशर्ते उसका उद्देश्य विभाजन न होकर आम सहमति बनाना हो।
भागवत ने संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर के विचारों का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि आंदोलन कैसे करना चाहिए, इसके तरीके संविधान में बताए गए हैं। युवाओं को राष्ट्रविरोधी कहने की बजाय उनके तरीकों पर ध्यान देना चाहिए। यह संतुलित दृष्टिकोण है। एक ओर युवाओं के अधिकारों का समर्थन, दूसरी ओर जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक मूल्यों की याद। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर उनसे आंख मूंदकर किसी पर भरोसा करने को कहा जाए, तो वे जेन-जी पर ही भरोसा करेंगे। यह कथन युवाओं के प्रति अटूट विश्वास को दर्शाता है और समाज में फैली नकारात्मक मानसिकता को चुनौती देता है।
यह बयान संघ की दीर्घकालिक रणनीति को भी उजागर करता है। संघ हमेशा समाज के हर वर्ग को जोड़ने की बात करता रहा है। युवा पीढ़ी देश की सबसे बड़ी पूंजी है। अगर उन्हें अलग-थलग किया गया या उनकी आवाज को दबाया गया, तो सामाजिक और राजनीतिक दूरी बढ़ेगी। भागवत का वक्तव्य भाजपा शासित सरकारों के लिए भी एक नसीहत के रूप में देखा जा रहा है। युवा नाराजगी को राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर रखकर देखना होगा। विपक्षी दल अगर युवाओं को सिर्फ वोट बैंक मानते हैं, तो सत्ता पक्ष को भी उनकी आकांक्षाओं को प्राथमिकता देनी होगी। शिक्षा, रोजगार, कौशल और भविष्य की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर ठोस कदम उठाने होंगे।
सामाजिक सद्भाव की दृष्टि से भी यह बयान महत्वपूर्ण है। युवाओं को एंटी-नेशनल करार देने की कोशिशें समाज में विभाजन पैदा करती हैं। भागवत ने साफ कहा कि जेन-जी कोई अलग लोग नहीं हैं। वे हमारे अपने हैं। संवाद अपनेपन और संबंधों के आधार पर ही सफल होता है। जब युवा महसूस करेंगे कि उनकी बात सुनी जा रही है, तब ही विश्वास बनेगा। यह दृष्टिकोण न सिर्फ वर्तमान आंदोलनों को शांत करने में मददगार साबित हो सकता है, बल्कि भविष्य में भी युवा ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण की दिशा में मोड़ सकता है।
भागवत के विचारों में आशावाद और यथार्थवाद दोनों का मिश्रण है। उन्होंने नई पीढ़ी में देशभक्ति और सेवा की भावना को स्वीकार किया। यह स्वीकारोक्ति युवाओं को प्रोत्साहित करने वाली है। देश को आगे बढ़ाने के लिए युवा ऊर्जा को नकारात्मकता की बजाय सकारात्मक दिशा में लगाना होगा। शिक्षा सुधार, संवाद की संस्कृति और आपसी विश्वास ही इस दिशा में सबसे प्रभावी साधन हैं।
अंत में, मोहन भागवत का युवा दृष्टि सिर्फ एक संगठन प्रमुख का व्यक्तिगत मत नहीं, बल्कि समाज के भविष्य की दिशा का संकेत है। युवाओं को सुनना, उनकी ईमानदारी पर भरोसा करना और उनकी समस्याओं का समाधान निकालना समय की मांग है। अगर शासन, समाज और राजनीतिक दल इस संदेश को अपनाएं, तो न सिर्फ युवा असंतोष कम होगा, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया भी अधिक समावेशी और मजबूत बनेगी। भागवत का बयान याद दिलाता है कि युवाओं के साथ चलना होगा, उनके खिलाफ नहीं। यही सच्ची राष्ट्रभक्ति है और यही भविष्य की नींव है।






