
(दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ. शुचि चौहान)
भारतीय इतिहास में कुछ ऐसे दिन हैं जो केवल किसी व्यक्ति विशेष की स्मृति तक सीमित नहीं हैं बल्कि वे एक व्यापक राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राजनीतिक स्वाधीनता के प्रतीक बन गए हैं। हिंदू साम्राज्य दिवस ऐसा ही एक दिन है। यह दिवस छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक की स्मृति में मनाया जाता है, जो भारतीय इतिहास की उन महान घटनाओं में से एक है, जिसने विदेशी सत्ता के समक्ष आत्मसमर्पण की मानसिकता को तोड़कर स्वराज्य और स्वाभिमान का नया अध्याय आरंभ किया। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी के दिन सन् 1674 में रायगढ़ दुर्ग पर शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था। यह केवल एक राजा के सिंहासनारोहण का समारोह नहीं था बल्कि लगभग एक हजार वर्षों के विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक पराधीनता के बीच हिंदू शक्ति, संस्कृति और स्वराज्य की पुनर्स्थापना की ऐतिहासिक घोषणा थी।
सत्रहवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत जटिल परिस्थितियों से गुजर रहा था। उत्तरी भारत में मुगल तो दक्षिणी भारत में बीजापुर, गोलकुंडा जैसी मुस्लिम सल्तनतें प्रभावी थीं। अनेक हिंदू राजाओं और सामंतों को या तो विदेशी शासकों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ती थी या उनके विरुद्ध निरंतर संघर्ष करना पड़ता था। ऐसे समय में महाराष्ट्र की भूमि पर जन्मे शिवाजी महाराज ने स्वराज्य का स्वप्न देखा। उनकी माता जीजाबाई ने उन्हें रामायण, महाभारत और भारतीय इतिहास के वीर पात्रों की कथाएं सुनाकर धर्म, राष्ट्र और स्वाभिमान की शिक्षा दी। दादोजी कोंडदेव के मार्गदर्शन में उन्होंने प्रशासन, युद्धकला और संगठन का प्रशिक्षण प्राप्त किया।
शिवाजी महाराज ने किशोरावस्था में ही यह समझ लिया था कि जनता की सुरक्षा और सम्मान के लिए स्वशासन आवश्यक है। उन्होंने 1645 के आसपास स्वराज्य स्थापना का संकल्प लिया और तोरणा दुर्ग पर अधिकार प्राप्त कर अपने अभियान की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने अनेक दुर्गों और क्षेत्रों को अपने नियंत्रण में लिया। उनकी सैन्य नीति, जिसे गुरिल्ला युद्ध या गनिमी कावा कहा जाता है, अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुई। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने विशाल सेनाओं को पराजित किया और यह सिद्ध कर दिया कि युद्ध केवल संख्या बल से नहीं बल्कि रणनीति, नेतृत्व और जनसमर्थन से जीते जाते हैं।
शिवाजी महाराज के उदय से बीजापुर और मुगल दोनों ही चिंतित हो गए। बीजापुर के सेनापति अफजल खान को शिवाजी का दमन करने के लिए भेजा गया। अफजल खान ने मार्ग में अनेक मंदिरों को नष्ट किया और शिवाजी को उकसाने का प्रयास किया। 1659 में प्रतापगढ़ के निकट हुई ऐतिहासिक भेंट में अफजल खान ने विश्वासघात कर शिवाजी की हत्या का प्रयास किया, किंतु शिवाजी की सतर्कता और साहस के कारण वह स्वयं मारा गया। यह घटना शिवाजी की रणनीतिक कुशलता और अदम्य साहस का प्रतीक बन गई।
इसके बाद औरंगजेब ने भी शिवाजी को समाप्त करने के लिए अनेक अभियान चलाए। शाइस्ता खान को दक्षिण का सूबेदार बनाकर भेजा गया, जिसने पुणे पर अधिकार कर लिया। किंतु 1663 में शिवाजी ने साहसिक अभियान चलाकर शाइस्ता खान के निवास पर धावा बोल दिया। इस हमले में शाइस्ता खान घायल हुआ और उसकी प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचा। 1664 में शिवाजी ने सूरत पर आक्रमण कर मुगल आर्थिक शक्ति को चुनौती दी। ये ऐसी घटनाएं थीं जो मुगलों ही नहीं सामंतों की भी नींद उड़ाए हुए थीं!
1665 में आमेर के राजा जयसिंह के नेतृत्व में मुगल सेना ने शिवाजी पर दबाव बनाया, जिसके परिणामस्वरूप पुरंदर की संधि हुई। इसके बाद शिवाजी को आगरा दरबार में उपस्थित होना पड़ा। औरंगजेब ने उनका अपमान किया और उन्हें नजरबंद कर दिया। किंतु शिवाजी अद्भुत बुद्धिमत्ता और साहस का परिचय देते हुए अपने पुत्र संभाजी के साथ फलों की टोकरी में छुप कर आगरा से निकल गए। यह घटना भारतीय इतिहास की सबसे रोमांचक घटनाओं में गिनी जाती है। आगरा से लौटने के बाद शिवाजी ने पुनः अपनी शक्ति का संगठन किया और अनेक क्षेत्रों को मुक्त कराया।
लगातार सैन्य सफलताओं और जनसमर्थन के बावजूद एक समस्या बनी हुई थी। उस समय तक शिवाजी व्यवहारिक रूप से एक स्वतंत्र शासक थे, किंतु उन्हें औपचारिक रूप से सार्वभौम राजा की मान्यता प्राप्त नहीं थी। भारतीय परंपरा में राज्याभिषेक केवल राजतिलक नहीं होता बल्कि वह शासक की वैधानिक, धार्मिक और राजनीतिक मान्यता का प्रतीक होता है। इसी कारण राज्याभिषेक का निर्णय लिया गया। वाराणसी के प्रसिद्ध विद्वान गागा भट्ट को आमंत्रित किया गया। उन्होंने शिवाजी की वंशावली का परीक्षण कर उन्हें सिसोदिया राजवंश से संबंधित क्षत्रिय घोषित किया।
6 जून 1674 को रायगढ़ दुर्ग पर भव्य राज्याभिषेक समारोह संपन्न हुआ। देश के विभिन्न भागों से विद्वान, संत, राजपुरुष और प्रतिनिधि इस अवसर पर उपस्थित हुए। पवित्र नदियों का जल मंगवाया गया। वैदिक मंत्रों के बीच शिवाजी महाराज का अभिषेक किया गया और उन्हें “छत्रपति” की उपाधि प्रदान की गई। उनके नाम से स्वर्ण मुद्राएं जारी की गईं। संस्कृत और मराठी को प्रशासनिक महत्व दिया गया। यह राज्याभिषेक उस युग में अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि इसके माध्यम से हिंदू राजनीतिक सत्ता की पुनर्स्थापना का औपचारिक उद्घोष हुआ।
इतिहासकारों का मत है कि राज्याभिषेक का महत्व केवल मराठा राज्य की स्थापना तक सीमित नहीं था। यह भारतीय समाज में आत्मविश्वास का संचार करने वाली घटना थी। लंबे समय से विदेशी शासकों के प्रभुत्व के कारण उत्पन्न हीन भावना को इसने चुनौती दी। शिवाजी ने यह सिद्ध किया कि भारतीय परंपराओं, मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर भी एक शक्तिशाली और सुशासित राज्य की स्थापना संभव है।
शिवाजी महाराज ने एक कुशल प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की। अष्टप्रधान परिषद का गठन किया गया, जिसमें विभिन्न विभागों के मंत्री शामिल थे। राजस्व व्यवस्था को व्यवस्थित किया गया। किसानों के हितों की रक्षा की गई। महिलाओं के सम्मान को विशेष महत्व दिया गया। युद्ध के दौरान महिलाओं और धार्मिक स्थलों को क्षति न पहुंचाने के स्पष्ट निर्देश दिए गए। समुद्री सुरक्षा के लिए एक सशक्त नौसेना का निर्माण किया गया, जो उस समय के भारतीय शासकों में अत्यंत दुर्लभ था।
राज्याभिषेक के बाद मराठा शक्ति निरंतर बढ़ती गई। शिवाजी के उत्तराधिकारियों और मराठा सरदारों ने आगे चलकर पूरे भारत में अपना प्रभाव स्थापित किया। अठारहवीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य भारत की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति बन गया। दिल्ली तक मराठों का प्रभाव स्थापित हुआ। इस प्रकार रायगढ़ में हुआ वह राज्याभिषेक आगे चलकर भारतीय राजनीति की दिशा बदलने वाली घटना सिद्ध हुआ।
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी शिवाजी महाराज की स्मृति ने राष्ट्रीय चेतना को प्रेरित किया। शिवाजी का जीवन और कार्य भारतीय स्वाभिमान के आदर्श बन गए। स्वतंत्रता संग्राम के अनेक क्रांतिकारियों ने शिवाजी से प्रेरणा प्राप्त की। उनके साहस, संगठन क्षमता और राष्ट्रनिष्ठा को भारतीय युवाओं के लिए आदर्श माना गया।
आज हिंदू साम्राज्य दिवस केवल एक ऐतिहासिक तिथि का स्मरण नहीं है। यह स्वराज्य, सुशासन, सांस्कृतिक आत्मगौरव और राष्ट्रीय एकता के उन आदर्शों का स्मरण है जिनके लिए शिवाजी महाराज ने अपना जीवन समर्पित किया। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सेना या आर्थिक संसाधनों में नहीं होती बल्कि उसके लोगों के आत्मविश्वास, सांस्कृतिक चेतना और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण में निहित होती है।
रायगढ़ के सिंहासन पर बैठकर छत्रपति शिवाजी महाराज ने जिस स्वराज्य का उद्घोष किया था, वह केवल महाराष्ट्र की सीमाओं तक सीमित नहीं था। उसमें समूचे भारत के लिए स्वतंत्रता, सम्मान और आत्मनिर्भरता का संदेश निहित था। इसी कारण हिंदू साम्राज्य दिवस भारतीय इतिहास की एक ऐसी गौरवशाली स्मृति है जो हमें अपने अतीत से प्रेरणा लेने, वर्तमान को सुदृढ़ बनाने और भविष्य के लिए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक भारतीय इतिहास में उस दीपस्तंभ की तरह है जिसकी ज्योति सदियों बाद भी स्वाभिमान, साहस और राष्ट्रभक्ति का मार्ग आलोकित कर रही है।




