(*दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ. पूजा सिंह शिक्षाविद् एवं वरिष्ठ पत्रकार*)
राष्ट्रीय शिक्षा नीति ( एनईपी ) 2020 को लागू हुए अब छह साल (2026) हो चुके हैं। 34 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद आई इस नीति का विजन बेहद शानदार था—रटने की विद्या को खत्म करना, स्किल डेवलपमेंट पर ज़ोर देना और 10+2 के पुराने मॉडल को 5+3+3+4 के नए मनोवैज्ञानिक ढांचे में ढालना। कागज़ पर यह नीति विश्वस्तरीय नज़र आती है, लेकिन किसी भी नीति की असली परीक्षा उसकी ज़मीनी हकीकत यानी हमारे सरकारी स्कूलों में होती है। आइए एक निष्पक्ष आकलन करते हैं कि यह नीति फाइलों से निकलकर ज़मीन पर कितनी उतरी है और क्या सच में सरकारी स्कूलों के बच्चों को इसका फायदा मिल रहा है।
कागज़ से ज़मीन तक: क्या हुए हैं सकारात्मक बदलाव?
ज़मीनी स्तर पर यह मानना होगा कि बदलाव की बयार शुरू हो चुकी है, खासकर स्ट्रक्चरल स्तर पर:
• 5+3+3+4 ढांचे की शुरुआत: कई राज्यों ने पुराने सिस्टम को छोड़कर इस नए सिस्टम को अपना लिया है। आंगनवाड़ी केंद्रों को प्राइमरी स्कूलों के साथ जोड़ने का काम तेजी से हुआ है, जिससे प्री-प्राइमरी एजुकेशन को एक औपचारिक ढांचा मिला है।
• निपुण भारत का असर: तीसरी कक्षा तक के बच्चों में ‘बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान’ विकसित करने पर बहुत ज़ोर दिया जा रहा है। हालिया शैक्षणिक रिपोर्ट बताती हैं कि सरकारी स्कूलों में गणित और भाषा की बुनियादी समझ में पहले के मुकाबले सुधार दर्ज किया गया है।
• पीएम श्री स्कूल: देश भर में 13,000 से अधिक स्कूलों को ‘पीएम श्री’ स्कूलों के रूप में अपग्रेड किया जा रहा है। ये स्कूल एनईपी की ‘प्रयोगशाला’ के रूप में काम कर रहे हैं, जहाँ स्मार्ट क्लासरूम, खेल आधारित पढ़ाई और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर देखने को मिल रहा है।
• कौशल विकास की एंट्री: छठी कक्षा से वोकेशनल ट्रेनिंग शुरू करने का लक्ष्य धीरे-धीरे ज़मीन पर उतर रहा है। कई सरकारी स्कूलों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रिटेल और एग्रीकल्चर जैसे विषय जोड़े गए हैं और ‘बैगलेस डेज़’ के तहत बच्चों को स्थानीय कला और शिल्प से रूबरू कराया जा रहा है।
सरकारी स्कूलों की ज़मीनी चुनौतियाँ: कहाँ अटक रही है नीति?
तमाम प्रयासों के बावजूद, सरकारी स्कूलों की कुछ बुनियादी कमज़ोरियाँ इस नीति के सौ प्रतिशत क्रियान्वयन में बड़ा रोड़ा बनी हुई हैं:
1. शिक्षकों की ट्रेनिंग में कमी
यह एनईपी की सबसे बड़ी चुनौती है। नीति कहती है कि शिक्षकों को ‘कम्पेटेंसी-बेस्ड’ (दक्षता आधारित) शिक्षा देनी है, लेकिन सरकारी स्कूलों के कई शिक्षक आज भी पुराने तरीके से पढ़ाने के अभ्यस्त हैं। जब तक शिक्षकों को सिर्फ किताबी ज्ञान की जगह व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं मिलेगा, तब तक कक्षा के भीतर रटने की आदत खत्म नहीं होगी।
2. डिजिटल और इंफ्रास्ट्रक्चर डिवाइड:
नीति में डिजिटल एजुकेशन और दीक्षा जैसे प्लेटफॉर्म्स की बात है, लेकिन टियर-2, टियर-3 शहरों और ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में अभी भी निर्बाध इंटरनेट और कंप्यूटर लैब्स का अभाव है।
3. असेसमेंट (मूल्यांकन) का तरीका:
एनईपी ने ‘परख’ के ज़रिए 360-डिग्री मूल्यांकन की बात कही थी, ताकि छात्रों का चहुंमुखी आकलन हो सके। लेकिन अभी भी ज़्यादातर बोर्ड परीक्षाएं उसी पुराने नंबरों की रेस पर टिकी हैं। जब तक परीक्षा का पैटर्न पूरी तरह नहीं बदलेगा, तब तक छात्र रटने से आज़ाद नहीं हो पाएंगे।
4. राज्यों के बीच भारी असमानता:
शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे कुछ राज्यों ने इसे तेज़ी से अपनाया है, लेकिन कई राज्यों में बजट की कमी और राजनीतिक कारणों से इसका क्रियान्वयन बेहद सुस्त है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति का विज़न वैश्विक स्तर का है, लेकिन इसे ज़मीन पर पूरी तरह उतारने के लिए सबसे बड़ी शर्त है फंडिंग। जब तक केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च करने का लक्ष्य हासिल नहीं कर लेतीं, तब तक सरकारी संस्थानों में स्मार्ट लैब्स, एआई टूल्स और बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर पहुंचाना एक चुनौती बना रहेगा। साथ ही, शिक्षकों के पुराने ‘माइंडसेट’ को बदलना इस नीति की सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है। अगर सरकारी स्कूलों के चश्मे से देखें, तो इंफ्रास्ट्रक्चर और बुनियादी शिक्षा के मोर्चे पर इसके फायदे दिखने लगे हैं। ड्रॉपआउट रेट कम हुआ है और ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो ( जीईआर ) बढ़ा है। लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शिक्षकों का माइंडसेट बदलना और ग्रामीण-शहरी स्कूलों की खाई को पाटना अभी बाकी है।
नीति कागज़ पर शत-प्रतिशत सही है, लेकिन इसे ज़मीन पर 100% उतारने के लिए सरकार को जीडीपी का 6% शिक्षा पर खर्च करने के अपने वादे को जल्द से जल्द हकीकत में बदलना होगा। तभी भारत का ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ सही मायनों में देश की ताकत बनेगा।