
शहीद भगतसिंह की जयंती पर विशेष
(दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ.लोकेश कुमार चन्देल)
जयपुर। भगत सिंह का अपने अदम्य साहस, क्रांतिकारी विचारों और सर्वोच्च बलिदान से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अभूतपूर्व योगदान रहा है। देश की आजादी में स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह का नाम बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। 28 सितंबर को शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जयंती मनाई जाती है। उनका जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के बंगा गांव (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनके जन्म के समय उनके पिता जेल से रिहा हुए थे, इसलिए उनकी दादी ने उनका नाम ‘भागां वाला’ (भाग्य वाला) रखा था, जिन्हें बाद में भगत सिंह के नाम से जाना जाने लगा। उन्होंने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा दिया, नारे को देश भर में लोकप्रिय बनाया जो स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य स्वर बन गया। जो देश की आजादी की लड़ाई का मुख्य जोश भरा नारा बनकर उभरा, जो व्यवस्थाओं के खिलाफ ऐलान ए जंग की बात करता था। उन्होंने 1926 में युवाओं में राष्ट्रप्रेम जगाने के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की। इसके बाद हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़कर क्रांतिकारी आंदोलन को मजबूती प्रदान की। वे लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए 1928 में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स को लाहौर में गोली मार दी थी। उन्होंने 8 अप्रैल 1929 को बटुकेश्वर दत्त के साथ दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बहरी हो चुकी ब्रिटिश सरकार को जगाने के लिए पर्चे फेंके और धमाका कर दिया था।
वे ऐसे क्रांतिकारी थे जो अव्यवस्थाओं और मानवाधिकार के लिए संघर्ष किया जिसका उदाहरण है कि वे जेल में भारतीय और यूरोपीय कैदियों के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ लंबी भूख हड़ताल करके समानता की मांग रखी। वे मात्र 23 वर्ष की आयु में 23 मार्च, 1931 सुखदेव और राजगुरु के साथ हंसते-हंसते फाँसी के फंदे को फूलों का हार समझकर पहन लिया , जिससे पूरे देश में क्रांति की नई दिशा प्रदान की । उनके प्रमुख सिद्धांत समाजवाद, मार्क्सवाद, नास्तिकता और वास्तविक सामाजिक परिवर्तन पर आधारित थे। उनके मुख्य वैचारिक सिद्धांत समाजवाद , वामपंथी विचारधारा और कार्ल मार्क्स, व्लादिमीर लेनिन और लियोन त्रोत्सकी से काफी प्रभावित थे। उनकी तमन्ना थी कि भारत को एक शोषणमुक्त समाजवादी गणराज्य बने। वे कहा करते थे कि ‘पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।’ उनके लिए क्रांति का अर्थ केवल खून-खराबा या हिंसा नहीं, बल्कि समाज से असमानता और शोषण को जड़ से समाप्त करना था। वे हमेशा धार्मिक कट्टरता और पाखंड का लगातार विरोध करते रहे। वे स्पष्ट कहा करते थे कि प्रगति के मार्ग में धर्म और अंधविश्वास एक बड़ी बाधा हैं। भगत सिंह ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ में तार्किक आधार पर नास्तिकता का समर्थन किया । वे किसी भी प्रकार के औपनिवेशिक शासन, पूंजीवादी शोषण और मनुष्य द्वारा मनुष्य के उत्पीड़न के कट्टर विरोधी थे। उनका लक्ष्य एक ऐसा समाज बनाना था, जहां किसानों, मजदूरों और आम जनता को बराबरी के अधिकार मिलें और किसी का आर्थिक या सामाजिक शोषण नहीं हो।
अछूतो की समस्या का हल करने का प्रयासः- 1920 के दशक में राष्ट्रीय आंदोलन अपनी गति से आगे बढ़ रहा था और एक जन आंदोलन में तब्दील हो गया था। डॉ. भीमराव अंबेडकर भी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका में आ गए थे। और अछूत समस्या की गुत्थी सुलझाने के लिए साथक प्रायस प्रारंभ हो गए । इसी बीच भगत सिंह ने “किरती” नामक पंजाबी पत्रिका में ‘अछूत का सवाल’ लेख लिखा जोकि जून 1928 में प्रकाशित हुआ। इस लेख में श्रमिक वर्ग की शक्ति व सीमाओं का अनुमान लगाकर उसकी प्रगति के लिए एकदम ठोस सुझाव प्रदान किए । सिंध के नूर मोहम्मद का संदर्भ देते हुए वो हमेशा कहते थे कि जब तुम एक इंसान को पीने के लिए पानी देने से मना करते हो, स्कूल में पढ़ने का अधिकार नहीं देते, भगवान के मंदिर में प्रवेश करने से वंचित करते हैं और एक इंसान के समान अधिकार देने से इन्कार करते हो। ऐसी स्थिति में तुम अधिक राजनीतिक अधिकार मांगने के अधिकारी कैसे बन गए? वे लगातार कहते थे कि एक कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है परंतु एक इंसान के छुने मात्र से हमारा धर्म भ्रष्ट हो जाता है। आखिर यह कैसी विडंबना है? इस समस्या के निदान के बारे में वे बताते थे कि सबसे पहले यह निर्णय कर लेना चाहिए कि सब इन्सान समान हैं और न तो जन्म से कोई भिन्न पैदा हुआ और न कार्य-विभाजन से। वे अछूत कौम को स्पष्ट रुप से संगठित होने का आह्वान करते हैं। भगत सिंह अछूतो और श्रमिको को असली सर्वहारा के रूप में घोषित करते हुए कहा करते थे कि दूसरो की ओर मुंह न ताको, संगठित हो जाओ। सामाजिक आंदोलन से क्रांति पैदा कर दो और राजनीतिक, आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लो।
*सांप्रदायिक समस्या” का भी निकाला हल**-
असहयोग और खिलाफत आंदोलन की समाप्त होने के बाद मुस्लिम लीग और कांग्रेस के रास्ते अलग-अलग हो गए। इसी दशक में देशभर में सांप्रदायिक दंगे भड़कने लगे। 1926 में कलकत्ता में एक भयानक रूप लिए दंगा हुआ। संयुक्त प्रांत में 1923 और 1927 के बीच लगभग 88 दंगों का मामले सामने आए। इस कारण से हिंदू-मुस्लिम संबंध लगभग पूरी तरह समाप्त हो गए। इसी समस्या से निजात दिलाने के लिए उन्होंने किरती पत्रिका में “सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज” लेख लिखा। इस लेख में वे सांप्रदायिकता के आलोक में भारत के भविष्य पर प्रश्न उठाते हुए लिखा था कि दंगों का इलाज भारत की आर्थिक दशा में सुधार लाने की आवश्यकता है। भारत के लोगो की आर्थिक हालत इतनी खराब है कि उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ भड़काना काफी आसान है। क्योंकि भूखा व्यक्ति अपने सिद्धांत से समझौता कर लेता है। वे लोगो को परस्पर जोड़ने के लिए वर्ग-चेतना की समझ को आवश्यक बताते हैं। वर्ग चेतना की समझ से युक्त व्यक्ति धार्मिक दंगों में कभी नही उलझता। वे धर्म को राजनीति से अलग करने पर बल देते हैं कि धर्म एक व्यक्तिगत मामला है, उसे राजनीति में शामिल नहीं करना चाहिए। वे कहते थे कि यदि सांप्रदायिकता को खत्म करना है तो हमें किसी भी व्यक्ति को ‘इन्सान’ के रूप में देखना होगा, किसी ‘धर्म विशेष के व्यक्ति के रूप में’। बहरहाल, हम यही कह सकते हैं कि भगत सिंह के संपूर्ण व्यक्तित्व को देखा जाए तो उन्हें मात्र क्रान्तिकारी संबोधित करना न्यायसंगत नहीं होगा। क्योंकि वे एक सशक्त क्रांतिकारी होने के साथ साथ एक विचारक,चिंतक और बुद्धिजीवी व्यक्तित्व के धनी थे। वे अन्य क्रान्तिकारियों से विशिष्ट थे क्योंकि वे राष्ट्र निर्माण का वैकल्पिक विचार रखते थे।





