
27 सितंबर, अशोक सिंघल जयंती पर विशेष
दिव्यराष्ट्र के लिए लेखाराम बिश्नोई जोधपुर
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन भारतीय सार्वजनिक जीवन के उन आंदोलनों में है, जिसने धर्म, संस्कृति, इतिहास और समाज के प्रश्नों को एक साथ राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया। इस आंदोलन के अनेक संतों, साधु-संतों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और संगठनकर्ताओं ने अपनी-अपनी भूमिका निभाई। इनमें अशोक सिंघल का स्थान एक प्रमुख संगठनकर्ता और हिन्दू समाज को व्यापक स्तर पर संगठित करने वाले व्यक्तित्व के रूप में रहा।
अशोक सिंघल के लिए राम केवल मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित होने वाले आराध्य नहीं थे। हिन्दुत्व की उनकी समझ में श्रीराम भारतीय जीवन-दृष्टि, मर्यादा, कर्तव्य, त्याग और लोकमंगल के प्रतीक थे। इसलिए रामजन्मभूमि का प्रश्न उनके लिए केवल एक धार्मिक स्थल से जुड़ा प्रश्न नहीं था; वे इसे हिन्दू समाज की सांस्कृतिक स्मृति, आत्मसम्मान और संगठन से जोड़कर देखते थे।
अशोक सिंघल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह थी कि वे हिन्दू समाज को अनेक पंथों, संप्रदायों, जातियों और क्षेत्रों में विभाजित इकाइयों के रूप में देखने के बजाय एक व्यापक सांस्कृतिक समाज के रूप में संगठित करने की आवश्यकता पर बल देते थे।
राम इस दृष्टि के लिए स्वाभाविक केंद्र बने। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक श्रीराम की कथा लोकजीवन में विभिन्न रूपों में विद्यमान रही है। रामायण की परंपराएं भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकती हैं, लेकिन राम के प्रति श्रद्धा ने उन्हें एक सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ा है।
अशोक सिंघल ने इसी सांस्कृतिक एकात्मता को संगठनात्मक शक्ति में बदलने का प्रयास किया। रामशिला पूजन, रामज्योति, राम-जानकी यात्रा, धर्म संसद और संत सम्मेलन जैसे कार्यक्रम केवल आयोजन नहीं थे। इनके माध्यम से वे देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले हिन्दू समाज को एक साझा सांस्कृतिक प्रश्न से जोड़ने का प्रयास कर रहे थे। यही कारण था कि रामजन्मभूमि आंदोलन धीरे-धीरे अयोध्या की सीमाओं से बाहर निकलकर गांवों, कस्बों और शहरों तक पहुंचा।
अशोक सिंघल की वैचारिक पृष्ठभूमि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक जीवन से बनी थी। उनके लिए हिंदुत्व को केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं किया जा सकता था। हिंदुत्व उनके चिंतन में भारत की सांस्कृतिक परंपरा, जीवन-मूल्यों, राष्ट्रबोध और समाज की एकात्म चेतना से जुड़ा हुआ था। उनकी कार्यपद्धति का मूल सूत्र था—धार्मिक आस्था को सामाजिक संगठन से जोड़ना। मंदिर की आकांक्षा को उन्होंने केवल संतों या धार्मिक संस्थाओं तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने इसे सामान्य हिन्दू परिवारों तक पहुंचाने के लिए व्यापक जनसंपर्क का सहारा लिया। रामशिला पूजन में घर-घर से शिलाओं का जुड़ना इसी भाव का प्रतीक बना। एक साधारण परिवार भी यह अनुभव कर सकता था कि अयोध्या में बनने वाले मंदिर से उसका व्यक्तिगत और सांस्कृतिक संबंध है। इस प्रक्रिया में मंदिर एक स्थान न रहकर सामूहिक आस्था का प्रतीक बन गया।
हिन्दू समाज की विविधता जितनी व्यापक है, उसकी धार्मिक परंपराएं भी उतनी ही विविध हैं। अलग-अलग अखाड़ों, मठों, पीठों और संप्रदायों के संतों को एक साझा आंदोलन के लिए साथ लाना सरल कार्य नहीं था।
अशोक सिंघल की संगठनात्मक क्षमता का महत्वपूर्ण पक्ष यही था कि उन्होंने संत समाज के बीच लगातार संवाद स्थापित किया। वे स्वयं को आंदोलन के ऊपर रखने के बजाय संतों के मार्गदर्शन में कार्य करने वाले कार्यकर्ता के रूप में प्रस्तुत करते थे। धर्म संसदों और संत सम्मेलनों के माध्यम से विभिन्न परंपराओं के संतों को एक मंच पर लाने का प्रयास हुआ। इससे रामजन्मभूमि का विषय व्यापक धार्मिक विमर्श का हिस्सा बना।
यहां अशोक सिंघल की भूमिका एक ऐसे संयोजक की थी, जो विविध धार्मिक शक्तियों को एक साझा उद्देश्य के लिए संवाद और संगठन के सूत्र में बांध सके। राम मंदिर आंदोलन की विशेषता उसकी व्यापक जनभागीदारी रही। रामशिला पूजन इसका एक प्रमुख उदाहरण बना।
देश के विभिन्न हिस्सों से पूजित शिलाओं को अयोध्या भेजने का कार्यक्रम प्रतीकात्मक रूप से यह संदेश देता था कि मंदिर किसी एक व्यक्ति, संस्था या क्षेत्र का विषय नहीं है। इसमें परिवार, गांव और समाज की सहभागिता होनी चाहिए।
अशोक सिंघल की संगठनात्मक दृष्टि में ऐसे प्रतीकों का महत्व था। वे जानते थे कि किसी बड़े सामाजिक अभियान को केवल भाषणों से व्यापक आधार नहीं मिलता। उसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को सहभागी बनाना पड़ता है। इसलिए राम मंदिर आंदोलन में पूजा, यात्रा, शिला, ज्योति, संकल्प और संत सम्मेलन जैसे अनेक माध्यम विकसित हुए। इन माध्यमों ने आंदोलन को एक व्यापक सामाजिक अभियान का रूप दिया।
अशोक सिंघल के चिंतन में राम मंदिर आंदोलन का एक बड़ा उद्देश्य हिन्दू समाज का संगठन था। उनके दृष्टिकोण में लंबे समय से हिन्दू समाज के सामने एक बड़ी चुनौती उसकी आंतरिक विभाजक रेखाएं थीं।
राम भारतीय लोकजीवन में केवल मंदिर के देवता नहीं हैं। वे वनवासी समाज की स्मृतियों में भी हैं, ग्राम्य परंपराओं में भी, भक्ति साहित्य में भी और परिवार की कथाओं में भी। रामकथा ने भारत के अनेक समुदायों को अपने-अपने ढंग से प्रभावित किया है। अशोक सिंघल ने इसी व्यापक सांस्कृतिक स्वीकार्यता को हिन्दू समाज की एकता के आधार के रूप में देखा। इस दृष्टि से राम मंदिर आंदोलन उनके लिए मंदिर निर्माण के साथ समाज निर्माण का अभियान भी था।
1984 की धर्म संसद के बाद रामजन्मभूमि का प्रश्न संगठित रूप से राष्ट्रीय स्तर पर उभरने लगा। इसके बाद आंदोलन ने अनेक चरण देखे—राम-जानकी यात्रा, रामशिला पूजन, संत सम्मेलनों और धर्म संसदों से लेकर व्यापक जनसंपर्क तथा कारसेवा तक। 1989 के शिलान्यास और उसके बाद के घटनाक्रमों ने आंदोलन को और व्यापक बनाया। हजारों कार्यकर्ता और श्रद्धालु इससे जुड़े। राम मंदिर की मांग धीरे-धीरे राष्ट्रीय विमर्श का महत्वपूर्ण विषय बन गई। इस पूरी प्रक्रिया में सिंघल की भूमिका मंच से भाषण देने वाले नेता की अपेक्षा संगठन खड़ा करने वाले कार्यकर्ता की अधिक थी। उनका ध्यान देश के अलग-अलग क्षेत्रों में संपर्क, संतों के समन्वय और कार्यकर्ताओं को जोड़ने पर रहता था।
6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी ढांचा गिराया गया। यह भारतीय इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग है। रामजन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल होने के कारण अशोक सिंघल का नाम इस कालखंड के साथ गहराई से जुड़ा रहा।
अशोक सिंघल के लिए मंदिर केवल स्थापत्य नहीं था। मंदिर संस्कृति का केंद्र था। उनकी दृष्टि में मंदिर के साथ समाज, संस्कार और राष्ट्रीय चेतना का संबंध था।
राम मंदिर के प्रश्न को वे हिन्दू समाज की आत्मचेतना से जोड़ते थे। उनके विचार में यदि समाज अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों और प्रतीकों से कट जाता है, तो उसकी सामूहिक पहचान कमजोर होती है। इसीलिए राम मंदिर आंदोलन में मंदिर के साथ-साथ रामकथा, संत परंपरा, धार्मिक यात्राएं और सामाजिक संपर्क भी महत्वपूर्ण बने। इस दृष्टि से उनका हिन्दुत्व केवल प्रतिरोध की भाषा तक सीमित नहीं था। उसमें सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक संगठन का आग्रह भी था।
अशोक सिंघल के जीवन की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि इतने बड़े आंदोलन के प्रमुख चेहरों में रहने के बावजूद वे स्वयं को संघ का प्रचारक मानते रहे। पद उनके लिए साधन था, ध्येय नहीं।
राम मंदिर आंदोलन में उनकी भूमिका को समझते हुए यह पक्ष विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। उन्होंने अपने जीवन के लगभग सात दशक संगठन और समाजकार्य में लगाए। इंजीनियर बनने के बाद व्यक्तिगत जीवन की सुविधाओं को छोड़कर प्रचारक बनना और फिर विश्व हिन्दू परिषद के माध्यम से हिंदू समाज के व्यापक संगठन में लग जाना उनकी जीवन-दृष्टि को स्पष्ट करता है। उनके लिए संगठन का अर्थ केवल संख्या बढ़ाना नहीं था। संगठन का अर्थ था—समाज के भीतर सांस्कृतिक चेतना, आत्मविश्वास और परस्पर संपर्क का निर्माण।
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण आज एक ऐतिहासिक तथ्य है। इसलिए अशोक सिंघल की जयंती पर उनके जीवन को केवल आंदोलन के संघर्ष तक सीमित करके देखना पर्याप्त नहीं होगा। यदि राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, तो सामाजिक जीवन में मर्यादा कैसे आए? यदि राम लोकमंगल के प्रतीक हैं, तो समाज में सेवा कैसे बढ़े? यदि राम सबको साथ लेकर चलने वाले आदर्श हैं, तो सामाजिक समरसता कैसे मजबूत हो? यदि राम त्याग और कर्तव्य के प्रतीक हैं, तो व्यक्तिगत जीवन में कर्तव्यबोध कैसे आए?
27 सितंबर को अशोक सिंघल की जयंती हम सबके लिए स्मरण और प्रेरणा का अवसर है। उनका जीवन दिखाता है कि किसी सांस्कृतिक प्रश्न को समाजव्यापी आंदोलन में बदलने के लिए दीर्घकालीन संगठन, निरंतर संपर्क और व्यक्तिगत समर्पण की आवश्यकता होती है।
राम मंदिर आंदोलन में उनका योगदान इसी संगठनात्मक दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देता है। उन्होंने राम को भारतीय सांस्कृतिक चेतना के केंद्र में रखते हुए हिन्दू समाज की व्यापक भागीदारी को संगठित करने का प्रयास किया।
अशोक सिंघल के जीवन को हिन्दुत्व की दृष्टि से एक सूत्र में देखा जाए तो वह सूत्र है—आस्था से आत्मबोध, आत्मबोध से संगठन और संगठन से सांस्कृतिक पुनर्जागरण।
उनकी जयंती पर यही प्रश्न अधिक प्रासंगिक है कि राम मंदिर की उपलब्धि को केवल एक ऐतिहासिक पड़ाव न मानकर राम के आदर्शों—मर्यादा, कर्तव्य, सेवा, त्याग, समरसता और लोकमंगल—को सामाजिक जीवन में कितना उतारा जा सकता है।
अशोक सिंघल के लिए राम केवल अयोध्या में प्रतिष्ठित होने वाले भगवान नहीं थे; वे भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना के जीवंत प्रतीक थे। इसीलिए राम मंदिर आंदोलन में उनकी भूमिका को समझना वस्तुतः उस व्यापक हिन्दुत्व चेतना को समझना है, जिसमें मंदिर के साथ समाज, आस्था के साथ संगठन और संस्कृति के साथ राष्ट्रबोध को जोड़ा गया।




