दिव्य राष्ट्र के लिए वरिष्ठ पत्रकार गुलाब बत्रा
”मेरा फुटपाथ मुझे लौटा दो” — इस वाक्य से राजस्थान के वयोवृद्ध पत्रकार प्रवीण चंद्र छाबड़ा ने मुख्यमंत्री स्तर पर पैदल चलने वाले लोगों के लिए फुटपाथ सुरक्षित रखने की गुहार कई बार की। एक-दो अवसरों पर तो मैं स्वयं इसका गवाह रहा हूँ, लेकिन शासक वर्ग ने आम आदमी की सुरक्षा की दृष्टि से इस मांग को अनदेखा ही किया। भले ही प्रशासन स्तर पर कभी-कभार फुटपाथों को सुगम्य बनाने की कवायद की गई हो, लेकिन फुटपाथ अतिक्रमण के शिकंजे से मुक्त नहीं हो पाए, यह कड़वा सच है।
सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ पर चलने को नागरिकों का मौलिक अधिकार मानने के निर्देश देकर शासन-प्रशासन के मुंह पर करारा तमाचा मारा है। मोटर दुर्घटना के एक प्रकरण में गत 19 जून 2026 को उच्चतम न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्देश में आवागमन और जीवन के अधिकार संबंधी संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क), अनुच्छेद 19(1)(ख) एवं अनुच्छेद 19(1)(ग) के अन्तर्गत पैदल यात्रियों के अधिकार को सर्वोपरि घोषित करने के साथ-साथ इसे मोटर वाहनों की आवाजाही की तुलना में प्राथमिकता देने की बात कही है।
अदालत ने केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय को इस निर्देश को देश के सभी स्थानीय निकायों को अवगत कराने के लिए भी पाबंद किया है। इस मुद्दे की गंभीरता को समझते हुए शीर्ष अदालत ने नियामक निकाय गठित करने पर बल दिया है। न्यायमूर्ति जी. एस. नरसिम्हा एवं ए. एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि निर्धारित फुटपाथ पर चलना अनुच्छेद 21 और 19(1)(डी) का अहम हिस्सा है। इसके लिए कोई कानून नहीं है, इसलिए फुटपाथ पर चलने वालों के मौलिक अधिकार के क्रियान्वयन के लिए कानूनी ढांचा बनाना अपेक्षित है। इसके उल्लंघन पर नुकसान की भरपाई का दावा करने का भी अधिकार है। पीठ ने माना है कि मोटर वाहन अधिनियम 1988 से पैदल चलने वालों के अधिकार कम हुए हैं।
शीर्ष अदालत की भावना के अनुरूप बिना किसी बाधा के पैदल चलने के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए सभी स्तरों पर आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता है। सबसे पहले फुटपाथों को सही तरीके से सीमांकित किया जाना चाहिए और इस पर किसी तरह के अतिक्रमण को बर्दाश्त करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। कठोर कानून बनाकर इसका अनुपालन होना चाहिए; दरअसल प्रशासनिक मुस्तैदी से ही फुटपाथों की सुरक्षा संभव है। शहरों में स्थानीय निकाय अन्य सरकारी एजेंसियों के तालमेल से पदयात्रियों के इस मौलिक अधिकार की सुरक्षा कर सकते हैं। इस जिम्मेदारी में कोताही बरतने पर संबंधित कार्मिकों को दंडित करने का प्रावधान अपरिहार्य है। जयपुरवासियों को ध्यान होगा जब शहरी परकोटे में दुकानों के आगे बने बरामदों के फुटपाथ की सुरक्षा के लिए बरामदे खाली कराने तथा अन्य अतिक्रमण हटाने के लिए ‘ऑपरेशन पिंक’ चलाया गया। आनन फानन में फौरी कार्रवाई हुई, लेकिन शासन-प्रशासन बदलते ही फुटपाथ फिर अतिक्रमण के शिकार होते गए।
यही हाल प्रदेश के अन्य शहरों-कस्बों में देखा जा सकता है। फुटपाथों पर अतिक्रमण हटाने के अभियान कागजी कार्रवाई तक सिमट जाते हैं, इसलिए फुटपाथों को प्राथमिकता मिले तथा अतिक्रमणकर्ता को अतिशीघ्र दंडित करने की व्यवस्था रहे। फुटपाथों पर अतिक्रमण से पैदल यात्री सड़कों पर चलने की मजबूरी में सड़क दुर्घटनाओं के शिकार होकर काल का ग्रास बनते हैं। वर्ष 2023 में सड़क दुर्घटना मामलों में मारा गया हर पांचवां व्यक्ति पदयात्री था। सिंगापुर में आम नागरिक को फुटपाथ पर चलने के साथ-साथ वाहनों के आवागमन को रोककर सड़क पार करने तक की सुविधा प्राप्त है, जबकि भारत में तो ऐसी आदर्श स्थिति का सपना कल्पना से परे है।
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