
दिव्य राष्ट्र के लिए सुभाष राज,स्वतंत्र पत्रकार
कतर की राजधानी दोहा में दक्षिण एशिया के सामरिक शक्ति केन्द्र भारत के पडोसी पाकिस्तान, तुर्की, क़तर और इंडोनेशिया के बीच बहुपक्षीय ‘बद्र समझौते पर हस्ताक्षर हिंद महासागर से भारत की उत्तरी-पश्चिमी सीमाओं तक रक्षा उत्पादन का ऐसा ढांचा तैयार करने का प्रयास है जो युद्धकालीन परिस्थिति में पाकिस्तान को हथियारों की सप्लाई कट जाने के बाद भी मुकाबले में ठहर सके। ठीक ईरान की तरह जिसकी सप्लाई लाइन पिछले दो साल से कटी हुई है लेकिन ईरान की पलटवार क्षमता बरकरार है।
इस समझौते के तहत वैश्विक ड्रोन बाजार के हैवीवेट के रूप में उभरे तुर्की की सैन्य तकनीक और अनुसंधान का पाकिस्तान के रक्षा नेटवर्क में सीधा प्रवेश होगा और तुर्की की सहायता से पाकिस्तान में ड्रोन फैक्ट्रियां लगाई जाएंगी।
ऐसे समय में जब आधुनिक युद्ध पारंपरिक तोपों और लड़ाकू जहाजों से इतर मानवरहित हवाई वाहनों और ड्रोन स्वार्म मुख्य लड़ाकू ताकत के रूप में उभर रहे हैं।
सीमा पार तुर्की की तकनीक का पहुंचना भारत के लिए खतरे की घंटी है। लेकिन इससे पहले सवाल है कि क्या पाकिस्तान और तुर्की की यह तकनीकी जुगलबंदी भारत के रक्षा कवच में कोई सेंध लगा सकती है? या फिर भारत का तेजी से उभरता स्वदेशी ड्रोन पारिस्थितिकी तंत्र और सैन्य रणनीति पाकिस्तान को किसी भी दुस्साहस का 1971 जैसा ही करारा जवाब देने में सक्षम है?
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के हालिया आंकड़े टटोलें तो पता चलता है कि तुर्की ने बीते पांच वर्षों में अपने रक्षा निर्यात में 122 प्रतिशत की अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की है। बायराक्तार टीबी-2 और अंता जैसे उन्नत लड़ाकू ड्रोन्स के बूते अंकारा दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ड्रोन शक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है। अज़रबैजान-आर्मेनिया संघर्ष और पूर्वी यूरोप के युद्ध क्षेत्रों में तुर्की निर्मित ड्रोन्स ने यह साबित किया है कि कम लागत में सटीक और घातक प्रहार कैसे किए जाते हैं। बद्र समझौते के माध्यम से पाकिस्तान को इसी तुर्की तकनीक, अनुसंधान एवं विकास और संयुक्त निर्माण परियोजनाओं तक सीधी पहुंच मिलेगी।
इससे आने वाले समय में हमारी सीमाओं पर ड्रोन खतरा बढ़ सकता है। इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और अदृश्य क्षमता वाले तुर्की के अत्याधुनिक ड्रोन्स में उन्नत सिग्नल जैमिंग और रडार को चकमा देने में दक्ष हैं। सस्ते ड्रोन झुंडों के हमले वायु रक्षा प्रणालियों को अत्यधिक व्यस्त कर देते हैं जिससे पारंपरिक लड़ाकू विमानों पर नजर रखने में परेशानी बढ़ जाती है। ड्रोन ताकत बढ़ने से पाकिस्तान सीमा पार से भारतीय रक्षा प्रतिष्ठानों पर हर पल निगरानी रख पाएगा। असल में अपनी ढह चुकी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था की वजह से पाकिस्तान अपनी वायुसेना को महंगे पारंपरिक लड़ाकू विमान देने की स्थिति में नहीं है। इसलिए वह तुर्की और चीन के इस कम लागत और उच्च प्रभाव वाले ड्रोन मॉडल के सहारे अपनी सामरिक स्थिति मजबूत करने का सपना देख रहा है।
क्या तुर्की तकनीक से लैस पाकिस्तान भारत को चुनौती दे सकता है? इसका सीधा और तकनीकी जवाब भारत में पिछले कुछ वर्षों में उभरे विशाल ड्रोन और ड्रोन-विरोधी पारिस्थितिकी तंत्र में छिपा है। भारत सरकार की उत्पादन-आसक्त प्रोत्साहन योजना और ड्रोन नीति 2021 ने देश में निजी और सरकारी रक्षा-निर्माण को नई ऊर्जा दी है। अब भारत केवल विदेशी तकनीकों का आयात करने तक सीमित नहीं है, बल्कि मेक इन इंडिया और आत्मानिर्भर भारत की नीति ने ठोस परिणाम दिए हैं। रक्षा स्टार्ट-अप्स और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन मिलकर अगली पीढ़ी के लड़ाकू मानवरहित हवाई वाहन तैयार कर रहे हैं।
तपास-बीएच-201 और अघात जैसे स्वदेशी निगरानी और हमलावर ड्रोन भारतीय सेनाओं की रीढ़ बन रहे हैं। इसके साथ ही, इज़राइल और अमेरिका से प्राप्त उन्नत एमक्यू-9बी सी गार्डियन जैसे भारी-भरकम ड्रोन हिंद महासागर से लेकर हिमालय की ऊंचाइयों तक भारत की हमले व जासूसी की ताकत बढ़ाएंगे।
जहां तक ड्रोन हमले को नाकाम करने का सवाल है तो भारत डीआरडीओ की ड्रोनरोधी प्रणाली सॉफ्ट-किल (इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग) और हार्ड-किल (लेज़र बीम) से ड्रोन हवा में नष्ट करने की क्षमताओं से लैस है। पहला स्वदेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता-संचालित स्वायत्त काउंटर-ड्रोन डोम इंद्रजाल 4000 वर्ग किलोमीटर में ड्रोन खतरे को निष्क्रिय करने में सक्षम है। सीमाओं पर भारत का बहुस्तरीय सुरक्षा ढांचा तुर्की निर्मित ड्रोन्स के किसी भी नेटवर्क को सिग्नल जैमिंग के जरिए हवा में ही पंगु बनाने की क्षमता रखता है। वैसे भी इतिहास गवाह है कि युद्ध केवल हथियारों के बल पर नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति, सैन्य नेतृत्व और सही समय पर सही रणनीति के बल पर जीते जाते हैं। 1971 के भारत-पाक युद्ध में भारतीय थलसेना, वायुसेना और नौसेना के अद्वितीय तालमेल ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए थे और 93,000 सैनिकों का ऐतिहासिक आत्मसमर्पण कराया था। आज का भारत 1971 से कहीं अधिक तकनीकी रूप से परिपक्व, आर्थिक रूप से मजबूत और वैश्विक पटल पर एक बड़ी निर्णायक शक्ति है।
भारत ने अपने वायु रक्षा बेड़े में आधुनिक एस-400 सुदर्शन चक्र प्रणालियों और स्वदेशी आकाश मिसाइल नेटवर्क से ऐसा सुरक्षा चक्र तैयार किया है, जिसे भेदना किसी भी ड्रोन झुंड के लिए लगभग असंभव है। हालांकि शक्तिशाली होने के बावजूद भारत को दोहा के बद्र समझौते को हल्के में नहीं लेना चाहिए।
*ये विचार लेखक के हैं।**




