मुंबई, दिव्यराष्ट्र:/ कुछ बच्चों के लिए चलना एक सामान्य बात नहीं, बल्कि हर दिन की मेहनत और संघर्ष का हिस्सा होता है। 11 साल का एक बच्चा, जो स्पास्टिक डिप्लेजिक सेरेब्रल पाल्सी से जूझ रहा था, लंबे समय से चलने में परेशानी का सामना कर रहा था। हाल ही में नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रेंस हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने एक खास कम चीरफाड़ वाली प्रक्रिया के जरिए उसके चलने में बड़ा सुधार किया। एक ही सत्र में की गई इस प्रक्रिया से उसके शरीर पर पड़ने वाला दबाव कम हुआ और वह पहले की तुलना में ज्यादा सहज तरीके से चलने लगा। इस प्रक्रिया का नेतृत्व नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रेंस हॉस्पिटल, मुंबई के सीनियर कंसल्टेंट, पीडियाट्रिक ऑर्थोपेडिक्स, डॉ. तरल नागदा ने किया।
अगस्त्य की कहानी कई सालों से धीरे-धीरे सामने आ रही थी। शुरुआत में उसके बदलाव इतने छोटे थे कि शायद सिर्फ परिवार ही उन्हें महसूस कर सकता था। उसका जन्म समय से पहले, सात महीने में हुआ था और जन्म के समय उसका वजन 1900 ग्राम था। शुरुआती दिन उसने एनआईसीयू में बिताए, जहां डॉक्टरों का सबसे बड़ा लक्ष्य उसकी नाजुक हालत को संभालना था। जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, उसके विकास के कई पड़ाव सामान्य बच्चों की तुलना में थोड़ी देरी से पूरे हुए। उसने सिर संभालना देर से सीखा, बैठना भी देर से शुरू किया और करीब तीन साल की उम्र में जाकर खुद से चल पाया। हालांकि इन चुनौतियों के बावजूद उसकी बोलने, सुनने और देखने की क्षमता पूरी तरह सामान्य थी। वह दूसरे बच्चों की तरह स्कूल जाता था, पढ़ाई करता था और दोस्तों के साथ घुलता-मिलता भी था। लेकिन भीतर ही भीतर वह हमेशा महसूस करता था कि चलना उसके लिए कभी आसान नहीं रहा।
अगस्त्य का परिवार लगातार फिजियोथेरेपी करवा रहा था और उन्हें भरोसा था कि समय और नियमित अभ्यास के साथ स्थिति बेहतर हो जाएगी। कुछ समय तक सुधार भी नजर आया, लेकिन जैसे-जैसे अगस्त्य की उम्र बढ़ी और शरीर तेजी से विकसित होने लगा, उसकी चलने की परेशानी भी बढ़ने लगी। अब हर कदम में उसकी मेहनत साफ दिखाई देने लगी थी। उसकी शरीर की मुद्रा बदलने लगी और वह क्राउच गेट नाम की स्थिति में चलने लगा, जिसमें कूल्हे और घुटने लगातार मुड़े रहते हैं। इससे चलना ज्यादा थकाने वाला और मुश्किल हो जाता है। जो परेशानी पहले संभाली जा सकती थी, अब धीरे-धीरे उसकी रोजमर्रा की जिंदगी को सीमित करने लगी थी। जब अगस्त्य अस्पताल पहुंचा, तो डॉक्टरों ने महसूस किया कि यह सिर्फ चलने के तरीके का फर्क नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर इस बात पर पड़ रहा है कि वह कितना चल सकता है, कितनी देर तक चल सकता है और अपने शरीर में कितना सहज महसूस करता है।
करीब से जांच करने पर अगस्त्य की क्राउच गेट समस्या की वजह और स्पष्ट हो गई। उसकी जांघों की मांसपेशियों में स्पाज्म था, जिसके कारण पैर सामान्य रूप से फैल नहीं पा रहे थे। इसके अलावा उसके घुटनों में फ्लेक्शन कॉन्ट्रैक्चर की समस्या थी, यानी चलते समय वह अपने घुटनों को पूरी तरह सीधा नहीं कर पा रहा था। हालांकि, उसके टखनों और पैरों के जोड़ सामान्य थे। इन जांचों के साथ पहले किए गए एमआरआई में हाइपॉक्सिक इस्केमिक एन्सेफैलोपैथी के संकेत भी मिले थे। इन सभी निष्कर्षों के आधार पर डॉक्टरों ने स्पास्टिक डिप्लेजिक सेरेब्रल पाल्सी की पुष्टि की।
इस चरण पर डॉक्टरों के सामने सवाल सिर्फ एक और इलाज जोड़ने का नहीं था, बल्कि सही समय पर सही हस्तक्षेप करने का था। उद्देश्य यह था कि मांसपेशियों और शरीर की गतिविधियों के बीच बिगड़ते संतुलन को समय रहते सुधारा जाए, इससे पहले कि यह समस्या स्थायी रूप ले ले। इसके लिए डॉक्टरों ने संयुक्त उपचार की योजना बनाई। जकड़ी हुई मांसपेशियों को ढीला करने के लिए बोटुलिनम टॉक्सिन इंजेक्शन दिए गए, वहीं यूएसजी-गाइडेड पर्क्यूटेनियस मायोफेशियल रिलीज प्रक्रिया के जरिए बिना बड़े ऑपरेशन के बेहद सटीक तरीके से मांसपेशियों की जकड़न को कम किया गया।
प्रक्रिया के दौरान अगस्त्य की एडडक्टर्स और हैमस्ट्रिंग मांसपेशियों में 100 यूनिट बोटुलिनम टॉक्सिन दिया गया। इसके बाद अल्ट्रासाउंड की मदद से बिना टांके वाली रिलीज प्रक्रिया की गई। इसका असर तुरंत दिखाई देने लगा। मांसपेशियों की जकड़न कम हुई और काफी समय बाद उसके कूल्हे और घुटने पहले की तुलना में ज्यादा सहजता से चलने लगे। यह बदलाव डॉक्टरों को प्रक्रिया के दौरान ही साफ नजर आने लगा था।
यह पूरी प्रक्रिया करीब एक घंटे में पूरी हो गई और बच्चे के शरीर पर इसका असर भी बेहद हल्का रहा। इसमें किसी बड़े चीरे की जरूरत नहीं पड़ी, दर्द बहुत कम हुआ और रक्तस्राव भी लगभग न के बराबर रहा। सुधार को बनाए रखने के लिए अगस्त्य को विशेष पुश-नी स्प्लिंट दिया गया। तीन दिन अस्पताल में निगरानी के बाद उसकी स्थिति स्थिर रही और फिर उसे घर भेज दिया गया।
इलाज के बाद के दिनों में अगस्त्य ने दोबारा चलना शुरू किया। शुरुआत में उसके कदम धीमे थे, लेकिन फर्क साफ नजर आ रहा था। अब हर कदम उठाने में उसे पहले जितनी मेहनत नहीं करनी पड़ रही थी। लंबे समय से शरीर पर जो दबाव और थकान बढ़ती जा रही थी, वह धीरे-धीरे कम होने लगी। बदलाव सिर्फ उसके चलने के तरीके में नहीं था, बल्कि इस बात में भी था कि अब उसका शरीर चलते समय खुद को बेहतर तरीके से संभाल पा रहा था। उसकी चाल पहले से ज्यादा संतुलित, कम थकाने वाली और ज्यादा स्वाभाविक हो गई थी। इस उपचार से मांसपेशियों की जकड़न कम हुई और जोड़ों की गतिविधियों में सुधार आया, जिससे बढ़ते शरीर के साथ तालमेल बनाए रखने में उसे बेहतर मदद मिलने लगी।
इस मामले के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. तरल नागदा, सीनियर कंसल्टेंट, पीडियाट्रिक ऑर्थोपेडिक्स, नारायणा हेल्थ एसआरसीसी ने बताया, “स्पास्टिक डिप्लेजिक सेरेब्रल पाल्सी से जूझ रहे बच्चों में, खासकर तेजी से बढ़ती उम्र के दौरान, मांसपेशियां अक्सर हड्डियों की बढ़त के साथ तालमेल नहीं बिठा पातीं। इसकी वजह से मांसपेशियों में जकड़न बढ़ने लगती है, शरीर में कॉन्ट्रैक्चर विकसित हो जाते हैं और बच्चे की चाल क्राउच गेट जैसी स्थिति में बदल जाती है। सबसे जरूरी बात सही समय पर हस्तक्षेप करना है, इससे पहले कि यह बदलाव स्थायी रूप ले लें और केवल फिजियोथेरेपी से सुधार संभव न रहे। डॉक्टरों की टीम ने बोटुलिनम टॉक्सिन इंजेक्शन और यूएसजी-गाइडेड पर्क्यूटेनियस मायोफेशियल रिलीज के संयुक्त उपचार से एक ही सत्र में जकड़ी हुई मांसपेशियों को ढीला किया और जोड़ों की गतिविधियों में सुधार लाया। इससे बच्चा पहले की तुलना में बेहतर संतुलन और काफी कम मेहनत के साथ चल पा रहा है।”
कई बार बदलाव ज्यादा इलाज या बड़ी प्रक्रिया से नहीं, बल्कि सही समय पर सही कदम उठाने से आता है। यह मामला इस बात की याद दिलाता है कि समय रहते किए गए कम चीरफाड़ वाले उपचार से लंबे समय से चली आ रही चलने-फिरने की परेशानियों में भी बड़ा सुधार लाया जा सकता है। अगस्त्य के मामले में भी इस उपचार ने उसे आने वाले जीवन के लिए ज्यादा सहजता, आत्मविश्वास और स्वतंत्रता के साथ आगे बढ़ने का नया भरोसा दिया है।