(मुकेश प्रजापति, प्राध्यापक)
मानव सभ्यता का विकास क्रम मूलतः ऊर्जा की खोज और उसके नित नए आयामों को साधने का इतिहास रहा है। आदिम युग में जंगलों की आग से लेकर औद्योगिक क्रांति को गति देने वाले कोयले और आधुनिक जीवन की धुरी बने पेट्रोलियम व परमाणु ऊर्जा तक, हमारी यात्रा असाधारण रही है। किंतु समकालीन दौर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस ऊर्जा ने मानवीय जीवन को सुगम, तीव्र और वैभवशाली बनाया, वही आज वैश्विक अस्तित्व के लिए सबसे गंभीर संकट का कारण बन चुकी है। आज समूचा विश्व एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ ऊर्जा का प्रश्न महज एक आर्थिक या तकनीकी विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति, पर्यावरण, नैतिकता और सबसे बढ़कर मानवीय उत्तरदायित्व की सामूहिक कसौटी बन चुका है।
जब हम वैश्विक ऊर्जा संकट शब्द सुनते हैं, तो हमारे मानस पटल पर पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतें, बिजली की कटौती और गैस आपूर्ति की किल्लत जैसी तस्वीरें उभरती हैं। लेकिन यहाँ एक बुनियादी प्रश्न पर विचार करना आवश्यक है कि क्या सचमुच पृथ्वी के गर्भ में ऊर्जा संसाधन समाप्त हो रहे हैं, या फिर यह संकट इंसानी लालसा और युद्धजनित परिस्थितियों की देन है? वास्तव में इसके दोनों ही पहलू सच हैं। एक तरफ जहाँ जीवाश्म ईंधनों के सीमित भंडार और उनके अंधाधुंध दोहन ने भविष्य को अंधकारमय बना दिया है, वहीं दूसरी तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य-पूर्व के भू-राजनीतिक संघर्ष और महाशक्तियों के आपसी शक्ति-संतुलन ने ऊर्जा की निर्बाध आपूर्ति को पूरी तरह अस्थिर कर दिया है। इतिहास गवाह है कि ऊर्जा संसाधन कई बार युद्ध का कारण भी बनते हैं और सामरिक हथियार भी। यह स्पष्ट है कि संकट केवल तेल के कुओं या गैस के भंडारों में नहीं है, बल्कि हमारी असंतुलित विकास-नीति और संकीर्ण सोच में है। यदि वैश्विक समुदाय ने समय रहते नवीकरणीय ऊर्जा को अपनी प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखा होता, तो आज युद्धों के कारण उत्पन्न हुआ यह प्रभाव इतना गहरा न होता।
इस परिप्रेक्ष्य में सतत विकास की अवधारणा केवल एक अकादमिक या आर्थिक सिद्धांत मात्र नहीं रह जाती, बल्कि यह भावी पीढ़ी के प्रति हमारी नैतिक चेतना का पैमाना बनती है। सतत विकास का सीधा अर्थ यही है कि हम अपनी वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति इस प्रकार करें जिससे आने वाली पीढ़ियों के अधिकार और संसाधन सुरक्षित रहें। आधुनिक मानव ने प्रकृति को सहचर मानने के बजाय उसे महज उपभोग की वस्तु समझ लिया है। नदियाँ, पहाड़, जंगल और खनिज, सबको इस तरह निचोड़ा जा रहा है जैसे इनके नवीनीकरण की कोई सीमा ही न हो। यही उपभोक्तावादी दृष्टिकोण ऊर्जा संकट की असली जड़ है। यदि विकास की परिभाषा केवल ‘अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग’ तक सीमित रहेगी, तो पृथ्वी का पारिस्थितिक तंत्र बिखरना तय है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और वर्षा जल संचयन जैसे विकल्प केवल तकनीकी प्रतिस्थापन नहीं हैं, बल्कि ये प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाने के हमारे नैतिक संकल्प हैं।
इस संकट के दौर में राष्ट्रवाद की परिभाषा को भी नए सिरे से समझने की आवश्यकता है। अमूमन राष्ट्रवाद को सीमाओं की सुरक्षा या भावनात्मक नारों से जोड़कर देखा जाता है, परंतु वास्तविक राष्ट्रवाद नागरिक के दैनिक व्यवहार में परिलक्षित होता है। जब कोई नागरिक घर या कार्यालय में अनावश्यक चल रहे पंखे, लाइट या एसी को बंद करता है, पानी की बर्बादी को रोकता है अथवा सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करता है, तो वह सीमा पर खड़े सैनिक की भाँति ही देश की सेवा कर रहा होता है। भारत जैसे विशाल और विकासशील देश के लिए ऊर्जा आत्मनिर्भरता एक अनिवार्य शर्त है। विदेशी तेल और ऊर्जा आयात पर हमारी अत्यधिक निर्भरता न केवल देश के विदेशी मुद्रा भंडार को खोखला करती है, बल्कि हमारी विदेश नीति और आंतरिक आर्थिक स्थिरता पर भी अदृश्य दबाव बनाती है। इसलिए ऊर्जा संरक्षण राष्ट्रहित और देश की आर्थिक संप्रभुता से सीधा जुड़ा विषय है।
निश्चित रूप से सरकारें अपनी ओर से निरंतर नीतिगत प्रयास कर रही हैं। भारत सरकार का राष्ट्रीय सौर मिशन, एलईडी बल्बों के वितरण की योजना, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की नीतियाँ और हरित ऊर्जा गलियारों का निर्माण इस दिशा में मील के पत्थर हैं। हाल के वर्षों में कार्य संस्कृति में आए ‘वर्क फ्रॉम होम’ और डिजिटल कार्य प्रणाली के बदलावों ने भी ऊर्जा संरक्षण के नए द्वार खोले हैं। जब लाखों कर्मचारी प्रतिदिन कार्यालय आने-जाने के बजाय घर से कार्य करते हैं, तो करोड़ों लीटर ईंधन की बचत होती है, यातायात का दबाव घटता है और वायु प्रदूषण में भारी गिरावट आती है। डिजिटल बैठकें और ई-गवर्नेंस केवल प्रशासनिक सुगमता के साधन नहीं, बल्कि ऊर्जा बचत के आधुनिक अस्त्र हैं। इसके बावजूद, नीतिगत प्रयासों की अपनी एक सीमा होती है। कानून और नीतियाँ केवल दिशा दे सकती हैं, लेकिन समाज को गति देना नागरिकों का काम है। यदि नागरिक की मानसिकता केवल उपभोगवादी बनी रहे, तो दुनिया की कोई भी सरकारी योजना या अंतरराष्ट्रीय संधि पर्याप्त नहीं हो सकती।
ऊर्जा संकट दरअसल तकनीक से अधिक मानवीय चरित्र का संकट है। जब तक समाज अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को नहीं जोड़ेगा, तब तक किसी भी समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। आम तौर पर लोगों में यह आत्मघाती सोच घर कर जाती है कि ‘मेरे अकेले के प्रयास से क्या बदल जाएगा?’ किंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि समाज की सबसे बड़ी शक्ति छोटे-छोटे व्यक्तिगत प्रयासों का सामूहिक संचय ही होती है। समाज में अक्सर देखा जाता है कि लोग अपना पैसा खर्च करने से पहले सौ बार सोचते हैं, मोल-भाव करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि एक-एक पैसे का सही मोल मिले। परंतु जब बात बिजली, पानी या ईंधन जैसे सार्वजनिक संसाधनों की आती है, तो वही सावधानी गायब हो जाती है। दिन के उजाले में जलती स्ट्रीट लाइटें, खाली कमरों में चलते एसी और सड़कों पर व्यर्थ बहता पानी इस बात का प्रमाण हैं कि हम संसाधनों के प्रति कितने संवेदनहीन हैं। लोग अक्सर अत्यधिक ऊर्जा खपत को अपनी समृद्धि या शान-शौकत का प्रतीक मान बैठते हैं। यह सोच अत्यंत भयावह है क्योंकि धन किसी व्यक्ति का निजी संसाधन हो सकता है, लेकिन प्राकृतिक संपदा और ऊर्जा पूरी मानवता की साझा धरोहर हैं। जिस दिन समाज ऊर्जा की बचत को कंजूसी के बजाय एक ‘जिम्मेदार नागरिकता’ के गौरव के रूप में देखने लगेगा, उसी दिन से वास्तविक और स्थायी परिवर्तन की शुरुआत होगी।
इस संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण कानून का एक प्रसिद्ध सिद्धांत है—सीबीडीआर यानी ‘समान लेकिन विभेदित जिम्मेदारियाँ’। यह सिद्धांत प्रतिपादित करता है कि पर्यावरण और संसाधनों की रक्षा करना वैश्विक समाज के हर हिस्से का दायित्व है, परंतु जिसके पास अधिक क्षमता और संसाधन हैं, उसका उत्तरदायित्व अधिक बड़ा हो जाता है। यह नियम केवल देशों पर ही नहीं, बल्कि हमारे समाज के भीतर भी उतना ही सटीक बैठता है। समाज का जो वर्ग आर्थिक रूप से सक्षम है, वह अपने घरों में सौर पैनल लगवाकर, ऊर्जा-दक्ष उपकरण (स्टार-रेटेड अप्लायंसेज) खरीदकर और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाकर बड़ा योगदान दे सकता है। वहीं, मध्यम और निम्न वर्ग अपनी आदतों में छोटे-छोटे सुधार करके इस महायज्ञ में आहुति दे सकते हैं। समस्या तब जटिल होती है जब सक्षम वर्ग अपनी क्रय शक्ति के अहंकार में असीमित बर्बादी को अपना अधिकार मान लेता है।
शहरी जीवन के एक छोटे से व्यावहारिक उदाहरण से इस मानसिक बीमारी को समझा जा सकता है। बहुमंजिला इमारतों में अक्सर लोग पानी की टंकी भरने के बाद घंटों पानी बहने देते हैं क्योंकि उन्होंने वॉटर अलार्म जैसी मामूली तकनीक नहीं लगवाई होती। पूछने पर तर्क मिलता है कि वे खुद वहाँ नहीं रहते, किरायेदार रहते हैं, या फिर बिजली का बिल उनके हिस्से में नहीं आता। यह सोच इस बात का जीवंत उदाहरण है कि जब तक व्यक्ति को प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक चोट नहीं पहुँचती, वह सामूहिक बर्बादी के प्रति आँखें मूँदे रहता है। यही आत्मघाती दर्शन वैश्विक स्तर पर भी दिखाई देता है जहाँ देश केवल अपने भू-राजनीतिक हित देखते हैं, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपना मुनाफा ढूंढती हैं और नागरिक अपनी तात्कालिक सुविधा। लेकिन हमें यह समझना होगा कि यह पृथ्वी केवल व्यक्तिगत लाभ के गणित पर नहीं चल सकती। सभ्यताएँ तभी अक्षुण्ण रहती हैं जब समाज सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना को अंगीकार करता है।
किसी भी बड़े संकट का अंतिम और स्थायी समाधान सरकारें या अदालतें नहीं, बल्कि स्वयं समाज पैदा करता है। राज्य के नियम नागरिकों के भीतर भय तो उत्पन्न कर सकते हैं, लेकिन चेतना का संचार नहीं कर सकते। वास्तविक बदलाव तब आता है जब नागरिक का अंतःकरण जागृत होता है। वैश्विक ऊर्जा संकट हमें यह कड़ा सबक सिखाता है कि आधुनिक होने का अर्थ केवल अधिक उपभोग की अंधी दौड़ में शामिल होना नहीं है, बल्कि अपनी प्रकृति और समाज के प्रति अधिक संवेदनशील होना भी है। यदि हम सचमुच चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ एक सुरक्षित, स्वच्छ और संतुलित दुनिया में सांस ले सकें, तो हमें अपनी आदतों, अपनी सोच और अपनी जीवनशैली को बदलना ही होगा। ऊर्जा संरक्षण कोई सरकारी विज्ञापन या तकनीकी अभियान नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता को बचाने का एक नैतिक और सांस्कृतिक आंदोलन है। जिस दिन हम यह आत्मसात कर लेंगे कि प्रकृति का संरक्षण ही वास्तव में मानवता का संरक्षण है, उसी दिन ऊर्जा संकट का सबसे बड़ा और व्यावहारिक समाधान इस धरती पर जन्म ले लेगा।