दिव्य राष्ट्र के लिए: डॉ. अल्पना शर्मा
14 अगस्त भारतीय इतिहास का वह दिन है जो हमें स्वतंत्रता की पूर्व संध्या के साथ-साथ देश के विभाजन की असहनीय पीड़ा का भी स्मरण कराता है। वर्ष 1947 में भारत का विभाजन केवल भौगोलिक सीमाओं का पुनर्निर्धारण नहीं था, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, उनकी स्मृतियों और सामाजिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित करने वाली ऐतिहासिक त्रासदी थी।
ब्रिटिश शासन की नीतियों, सांप्रदायिक तनाव और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के परिणामस्वरूप भारत का विभाजन हुआ तथा पाकिस्तान का गठन किया गया। इसके साथ ही लाखों परिवारों को अपना घर, अपनी जन्मभूमि और अपनी पहचान तक छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। इतिहासकारों के अनुसार लगभग डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित हुए और लाखों लोगों ने सांप्रदायिक हिंसा में अपने प्राण गंवाए। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर हुए अत्याचार मानवता के इतिहास का अत्यंत पीड़ादायक अध्याय हैं।
विभाजन ने केवल सीमाएँ नहीं बदलीं, बल्कि परिवारों को बिखेर दिया, सांस्कृतिक संबंधों को तोड़ दिया और समाज में अविश्वास का गहरा घाव छोड़ दिया। आज भी अनेक परिवारों की स्मृतियों में वह दर्द जीवित है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाने वाली कहानियों में दिखाई देता है।
स्वतंत्र भारत ने इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद लोकतंत्र, संविधान, धर्मनिरपेक्षता, समानता और विविधता में एकता के मूल्यों को अपनाकर विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान स्थापित की। यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। इतिहास हमें यह सिखाता है कि घृणा और विभाजन कभी स्थायी समाधान नहीं हो सकते; स्थायी शांति केवल संवाद, सद्भाव, सहिष्णुता और राष्ट्रीय एकता से ही संभव है।
भारत सरकार द्वारा 14 अगस्त को *”विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस”* के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विभाजन की त्रासदी में अपने प्राण गंवाने वाले लाखों लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करना, विस्थापित परिवारों के संघर्ष को स्मरण करना तथा नई पीढ़ी को राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों के प्रति जागरूक करना है।
आज जब विश्व अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब विभाजन की स्मृतियाँ हमें यह संदेश देती हैं कि राष्ट्र की शक्ति उसकी एकता, सामाजिक सौहार्द और मानवीय संवेदनाओं में निहित होती है। आइए, हम इतिहास से सीख लेते हुए ऐसा भारत बनाने का संकल्प लें जहाँ विविधता हमारी पहचान हो, एकता हमारी शक्ति हो और मानवता हमारा सर्वोच्च मूल्य।
इतिहास को स्मरण करने का उद्देश्य अतीत के घावों को कुरेदना नहीं, बल्कि उनसे सीख लेकर भविष्य को अधिक सुरक्षित, समरस और सशक्त बनाना है। यही विभाजन की विभीषिका के पीड़ितों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।