दिव्य राष्ट्र के लिए डॉ.सीमा दायमा एसोसिएट प्रोफेसर विजीयू
जयपुर, दिव्यराष्ट्र:/ देश में सड़क, पानी, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसी योजनाओं पर हर वर्ष बड़े स्तर पर सार्वजनिक धन खर्च किया जाता है, लेकिन इसके बावजूद अनेक नागरिक आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि योजनाओं की सफलता केवल बजट खर्च करने या निर्माण कार्य पूरा करने से नहीं, बल्कि नागरिकों को मिलने वाले वास्तविक लाभ से आंकी जानी चाहिए।
रिपोर्ट के अनुसार भारत में ग्राम पंचायत से लेकर केंद्र सरकार तक विकेंद्रीकृत शासन व्यवस्था विकसित की गई है, जिसका उद्देश्य स्थानीय समस्याओं का स्थानीय स्तर पर समाधान करना है। इसके बावजूद कई स्थानों पर सड़कें निर्माण के कुछ समय बाद ही क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, जलापूर्ति योजनाएं नियमित सेवा देने में विफल रहती हैं और आवास योजनाओं में गुणवत्ता संबंधी शिकायतें सामने आती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि विकास को केवल “व्यय” और “निर्माण” के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। किसी सड़क का निर्माण, पाइपलाइन बिछाना या भवन बनाना केवल आउटपुट है, जबकि नागरिकों को बेहतर आवागमन, सुरक्षित पेयजल और गुणवत्तापूर्ण सेवाएं मिलना वास्तविक परिणाम है।
रिपोर्ट में राजस्थान में जल जीवन मिशन के क्रियान्वयन का भी उल्लेख किया गया है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की प्रदर्शन लेखापरीक्षा में योजना निर्माण, वित्तीय प्रबंधन, जल गुणवत्ता और दीर्घकालिक स्थिरता से जुड़ी विभिन्न कमियों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया। रिपोर्ट ने परिणामों की निरंतर निगरानी की आवश्यकता पर जोर दिया।
विश्लेषकों के अनुसार योजनाओं की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए स्थानीय संस्थाओं को अधिक सशक्त बनाने, सामाजिक अंकेक्षण को प्रभावी करने, शिकायतों का समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करने और सार्वजनिक धन के उपयोग की पारदर्शी निगरानी आवश्यक है।
निष्कर्ष: विकास की वास्तविक कसौटी सरकारी अभिलेखों में दर्ज उपलब्धियां नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन में आने वाला स्थायी और सकारात्मक परिवर्तन है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में योजनाओं का मूल्यांकन खर्च के बजाय उनके वास्तविक प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए।