गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग के गहरे सामाजिक मायने
(दिव्यराष्ट्र के लिए अम्बरीष प्रजापति स्वतंत्र पत्रकार व शोधार्थी, केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश)
भारत की सामाजिक और राजनीतिक सरजमीं पर कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जो समय-समय पर सुलगते रहते हैं, और गाय का मुद्दा उनमें से सबसे ऊपर रहा है। आजादी के बाद से लेकर आज तक, भारतीय राजनीति में गाय कभी सिर्फ एक चौपाया जीव नहीं रही। वह करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र रही है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार स्तंभ रही है और दुर्भाग्य से, राजनीतिक ध्रुवीकरण का सबसे अचूक हथियार भी रही है। लेकिन हाल के दिनों में सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स -फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स (ट्विटर) पर एक बेहद दिलचस्प और अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है। हजारों की संख्या में ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें मुस्लिम समुदाय के आम नागरिक, युवा, महिलाएं, उलेमा और बुद्धिजीवी खुलकर गाय को भारत का ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित करने के पक्ष में अपनी बात रख रहे हैं। यह घटनाक्रम पारंपरिक राजनीतिक चश्मे से देखने वालों को चौंका सकता है, लेकिन इसके भीतर भारतीय समाज की एक नई और गहरी करवट छिपी हुई है। इस उभरते हुए विमर्श के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मायने इतने व्यापक हैं कि ये आने वाले समय में देश की सियासत की दिशा और दशा दोनों को बदलने का दम रखते हैं।
सोशल मीडिया का यह रुख अचानक नहीं बना है, बल्कि इसके पीछे जमीनी स्तर पर एक बड़ा वैचारिक बदलाव काम कर रहा है। पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों के मुस्लिम संगठनों ने बाकायदा केंद्र सरकार से यह मांग की है कि गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिया जाए। इतना ही नहीं, सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने के लिए पश्चिम बंगाल के मुस्लिम समाज ने त्योहारों के दौरान गोवंश की बलि न चढ़ाने का एक ऐतिहासिक और व्यावहारिक निर्णय भी लिया, जो इस बात का प्रतीक है कि अल्पसंख्यक समाज बहुसंख्यकों की संवेदनशीलता को कितनी गहराई से समझता है। इन संगठनों ने केवल दर्जे की मांग नहीं की, बल्कि गोवंश की अवैध तस्करी, गोहत्या करने वालों और गोमांस का विदेशों में निर्यात करने वालों के खिलाफ कड़े कानूनी प्रावधान बनाने की वकालत भी की है।
इस पूरे विमर्श के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पहलू को देखें तो भारत में गाय की रक्षा का संकल्प कोई नया नहीं है। हमारी ऐतिहासिक विरासत और पौराणिक कथाओं में राजा पृथु से लेकर भगवान श्रीकृष्ण तक सभी ने गोवंश के संवर्धन और पोषण को सर्वोपरि माना। महाभारत काल में अर्जुन ने विराट नगर के युद्ध में गायों की रक्षा के लिए निर्वासन का जोखिम उठाया, तो चोल साम्राज्य के राजा मनु नीति चोलन ने न्याय की मिसाल पेश करते हुए अपने पुत्र को सिर्फ इसलिए मृत्युदंड दे दिया क्योंकि उसके रथ के नीचे एक बछड़ा कुचल गया था। सदियों से सनातन धर्म और संस्कृति के रक्षक रहे साधु-संतों, नागा संन्यासियों और आध्यात्मिक गुरुओं ने गोवंश की रक्षा और गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ या ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने के लिए हमेशा अपनी आवाज बुलंद की है। सन 1966 का करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में हुआ ऐतिहासिक गोहत्या विरोधी आंदोलन इसका सबसे बड़ा प्रमाण है, जहां हजारों संतों ने दिल्ली की सड़कों पर उतरकर अपनी आस्था के लिए बलिदान दिया था।
दिलचस्प बात यह है कि इतिहास में सिर्फ हिंदू शासकों ने ही नहीं, बल्कि कई मुस्लिम और अन्य राजाओं ने भी गोवंश की महत्ता को समझा था। मुगल काल में बाबर, अकबर, जहांगीर और अहमद शाह जैसे शासकों ने सामाजिक ताने-बाने को बनाए रखने के लिए गोहत्या पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। मैसूर के सुल्तान हैदर अली ने गोहत्या को एक दंडनीय अपराध घोषित किया था, जिसमें दोषियों के हाथ तक काट दिए जाते थे। इसी तरह, सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह ने अपने पूरे राज्य में इस पर पूर्ण रोक लगाई थी। यहाँ तक कि अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गोमांस के सेवन और गोहत्या पर पूर्ण पाबंदी लगाते हुए इसका उल्लंघन करने वालों को तोप से उड़ाने तक का कड़ा आदेश जारी किया था। इसके अलावा, मराठा शासकों ने 1790 के दशक में मुंबई और उसके आसपास के कसाइयों तक गायों की तस्करी रोकने के लिए सख्त नाकेबंदी की थी और अपराधियों को फांसी की सजा तक दी थी।
साधु-संतों और देश के ऐतिहासिक नायकों की यह मांग कभी संकीर्ण राजनीतिक नहीं थी, बल्कि यह भारत के आध्यात्मिक प्राण और कृषि आधारित जीवन शैली को बचाने की एक पवित्र पुकार थी। लेकिन देश का दुर्भाग्य रहा कि संतों की यह निश्छल और पवित्र आवाज हमेशा सत्तालोभी राजनीति की भेंट चढ़ती रही। राजनेताओं और कुछ खास विचारधाराओं ने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए इस मुद्दे का इस तरह इस्तेमाल किया कि संतों की मांग को एकतरफा और बहुसंख्यकवादी बताकर पेश किया गया। सबसे घिनौनी सियासत तब हुई जब इस मांग के विरोध में जानबूझकर मुस्लिम समुदाय को ला खड़ा किया गया। बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक की एक ऐसी कृत्रिम दीवार खड़ी कर दी गई, जिससे नेताओं को तो वोट मिलते रहे, लेकिन गाय का मुद्दा और संतों का संघर्ष अंतहीन विवादों के दलदल में फंस गया। मुस्लिम समाज को हमेशा यह डर दिखाया गया कि गाय की रक्षा की मांग उनके खान-पान और मजहबी आजादी पर हमला है, जिसके कारण समाज का एक बड़ा हिस्सा अनजाने में ही इस मांग के विरोध में खड़ा दिखाई देने लगा।
यही कारण है कि आज सोशल मीडिया पर दिख रहा बदलाव एक बहुत बड़ी वैचारिक क्रांति की तरह है। जो मुस्लिम समुदाय कल तक राजनीति के शतरंज पर मोहरे की तरह इस्तेमाल होकर इस मांग के विरोध में खड़ा किया जाता था, आज उसी समुदाय के लोग खुद आगे आकर, बिना किसी संकोच के गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की बात कर रहे हैं। मुस्लिम समुदाय की ओर से आ रहे इस सुर को किसी डर, दबाव या मजबूरी के रूप में देखना पूरी तरह से गलत होगा। दरअसल, यह भारतीय मुसलमानों के एक बहुत बड़े हिस्से की ओर से बहुसंख्यक समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था के प्रति सम्मान प्रकट करने की एक सचेत और परिपक्व कोशिश है। जब एक आम मुस्लिम युवक या कोई मौलाना कैमरे के सामने आकर यह कहता है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर दिया जाना चाहिए ताकि इस विषय पर होने वाला हर तरह का विवाद हमेशा के लिए खत्म हो जाए, तो वह दरअसल उस राजनीतिक औजार की धार को कुंद कर रहा होता है जिसका इस्तेमाल समाज को बांटने के लिए किया जाता रहा है।
इस विमर्श का दूसरा पहलू उन ताकतों और राजनीतिक दलों से सीधे तौर पर टकराता है जो गाय के नाम पर अपनी दुकानें चलाते आए हैं। अब यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि अगर मुस्लिम समुदाय खुद आगे बढ़कर गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की मांग का समर्थन करने लगेगा, तो उन राजनीतिज्ञों और संगठनों का क्या होगा जिनकी पूरी राजनीति ही नफरत और विभाजन पर टिकी है? निश्चित रूप से, यह स्थिति उनके लिए सबसे बड़ा संकट है जो समाज के दोनों छोरों पर मौजूद हैं। एक तरफ वे दक्षिणपंथी समूह हैं जो गाय को हमेशा एक रक्षात्मक और आक्रामक चुनावी मुद्दा बनाए रखना चाहते हैं। उनके लिए गाय एक ऐसा विषय रहा है जिसके जरिए वे बहुसंख्यक मतों का ध्रुवीकरण बहुत आसानी से कर लेते थे। अगर मुस्लिम समाज खुद इस मांग के पक्ष में खड़ा हो जाएगा, तो इन समूहों के पास से मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलने का एक बहुत बड़ा और भावनात्मक बहाना हमेशा के लिए छिन जाएगा। दूसरी तरफ, वे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष या क्षेत्रीय दल भी संकट में आ जाएंगे जो मुसलमानों के मन में लगातार यह डर बिठाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकते थे कि बहुसंख्यक समाज की हर मांग या आस्था उनके वजूद के लिए खतरा है। गाय पर राजनीति करने वाले दोनों ही धड़ों की प्रासंगिकता इस बदलते रुख से गंभीर संकट में पड़ जाएगी, क्योंकि जब कोई संवेदनशील मुद्दा सर्वसम्मति का रूप लेने लगता है, तो उस पर सियासत करने की गुंजाइश अपने आप खत्म हो जाती है।
इस सामाजिक विमर्श के बीच एक बड़ा संवैधानिक, प्रशासनिक और आर्थिक सवाल भी तैर रहा है कि क्या सरकार वास्तव में गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर पाएगी? कानूनी और संवैधानिक नजरिए से देखा जाए तो संसद के पास ऐसा करने की पूरी शक्ति है, लेकिन इसके व्यावहारिक, आर्थिक और क्षेत्रीय आयाम बेहद पेचीदा हैं। वास्तव में, गोरक्षा का यह मुद्दा केवल धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि और नागरिकों के स्वास्थ्य से है। भारत की आर्थिक और सामाजिक शक्ति का मुख्य स्रोत हमेशा से गो-आधारित कृषि व्यवस्था रही है। लेकिन आधुनिक दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के व्यावसायिक हितों और विज्ञापनों के बढ़ते जाल ने भारतीय समाज में एक ऐसी हीनभावना पैदा कर दी, जिससे घरों में पलने वाली गायों की उपेक्षा होने लगी। इसका सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ा है; आज डिब्बाबंद और मिलावटी डेयरी उत्पादों के कारण चिकित्सा का कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है। इसके विपरीत, भूटान जैसे देशों ने अपनी पारंपरिक और कृषि-आधारित जीवन शैली को बनाए रखकर सुख और संतोष का एक बेहतर मॉडल दुनिया के सामने पेश किया है।
यदि सरकार गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देती है, तो उसे केवल एक प्रतीकात्मक घोषणा बनकर नहीं रह जाना चाहिए। इसके लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर एक सुदृढ़ गो-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए सचेत होकर काम करना होगा। यह तभी संभव होगा जब गोवंश को केवल बड़ी-बड़ी गोशालाओं तक सीमित रखने के बजाय फिर से ग्रामीण अंचलों और किसानों के आंगनों में वापस स्थान मिले। जब लोग गोवंश से प्राप्त होने वाले जैविक खाद, पंचगव्य और अन्य प्राकृतिक उत्पादों के असीमित आर्थिक लाभों को समझेंगे, तभी उनकी सही मायने में रक्षा हो पाएगी। हालांकि, इसके साथ कुछ बड़ी प्रशासनिक बाध्यताएं भी जुड़ेंगी। यदि गाय को यह दर्जा मिलता है, तो पूरे देश में गोवंश के संरक्षण और उनके रख-रखाव की जिम्मेदारी सरकार को उठानी होगी। इसके साथ ही, भारत के कुछ राज्य, विशेषकर पूर्वोत्तर के राज्य, गोवा और केरल, जहां बीफ (गोमांस) ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से खानपान का हिस्सा रहा है, वहां से इसका कड़ा विरोध सामने आ सकता है। सरकार को किसी भी ऐसे फैसले पर पहुंचने से पहले इन क्षेत्रीय और आर्थिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखना होगा।
इस संभावना और आशंका से भी पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता कि इस मांग के जोर पकड़ने के बाद इसके खिलाफ खुद मुस्लिम समुदाय के ही कुछ चुनिंदा लोगों को खड़ा करके विरोध प्रदर्शन प्रायोजित करवा दिया जाए। भारतीय राजनीति का यह एक बहुत पुराना, आजमाया हुआ और घिनौना फॉर्मूला रहा है। जब भी देश या समाज का कोई बड़ा हिस्सा किसी प्रगतिशील, शांतिपूर्ण या सर्वसम्मत समझौते की ओर बढ़ता है, तो दोनों पक्षों के कट्टरपंथी तत्व तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। कुछ रूढ़िवादी संगठन या स्वयंभू नेता, जो खुद को एक खास कौम का एकमात्र रहनुमा समझते हैं, इस मांग को ‘धार्मिक पहचान पर हमला’ या ‘बहुसंख्यकवाद के आगे घुटने टेकने’ के रूप में प्रचारित करना शुरू कर सकते हैं। इस बात की पूरी आशंका बनी रहती है कि कुछ राजनीतिक दल अपने छिपे हुए एजेंडे के तहत ऐसे चेहरों को जानबूझकर हवा दें और उन्हें मीडिया के कैमरों के सामने लाएं जो इस मांग का तीखा और आक्रामक विरोध करें। ऐसा इसलिए किया जाएगा ताकि समाज में सौहार्द और संवाद की जो एक नई खिड़की खुल रही है, उसे तुरंत बंद किया जा सके और ध्रुवीकरण की उस पुरानी, सुरक्षित पिच को दोबारा तैयार किया जा सके जिस पर चुनाव जीते जाते हैं।
लेकिन इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी और राहत देने वाली बात यह है कि देश की आम जनता अब इस तरह की घिसी-पिटी और खतरनाक राजनीति से पूरी तरह ऊब चुकी है। सोशल मीडिया पर मुस्लिम समुदाय के आम लोगों द्वारा बनाए जा रहे ये वीडियो इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि जमीन पर रहने वाला इंसान अब सिर्फ शांति, तरक्की, शिक्षा और रोजगार चाहता है। वह अच्छी तरह समझ चुका है कि गाय जैसे संवेदनशील और आस्था से जुड़े मुद्दों पर सड़कों पर खून बहना या मॉब लिंचिंग जैसी दुखद घटनाएं देश के लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय छवि पर एक गहरा कलंक लगाती हैं। समाज का यह हिस्सा अब नेताओं के बनाए जाल में फंसने के बजाय सीधे बहुसंख्यक समाज से संवाद कर रहा है। पश्चिमी समाजों ने तीव्र औद्योगिकीकरण के भौतिक लाभ तो देख लिए, लेकिन उसके दुष्परिणामों और सामाजिक तनावों को भी झेला है; यही कारण है कि आज पूरी दुनिया भारतीय जीवन मूल्यों की सादगी और उच्च विचारों की ओर आकर्षित हो रही है।
अगर इस जनभावना को एक सकारात्मक और रचनात्मक मोड़ दिया जाए, तो यह भारतीय समाज के इतिहास में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हो सकती है। सरकार को इस मुद्दे पर केवल राजनीतिक लाभ-हानि का गणित लगाने के बजाय एक व्यापक और समावेशी राष्ट्रीय सहमति बनाने का गंभीर प्रयास करना चाहिए। यदि सरकार मुस्लिम विद्वानों, सूफी संतों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों को विश्वास में लेकर इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाती है, तो किसी भी तरह के प्रायोजित विरोध की जमीन अपने आप खत्म हो जाएगी।
यह कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया पर चल रहा यह नया चलन डिजिटल युग में भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का एक शानदार और अनूठा उदाहरण है। यह इस सत्य को उजागर करता है कि समाज अब नेताओं के लिखे स्क्रिप्टेड एजेंडे पर नाचने के बजाय अपनी शर्तों पर अमन और भाईचारे का नया एजेंडा खुद तय कर रहा है। गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए या न किया जाए, यह पूरी तरह से संसद, संविधान और कानूनी विशेषज्ञों के कार्यक्षेत्र का विषय है, लेकिन मुस्लिम समुदाय के एक बड़े हिस्से ने साधु-संतों की इस सदियों पुरानी मांग को जो खुला और बिना किसी शर्त के समर्थन दिया है, उसने नफरत की राजनीति के ठेकेदारों की नींद जरूर उड़ा दी है। अब असली परीक्षा देश के प्रबुद्ध वर्ग, मीडिया और सरकार की है कि वे इस सकारात्मक और ऐतिहासिक माहौल का उपयोग देश को जोड़ने और दिलों की दूरियां मिटाने के लिए करते हैं, या फिर इसे भी एक और चुनावी अखाड़े और टेलीविजन डिबेट की अंतहीन बहस में झोंक देते हैं। यदि भारत इस संवेदनशील मुद्दे का एक व्यावहारिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से सुदृढ़ समाधान निकालने में सफल रहता है, तो यह पूरी दुनिया के सामने भारतीय बहुसंस्कृतिवाद, आपसी सह-अस्तित्व और सहिष्णुता की सबसे अनुपम और अटूट मिसाल होगी।