दिल्ली से आप टाटा ,बाय _बाय

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(डा.सीमा दाधीच)

दिल्ली विधान सभा चुनाव में भाजपा करीब 27वर्ष बाद सत्तासीन होरही है जनता ने सत्ता की कुर्सी से आम आदमी पार्टी (आप) को टाटा बाय, बाय कर दिया यानीअरविंद केजरीवाल यमुना की सफाई का अपना वचन तो निभा नहीं पाए लेकिन नरेंद्र मोदी और भाजपा ने यमुना में कमल का फूल जरूर खिला दिया। दिल्ली में भाजपा की जीत के पीछे सबसे बड़ा योगदान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के समर्पित कार्यकर्ताओं की मेहनत रही है।इस बार दिल्ली की जनता ने शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल एवम् उनकी पार्टी को दोषी मानकर सत्ता से हटाने का फरमान जारी कर दिया है। भाजपा ने इस बार दिल्ली का चुनाव बगैर मुख्य मंत्री के चेहरे के लड़ा और ओर प्रारंभ से इस चुनाव को केजरीवाल बनाम नरेंद्र मोदी का रूप देकर मतदाताओं को सोचने के लिए मजबूर कर दिया। इस चुनाव में आम आदमी पार्टी का टॉप केडर माने जाने वाले अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सौरभ भारद्वाज, सोमनाथ भारती, जैसे दिग्गजों को जनता ने ढेर कर दिया। इस चुनाव में भले ही कांग्रेस की दुर्गति हुई लेकिन वह आम आदमी पार्टी की नाव को ले डूबी। नई दिल्ली सीट जिससे अरविंद केजरीवाल को हमेशा 50प्रतिशत से ज्यादा वोट मिलते थे उसी सीट से केजरीवाल की हार होना किसी अचंभे से कम नहीं है। मनीष सिसोदिया भी जंगपुरा सीट से हार गए वही वर्तमान मुख्यमंत्री आतिशी की कालकाजी सीट से चुनाव जीतना यह बताता है कि जनता ने केजरीवाल की तुलना में आतिशी को ज्यादा समर्थन दिया है। दिल्ली विधान सभा चुनाव में भाजपा ने बहुमत प्राप्त कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि जनता बदलाव चाहती है। कांग्रेस का इस बार भी खाता नहीं खुलने से स्पष्ट है कि दिल्ली के वोटर इंडिया गठबंधन को लोकसभा चुनाव में ही नकार चुके थे और दिल्ली की लड़ाई सीधी सीधी भाजपा, आप के बीच में ही रही। 5फरवरी को हुए मतदान में 60.54प्रतिशत वोट डाले गए। 70सीटों के लिए हुए चुनाव में आम आदमी पार्टी की झाड़ू का बिखर जाना उसके राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति करने के सपने को भी चकना चूर कर रहा है। भाजपा ने वर्ष 1993के विधान सभा चुनाव में जीत दर्ज की थी। 27साल का वनवास खत्म होने से भाजपा नेताओं में जोश आना स्वाभाविक है साथ ही जनता को भी उम्मीद होगी की दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा। दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने वर्ष 2013,2015, और 2020के चुनाव में जबरदस्त जीत हासिल की। इससे पहले वर्ष 1998,2003, 2008में कांग्रेस को विजय मिली और शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनी। भाजपा ने वर्ष 1993में पहली बार जीत हासिल की थी। दिल्ली विधान सभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा के लिए अब बिहार विधान सभा चुनाव जीतने की भी चुनौती है। भाजपा ने इस राज्य में गठबंधन धर्म को निभाया और लोक जनशक्ति पार्टी (चिराग पासवान)एवं जनतादल यू (नीतीश कुमार) की पार्टी को एक एक सीट दी भलेही यह दोनों पार्टी चुनाव नहीं जीत पाई लेकिन देश की जनता को मोदी की साफ नियत जरूर देखने को मिली। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित ने भी कांग्रेस के टिकट पर अरविंद केजरीवाल के सामने खंभ ठोका था भले ही वे भी हार गए ओर भाजपा के प्रवेश वर्मा जीत गए लेकिन उन्होंने अपनी मां की हार का बदला केजरीवाल से लेलिया। यदि दीक्षित चुनाव नहीं लड़ते तो इस सीट से भाजपा के सामने केजरीवाल को हराना शायद दूर की कौड़ी वाली बात होती। इस सीट पर भाजपा के प्रवेश वर्मा जीत 30हजार 88वोट मिले एवं अरविंद केजरीवाल को 25हजार 999वोट मिले कांग्रेस के संदीप दीक्षित को 4089वोट प्राप्त हुए और अरविंद केजरीवाल की हार भी 4089वोट से हुई।इस सीट पर खास बात यह भी रही की जीतने वोटो से केजरीवाल हारे दीक्षित को वोट भी उतने ही मिले। वर्ष 2013के चुनाव में इस सीट पर केजरीवाल ने शीला दीक्षित को हराया था। भाजपा ने इस बार चुनाव को बहुत ही रणनीति के साथ लड़ा। कई धुरंधरों को मैदान में उतर दिया । आम आदमी पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान भ्रष्टाचार के आरोप से हुआ उसके कई नेताओं के जेल जाने से पार्टी की छवि धूमिल हो गई। दिल्ली में आपके सफाए से अब पार्टी कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ेगा अब आप की सरकार केवल पंजाब प्रांत में है इसलिए स्वाभाविक रूप से आम आदमी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा भी पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को ही माना जाएगा भले ही वे मुख्यमंत्री है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनकी कोई स्वीकारोक्ति नहीं है। दिल्ली के नतीजों ने विभिन्न न्यूज चैनल द्वारा जारी किए एक्जिट पोल की भी इज्जत रखी है। आम आदमी पार्टी देश में अपनी पकड़ बनाने के लिए दिल्ली मॉडल का साहरा लेने की कोशिश करती थी जो अब केवल भ्रष्टाचार का उदाहरण बन गया।

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