दिव्यराष्ट्र, मुंबई: दिल्ली शहर के पास एक इलाके में रहने वाली एक महिला अपने ब्लाउज की अंदरूनी सिलाई में, वॉश-केयर लेबल के पास एक गुलाबी टैग देखती है। उसे जिज्ञासा होती है और वह उस टैग पर लिखा संदेश पढ़ती है। उस संदेश में उसे एक सौम्य तरीके से मार्गदर्शन मिलता है। टैग पर बने सरल चित्रों के जरिए उसे समझ आता है कि स्वयं की जांच कैसे करनी है। इस टैग पर कोई चेतावनी नहीं दी गई है और न ही कोई डर दिखाया गया है। टैग पर है तो बस जागरूकता।
इस तरह शुरू हुआ ‘फेडरल बैंक होर्मिस मेमोरियल फाउंडेशन’ और ‘नेटवर्क-एटीन संजीवनी’ का ‘पिंक टैग प्रोजेक्ट’! ग्रामीण इलाकों में स्थानीय दर्जियों और सामुदायिक ट्रस्ट के माध्यम से यह पहल बड़े स्तर पर दूर-दूर तक पहुंची है। यह महत्वाकांक्षी योजना अब ‘सुता’ के जरिए फैशन की मुख्यधारा में प्रवेश कर रही है। ‘सुता’ एक स्वदेशी डी-टू-सी ब्रांड है। यह ब्रांड आधुनिक भारतीय महिला के लिए साड़ी के मायने को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है। यहां टैग के रूप में परंपरा और समकालीन उद्देश्य का सुंदर संगम दिखाई देता है। कपड़े का एक छोटा-सा टुकड़ा महिलाओं को अपनी देखभाल करना सिखाता है और इस तरह फैशन उद्योग भी राष्ट्रनिर्माण में अपना योगदान देता है।
भारत में हर चार मिनट में एक महिला को स्तन कैंसर का निदान होता है। इनमें से ७० प्रतिशत से अधिक मामलों में बीमारी का पता देर से चलता है। कई महिलाएं अपनी जांच नहीं करातीं, क्योंकि उनके पास अपने लिए समय नहीं होता। घर के काम, रोज़ी-रोटी के लिए किया जाने वाला काम और परिवार की देखभाल, इन सब में वे इतनी व्यस्त रहती हैं कि खुद की देखभाल करना उन्हें एक तरह की ‘लग्ज़री’ लगने लगता है।
‘पिंक टैग प्रोजेक्ट’ की शुरुआत एक सरल-से अवलोकन से हुई। महिलाओं को हर दिन अपने लिए एक छोटा-सा पल तब मिलता है, जब वे कपड़े पहन रही होती हैं। उनके कपड़ों में सिला हुआ एक गुलाबी टैग उनका ध्यान खींचता है और उन्हें यह बताता है कि स्वयं की जांच कैसे करनी है। यह टैग एक साधारण, लेकिन बेहद प्रभावी मार्गदर्शक है। यह उसी क्षण में शामिल है। ग्रामीण दर्जियों, गांव की स्वयंसेविकाओं और भरोसेमंद सहेलियों ने इस विचार को वास्तविक रूप दिया है।
परंपरा और समकालीन उद्देश्य का संगम
‘सुता’ ने भारतीय फैशन जगत में एक स्पष्ट लक्ष्य के साथ प्रवेश किया – आधुनिक महिलाओं के लिए साड़ी को फिर से लोकप्रिय बनाना। जिस समय बाजार में साड़ी की परंपरा पुरानी और पीछे छूटती हुई लग रही थी, उस समय ‘सुता’ ने उसमें नई ऊर्जा, सांस्कृतिक गर्व और नए डिज़ाइन्स का रंग भर दिया। अब ‘सुता’ अपने ब्लाउज पर पिंक टैग लगाती है। ये ब्लाउज सिर्फ फैशन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि महिलाओं की देखभाल का संदेश भी देते हैं। यह टैग याद दिलाते हैं कि महिला का स्वास्थ्य भी उसकी अन्य जिम्मेदारियों जितना ही महत्वपूर्ण है।
सामुदायिक अनुभव से फैशन उद्योग तक
एक फैशन ब्रांड अपने डिज़ाइन्स और व्यवसाय में सामाजिक उद्देश्य को कैसे शामिल कर सकता है, यह ‘सुता’ ने अपने ब्लाउज पर वॉश-केयर लेबल के ठीक पास पिंक टैग लगाकर दिखा दिया है। टैग लगाने का यह सरल तरीका अन्य कंपनियों के कपड़ों में भी लागू किया जा सकता है। पिंक टैग की यह अवधारणा अब छोटे गांवों से निकलकर शहरों के फैशन तक पहुंच गई है। गांव के स्थानीय दर्जियों से शुरू हुई यह सोच अब ‘सुता’ के माध्यम से बड़े स्तर पर लागू की जा रही है। समुदायों का अनुभव, उद्योग का समर्थन और बाजार का नवाचार, जब ये तीनों साथ आते हैं, तो स्वास्थ्य से जुड़ी अच्छी आदतों को बड़े पैमाने पर बढ़ावा मिलना तय है।
‘सुता’ की सह-संस्थापिका सुजाता बिस्वास ने कहा, “सुता में हम समझते हैं कि महिलाएं जो कपड़े पहनती हैं, उनका मतलब सिर्फ खरीदारी तक सीमित नहीं होता; कपड़ों के जरिए वे अपनी पहचान और आत्मविश्वास पाती हैं, और अब तो इस टैग के माध्यम से उनमें देखभाल की भावना भी जुड़ने वाली है। जब हमें पिंक टैग के बारे में जानकारी मिली, तो हमें इसमें एक महत्वपूर्ण अवसर नजर आया। महिलाओं का हम पर जो भरोसा है, उसे किसी सचमुच जरूरी काम के लिए इस्तेमाल करने का यह सही मौका था और इसे नजरअंदाज करना संभव नहीं था। अगर एक ब्लाउज महिला को उसके स्वास्थ्य का ध्यान रखने की याद दिला सके, तो फैशन भी देश को बेहतर बनाने का एक माध्यम बन सकता है। यह बात हमें पूरी तरह समझ में आई।”
‘सुता’ की सह-संस्थापिका तानिया बिस्वास ने कहा, “कपड़े पहनने का पल खास होता है। यह ऐसे क्षण होते हैं, जब एक महिला सचमुच अपने साथ, अकेले होती है। इसलिए उसी जगह पिंक टैग लगाना बिल्कुल स्वाभाविक लगा। हम महिला से कुछ अलग या विशेष करने को नहीं कहते। हम बस उन पलों में उसके साथ रहते हैं और उसे याद दिलाते हैं कि वह खुद बहुत महत्वपूर्ण है।”
‘न्यूज-एटीन स्टूडियोज’ के सीओओ सिद्धार्थ सैनी ने कहा, “न्यूज-एटीन के टीवी नेटवर्क और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से संजीवनी पहल बड़े पैमाने पर लोगों तक पहुंची है। देश के बड़े और प्रभावशाली लोगों तक इस स्वास्थ्य परियोजना की जानकारी पहुंच रही है, और साथ ही उन दूर-दराज़ इलाकों तक भी, जहां जानकारी के अभाव में समय पर इलाज शुरू नहीं हो पाता और स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। पिंक टैग प्रोजेक्ट से यह बात सामने आई है कि मीडिया सिर्फ जानकारी देने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों की आदतें बदलने में भी मदद कर सकता है। इस टैग के जरिए एक सरल संदेश महिलाओं तक ऐसे समय में पहुंचता है, जब टीवी या अन्य माध्यम उन तक नहीं पहुंच पाते। इससे उनके रोज़मर्रा के जीवन में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बनती है। ‘सुता’ के साथ साझेदारी से यह प्रभाव और भी बढ़ रहा है, क्योंकि अब टैग की यह अवधारणा सुता के स्टोर्स और सोशल मीडिया के जरिए भी लोगों तक पहुंचने लगी है। आज यह पहल सही मायनों में बड़े स्तर पर शुरू हो चुकी है। इसमें देशभर में होने वाला विस्तार और व्यक्तिगत स्तर पर लगातार मिलने वाली याद दिलाने वाली बात, दोनों एक साथ जुड़ जाते हैं। ऐसे नए विचार वास्तविक रूप में अच्छा असर दिखाते हैं और लंबे समय तक टिकने वाला बदलाव लाते हैं।”
इस पहल में ‘सुता’ के शामिल होने पर फेडरल बैंक के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर एम.वी.एस. मूर्ति ने कहा, “पिंक टैग पहल को शुरुआत से ही इस उद्देश्य के साथ तैयार किया गया था कि यह सिर्फ एक अभियान तक सीमित न रहे, बल्कि बड़े पैमाने पर लोगों तक पहुंचे। समाज में अच्छे विचारों या साधनों की कमी नहीं है; जरूरत इस बात की है कि उन विचारों पर विश्वास किया जाए। ‘सुता’ के साथ हुए सहयोग से यह बात साबित होती है। कंपनियों और ब्रांड्स को व्यावसायिक सफलता और सामाजिक पहलों को साथ लाने की तैयारी दिखानी चाहिए। ‘सुता’ जैसी संस्था के साथ साझेदारी करके हम ऐसा एक उदाहरण पेश कर रहे हैं। इससे यह साफ हो गया है कि भारत का फैशन उद्योग सार्वजनिक स्वास्थ्य की मदद कर सकता है और इस तरह व्यवसाय भी देश निर्माण में योगदान दे सकते हैं।”

