नई दिल्ली, दिव्य राष्ट्र:/ रितीश उपाध्याय, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला बेहद महत्वपूर्ण है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं बताए जाते हैं, तो ऐसी गिरफ्तारी असंवैधानिक और अवैध मानी जाएगी। [
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदरकर की पीठ ने जसकरण जीत सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के कारणों की लिखित जानकारी देना अनिवार्य है। ऐसा नहीं होने पर गिरफ्तार व्यक्ति की तत्काल रिहाई हो सकती है और संबंधित पुलिस अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई भी की जाएगी।
क्या था मामला?*
मामला जसकरण जीत सिंह की गिरफ्तारी से जुड़ा है, जिन्हें पॉक्सो एक्ट 2012 और भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत गिरफ्तार किया गया था। मजिस्ट्रेट ने पाया कि पुलिस ने गिरफ्तारी के कारणों की लिखित जानकारी नहीं दी थी। इसके आधार पर गिरफ्तारी को अवैध घोषित करते हुए उनकी रिहाई का आदेश दिया गया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता देते हुए गिरफ्तारी प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए।
अदालत ने क्या कहा?*
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी का आधार लिखित रूप में और ऐसी भाषा में उपलब्ध कराया जाना चाहिए जिसे आरोपी समझ सके। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जांच एजेंसी को बाद में हिरासत की आवश्यकता महसूस होती है, तो उसे पहले गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में बताकर संबंधित मजिस्ट्रेट से अनुमति लेनी होगी। साथ ही वरिष्ठ अधिकारी की मंजूरी भी आवश्यक होगी।
संविधान क्या देता है अधिकार?*
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(1) प्रत्येक व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण जानने और अपनी पसंद के वकील से परामर्श करने का अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 22(2) के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना जरूरी है। अदालत ने इन संवैधानिक प्रावधानों की पुनः पुष्टि करते हुए नागरिक स्वतंत्रता को मजबूत करने की बात कही।
नागरिकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?*
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय मनमानी गिरफ्तारी पर रोक लगाने और पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम है। इससे नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा मजबूत होगी और गैरकानूनी हिरासत के मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जा सकेगी।
गैरकानूनी गिरफ्तारी की स्थिति में क्या करें?*
यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए जाते हैं या संवैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता है, तो वह उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 अथवा सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर सकता है। इसके अलावा मुआवजे और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की भी मांग की जा सकती है।

