शीलता अष्टमी: माता कात्यायनी के आशीर्वाद और समृद्धि का पर्व
(डॉ. सीमा दाधीच)
शीलता अष्टमी एक प्राचीन हिंदू त्योहार है, जो माता के आशीर्वाद और समर्पण को समर्पित है। यह दिन सभी माता के लिए विशेष है, जो अपने बच्चों की सेहत और सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं।
शीलता अष्टमी का उल्लेख प्राचीन हिंदू ग्रंथों में मिलता है। यह त्योहार माताओं के विशेष प्यार और समर्पण को समर्पित है, जो अपने बच्चों की सेहत और सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना के लिए ठंडे का पूजन करती हैं।
देवी शीतला,माता कात्यायनी का एक रूप है।जिन्हें शीतलता और आरोग्य की देवी माना जाता है, इनकी पूजा अर्चना कर घर में स्वास्थ्य लाभ होता है। शीतला माता का पूजन सामाजिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक महत्व रखता है। शीतला माता के पूजारी के रूप में कुमावत जाति के लोगों को माना गया है इससे सामाजिक सौहाद्र का संदेश जाता है। इस दिन जाति पाति का भेद भूलाकर शीतला माता को भेट किए जाने वाले नैवेद्य, पूजन सामग्री, दक्षिणा आदि कुम्हार (कुमावत) जाति से जुड़े हुए लोगों को ही अर्पित करते है। साथ ही शीतला माता की सवारी गर्दभ (गधा) है जो मेहनत और कर्म करने का संदेश देता है।
यह पर्व होली के बाद मनाया जाता है। कुछ लोग इसे सप्तमी के दिन और कुछ लोग अष्टमी के दिन भी मनाते हैं। दोनों ही दिन माता शीतला को यह पर्व समर्पित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यह पर्व स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद माना गया है इस दिन माता शीतला का पूजन के साथ कुछ व्रत भी किया जाता है यह पर्व राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश में ज्यादा लोकप्रिय है। माना जाता है इस दिन से गर्मी की विधिवत शुरुआत होती है। जयपुर में कोटा चाकसू उपखंड के शील की डूंगरी क्षेत्र में इस दिन विशाल मेला भी लगता है। साथ ही यह पर्व गणगौर से पहले आने के कारण गणगौर पूजने वाली युवतियों के लिए भी यह दिन खास होता है इस दिन जयपुर सहित कई शहरों में युवतियां छोटे बच्चों को दूल्हा, दुल्हन के वेश में सजाकर मनोरंजन करती है। कई स्थानों पर इस दिन मेले भी आयोजित होते है। यह त्योहार सांकेतिक रूप से यह बताता है कि इस दिन के बाद से भोजन के रख रखाव में सावधानी रखनी चाहिए क्योंकि गर्मी की शुरुवात के कारण भोजन खराब होने की संभावना बढ़ जाती है। मौसम बदलाव के कारण शीतल भोजन ग्रहण करना चाहिए। माना जाता है कि चैत्र महीने से जब गर्मी प्रारंभ हो जाती है तो शरीर में अनेक प्रकार के पित्त विकार भी प्रारंभ हो जाते हैं। आयुर्वेद की भाषा में चेचक का ही नाम शीतला कहा गया है।
शीतला अष्टमी का वैज्ञानिक महत्व बहुत अधिक है। यह पर्व उस समय मनाया जाता है, जब शीत ऋतु की विदाई और ग्रीष्म ऋतु के आगमन का समय होता है। ऐसे में यह दो ऋतुओं का संधिकाल है। यह पर्व लोगों को अपने खान-पान पर विशेष ध्यान देने का संदेश देता है । अन्यथा बदलते मौसम के कारण स्वास्थ्य पर इसका असर देखने को मिलता सकता है। गर्मी के मौसम में ठंडा खाना खाने से पाचन तंत्र ठीक रहता है।वैज्ञानिक महत्व यह है कि चैत्र के महीने से गर्मी शुरु हो जाती है, ऐसे में ठंडा भोजन राहत पहुंचाने का काम करता है। मान्यता के अनुसार शीतला माता की अर्चना करने से और उन पर ठंडा जल चढ़ाने से चेचक, गलघोंटू, बड़ी माता, छोटी माता, तीव्र दाह, दुर्गंधयुक्त फोड़े, नेत्र रोग और शीतल जनित सभी प्रकार के दोष दूर हो जाते है ।आज भी बहुत से परिवार अष्टमी/सप्तमी के दिन अपने चूल्हे नहीं जलाते हैं, और सभीलोग खुशी-खुशी प्रसाद के रूप में ठंडा भोजन (पिछली रात का बनाया हुआ ) खाते हैं। *वन्देऽहंशीतलांदेवीं, रासभस्थांदिगम्बराम्। ,
मार्जनीकलशोपेतां, सूर्पालंकृतमस्तकाम्*
अर्थात्, मैं गर्दभ पर विराजमान, दिगंबरा, हाथ में झाड़ू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तक वाली भगवती शीतला की वंदना करता हूं।* इस वंदना मंत्र से यह पूर्णत: स्पष्ट हो जाता है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में झाड़ू होने का अर्थ है कि हम लोगों को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश में सभी तैतीस करोड़ देवी देवाताओं का वास रहता है, अतः इसके स्थापन-पूजन से घर-परिवार में समृद्धि आती है।
शीलता अष्टमी एक महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक त्योहार है, जो माताओं के प्यार और समर्पण को समर्पित है। यह दिन माताओं के लिए विशेष है, जो अपने बच्चों की सेहत और सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं।