
अनेक वाद्य, अनेक स्वर, एक लय और एक संकल्प; घोष केवल संगीत नहीं, सामूहिक साधना है।
दिव्यराष्ट्र के लिए लेखाराम बिश्नोई

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति में घोष का स्थान विशिष्ट है। सामान्यतः घोष को विभिन्न वाद्ययंत्रों के सामूहिक वादन के रूप में देखा जाता है, लेकिन संघ की दृष्टि में यह केवल संगीत कला नहीं, बल्कि अनुशासन, एकाग्रता, सामूहिकता, समन्वय और राष्ट्रभाव की प्रभावशाली अभिव्यक्ति है। घोष के स्वर स्वयंसेवकों को एक लय में चलना, संकेतों को समझना, अपने दायित्व के प्रति सजग रहना और सामूहिक लक्ष्य के लिए व्यक्तिगत दक्षता का उपयोग करना सिखाते हैं।
शाखा में घोष की ध्वनि केवल वातावरण को गुंजायमान नहीं करती, बल्कि स्वयंसेवकों के मन में उत्साह, कार्य के प्रति तत्परता और संगठन के प्रति समर्पण का भाव भी जागृत करती है। जब सैकड़ों अथवा हजारों घोष वादक एक साथ निर्धारित ताल, स्वर और संकेतों के अनुरूप वादन करते हैं, तब अनेक व्यक्तियों की साधना एक सामूहिक अभिव्यक्ति बन जाती है। यही घोष की विशेषता है—स्वरों में विविधता होते हुए भी लय में एकरूपता और व्यक्तिगत प्रयासों में सामूहिक संकल्प।
राजस्थान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के घोष कार्य की यात्रा भी इसी निरंतर साधना, प्रशिक्षण और परंपरा के विस्तार की कहानी है। अजमेर में ‘स्वर निनाद’ से आरंभ हुई व्यापक प्रांतीय घोष आयोजनों की यह यात्रा जयपुर के ‘स्वर गोविन्दम्’ से आगे बढ़ते हुए अब जोधपुर की मरुधरा पर ‘मरू निनाद’ के रूप में नया अध्याय रचने जा रही है।
*‘स्वर निनाद’ : सात सौ घोष वादकों का सामूहिक स्वर*
राजस्थान में संघ घोष की परंपरा के उल्लेखनीय पड़ावों में अजमेर के अजयमेरु स्थित आजाद पार्क में आयोजित ‘स्वर निनाद’ घोष शिविर का विशेष स्थान है। 30 जनवरी से 2 फरवरी 2014 तक आयोजित इस चार दिवसीय शिविर में चित्तौड़ प्रांत के 11 जिलों से लगभग 700 घोष वादक एवं संगीत साधक स्वयंसेवकों ने सहभागिता की थी। शिविर का उद्देश्य घोष वादन का प्रशिक्षण देने के साथ-साथ स्वयंसेवकों में अनुशासन, एकाग्रता, सामूहिकता और राष्ट्रभाव को अधिक सुदृढ़ करना था। शिविर के समापन समारोह में संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का सानिध्य प्राप्त हुआ।
‘स्वर निनाद’ ने घोष की साधना के उस स्वरूप को सामने रखा, जिसमें वाद्ययंत्रों की तकनीकी दक्षता के साथ सामूहिक अनुशासन को भी समान महत्व दिया जाता है। प्रत्येक वादक अपने वाद्य की ध्वनि और लय पर अधिकार प्राप्त करता है, लेकिन उसकी दक्षता का वास्तविक महत्व तब सामने आता है, जब वह पूरे घोष-दल के साथ सामंजस्य स्थापित करता है।
सामूहिक वादन में प्रत्येक वादक को अपने साथियों की गति, संचालक के संकेत और निर्धारित ताल के प्रति सजग रहना होता है। व्यक्तिगत कुशलता तभी प्रभावशाली बनती है, जब वह सामूहिक लय के साथ जुड़ती है। इस दृष्टि से घोष स्वयंसेवक को केवल संगीत नहीं सिखाता, बल्कि अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए पूरे समूह के प्रति उत्तरदायित्व निभाने का संस्कार भी देता है।
‘स्वर निनाद’ इसी अभ्यास और अनुशासन का प्रभावशाली उदाहरण बना। इस शिविर ने राजस्थान में घोष कार्य को व्यापक मंच प्रदान किया और आगे होने वाले बड़े आयोजनों के लिए प्रेरक आधार तैयार किया।
*‘स्वर गोविन्दम्’ : साधना का विस्तार, परंपरा का विकास*
अजमेर के ‘स्वर निनाद’ के बाद राजस्थान में घोष कार्य की व्यापकता का एक और महत्वपूर्ण स्वरूप वर्ष 2017 में जयपुर के केशव विद्यापीठ, जामडोली में आयोजित ‘स्वर गोविन्दम्’ घोष शिविर में देखने को मिला। इस आयोजन में लगभग 1500 घोष वादक स्वयंसेवकों ने सहभागिता की। जयपुर प्रांत बनने के बाद इसे घोष के बड़े आयोजनों में गिना गया।
‘स्वर गोविन्दम्’ केवल सहभागिता की संख्या बढ़ने का संकेत नहीं था, बल्कि यह घोष प्रशिक्षण की निरंतरता और संगठनात्मक अनुभव के विस्तार का भी परिचायक था। इतने बड़े घोष-दल को एक साथ अभ्यास कराना, वाद्यों के स्वर और ताल में समन्वय स्थापित करना तथा सामूहिक वादन को प्रभावी बनाना निरंतर प्रशिक्षण, नियोजन और अनुशासन की अपेक्षा करता है।
‘स्वर निनाद’ और ‘स्वर गोविन्दम्’ जैसे आयोजनों की सार्थकता उनके आयोजन की अवधि तक सीमित नहीं रहती। इनसे प्राप्त प्रशिक्षण और अनुभव शाखाओं तथा अन्य सांघिक कार्यक्रमों में घोष कार्य को आगे बढ़ाने में उपयोगी होते हैं। प्रशिक्षित स्वयंसेवक अपने-अपने क्षेत्रों में घोष की कला और अनुशासन की परंपरा को आगे ले जाते हैं। इस प्रकार एक शिविर में अर्जित अनुभव अनेक स्थानों पर होने वाले अभ्यास और प्रशिक्षण का आधार बनता है।
यही किसी जीवंत परंपरा की पहचान है। परंपरा केवल स्मरण से सुरक्षित नहीं रहती; उसे निरंतर अभ्यास, नए साधकों के प्रशिक्षण और पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान के हस्तांतरण से आगे बढ़ाया जाता है। राजस्थान में संघ घोष की यात्रा भी इसी निरंतरता को अभिव्यक्त करती है।
*‘मरू निनाद’ : मरुधरा पर गूंजने जा रहा विराट स्वर*
अब इसी परंपरा का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव जोधपुर प्रांत में आयोजित होने वाला ‘मरू निनाद’ घोष शिविर है। संघ के शताब्दी वर्ष की पूर्णता के ठीक पश्चात 12 से 15 नवंबर 2026 तक जोधपुर के शिकारपुरा स्थित राजाराम आश्रम परिसर में प्रस्तावित यह शिविर राजस्थान में घोष कार्य की व्यापकता और निरंतर साधना को नई पहचान देने वाला आयोजन बनने जा रहा है।
जोधपुर प्रांत में लगभग छह वर्ष पूर्व ‘मरू निनाद प्रांत घोष वर्ग’ की योजना बनाई गई थी, लेकिन श्रीराम जन्मभूमि, अयोध्या से संबंधित ऐतिहासिक निर्णय के समय उत्पन्न परिस्थितियों के कारण इसे स्थगित करना पड़ा। अब लंबे अंतराल के बाद इस योजना को साकार करने की तैयारी है। शिविर के लिए राजाराम आश्रम परिसर में भूमि पूजन वैदिक मंत्रोच्चार एवं यज्ञ के साथ संपन्न किया गया। इस अवसर पर साधु-संतों, प्रबुद्धजनों और संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की उपस्थिति रही।
‘मरू निनाद’ में लगभग 5000 घोष वादक स्वयंसेवकों के सहभाग करने की संभावना है। प्रस्तावित संख्या के अनुरूप आयोजन संपन्न होने पर यह राजस्थान क्षेत्र के तीनों प्रांतों में अब तक के सबसे बड़े घोष आयोजनों में से एक होगा। इसमें पश्चिमी राजस्थान के 21 जिला इकाइयों के घोष वादकों की सहभागिता की योजना है। इतने बड़े स्तर पर घोष वादकों का एकत्र होना, प्रशिक्षण प्राप्त करना और सामूहिक वादन प्रस्तुत करना अपने आप में व्यापक संगठनात्मक समन्वय की अपेक्षा करता है।
इस आयोजन को संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत का सानिध्य भी प्राप्त होगा। सरसंघचालक की उपस्थिति शिविर के महत्व को विशेष आयाम प्रदान करेगी। घोष साधकों के लिए यह अवसर प्रशिक्षण, अभ्यास, सामूहिक अनुशासन और सांघिक अनुभूति को और गहराई से समझने का माध्यम बनेगा।
‘मरू निनाद’ का महत्व केवल इसमें भाग लेने वाले स्वयंसेवकों की संभावित संख्या में नहीं है। इसका महत्व उस दीर्घकालीन तैयारी, प्रशिक्षण और समर्पण में है, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों के घोष वादक एक साथ आकर एक स्वर और एक लय में अपनी साधना प्रस्तुत करेंगे। मरुधरा की सांस्कृतिक पहचान, राजस्थान की जीवंत परंपराएं और संघ की घोष साधना इस आयोजन को एक विशिष्ट स्वरूप प्रदान करेंगी।
*संख्या से आगे : साधना की निरंतरता का परिचायक*
यदि राजस्थान में आयोजित इन तीन प्रमुख घोष आयोजनों की यात्रा पर दृष्टि डालें, तो एक उल्लेखनीय क्रम दिखाई देता है। अजमेर के ‘स्वर निनाद’ में लगभग 700 घोष वादक, जयपुर के ‘स्वर गोविन्दम्’ में लगभग 1500 घोष वादक और अब जोधपुर के ‘मरू निनाद’ में लगभग 5000 घोष वादकों की प्रस्तावित सहभागिता इस विस्तार को रेखांकित करती है।
यह क्रम केवल संख्यात्मक वृद्धि का विवरण नहीं है। इसके पीछे घोष के प्रति बढ़ती रुचि, प्रशिक्षण की निरंतरता, वाद्य कला के प्रति समर्पण और सामूहिक अभ्यास की परंपरा का विस्तार निहित है। प्रत्येक बड़े आयोजन के साथ प्रशिक्षण का अनुभव, आयोजन क्षमता और सामूहिक वादन की संभावनाएं भी व्यापक होती हैं।
किसी बड़े घोष शिविर की सफलता केवल वादकों की संख्या से निर्धारित नहीं होती। वादन की गुणवत्ता, अनुशासन, तालमेल, प्रशिक्षण की प्रभावशीलता और स्वयंसेवकों में विकसित होने वाला सामूहिक भाव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। संख्या आयोजन का विस्तार बताती है, जबकि साधना उसकी वास्तविक गुणवत्ता का आधार बनती है।
‘स्वर निनाद’ से ‘स्वर गोविन्दम्’ और फिर ‘मरू निनाद’ तक की यात्रा इस तथ्य को रेखांकित करती है कि घोष कार्य एक सतत प्रक्रिया है। इसमें अभ्यास की नियमितता, वाद्ययंत्रों का ज्ञान, स्वर और ताल की समझ, संचालक के संकेतों का पालन तथा सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं।
*संघ घोष के आठ वाद्ययंत्र : अनेक ध्वनियों का समन्वित संसार*
संघ घोष की विशेषता उसके वाद्ययंत्रों की विविधता और उनके बीच स्थापित सामंजस्य में निहित है। प्रत्येक वाद्य की अपनी ध्वनि, अपनी भूमिका और अपनी उपयोगिता होती है। ताल प्रदान करने वाले वाद्य वादन को आधार एवं गति देते हैं, जबकि स्वरप्रधान और सुषिर वाद्य धुन तथा ध्वनि के विस्तार में योगदान करते हैं। सभी वाद्यों का समन्वय ही घोष को प्रभावशाली सामूहिक अभिव्यक्ति बनाता है।
**1. आनक : अनुशासन की गहरी ध्वनि**
आनक एक प्रभावशाली ताल वाद्य है। इसकी गंभीर और गूंजदार ध्वनि सामूहिक वादन को मजबूत आधार प्रदान करती है। निर्धारित ताल के माध्यम से यह वादन में स्थिरता और एकरूपता लाने में सहायक होता है। इसकी ध्वनि घोष-दल की सामूहिक शक्ति और अनुशासन का प्रभाव उत्पन्न करती है।
**2. पणव : गति और उत्साह का आधार**
पणव घोष के ताल पक्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके लयबद्ध वादन से गति और उत्साह का संचार होता है। सामूहिक वादन में ताल की निरंतरता बनाए रखने और निर्धारित लय के अनुरूप चलने में इसकी उपयोगिता है। पणव का अभ्यास वादक में समयबोध और सजगता विकसित करता है।
**3. शंख : मंगल और जागरण का नाद**
शंख भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का प्राचीन वाद्य है। इसकी ध्वनि का संबंध मंगल, शुभारंभ और जागरण से रहा है। घोष में शंख का स्वर विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न करता है। इसकी गूंज सांस्कृतिक चेतना और सामूहिक उत्साह की अनुभूति कराती है।
**4. झांझरी : ताल और समरसता की अभिव्यक्ति**
झांझरी धातु से बना ताल वाद्य है, जिसकी स्पष्ट ध्वनि सामूहिक वादन में ताल को उभारती है। इसका महत्व केवल ध्वनि उत्पन्न करने में नहीं, बल्कि अन्य वाद्यों के साथ निर्धारित तालमेल बनाए रखने में भी है। इसका अभ्यास वादक को समूह की लय के प्रति सजग रहना सिखाता है।
**5. त्रिभुज : लय में संतुलन का स्वर**
त्रिभुज आकार में सरल, लेकिन ध्वनि की दृष्टि से विशिष्ट ताल वाद्य है। इसे छोटी छड़ी से बजाने पर खनकदार ध्वनि उत्पन्न होती है। घोष में इसका योगदान सामूहिक लय को स्पष्टता प्रदान करना है। यह उदाहरण है कि किसी समूह में प्रत्येक वाद्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, चाहे उसका स्वर कितना ही अलग क्यों न हो।
**6. तूर्य : ओज और उत्साह का आह्वान**
तूर्य पारंपरिक सुषिर वाद्यों की श्रेणी से संबंधित है। इसकी प्रभावशाली ध्वनि घोष के स्वर-विस्तार और सामूहिक प्रभाव को बढ़ाती है। इसका वादन अभ्यास, श्वास नियंत्रण और स्वर पर अधिकार की अपेक्षा करता है। अन्य वाद्यों के साथ इसका समन्वय घोष की प्रस्तुति को अधिक प्रभावी बनाता है।
**7. नागांग : गंभीरता और सामूहिक शक्ति का नाद**
नागांग घोष के विशिष्ट वाद्यों में शामिल है। इसकी गंभीर ध्वनि सामूहिक वादन में गूंज और प्रभाव उत्पन्न करती है। निर्धारित लय और संकेतों के अनुरूप इसका वादन घोष-दल के समन्वय को सुदृढ़ करता है। इसकी भूमिका समूह की ध्वनि-संरचना को व्यापकता प्रदान करने में महत्वपूर्ण है।
**8. स्वरद : सुरों में समरसता का सेतु**
स्वरद स्वरप्रधान वाद्य है, जो घोष की ध्वनि-संरचना में सुरों के संतुलन और माधुर्य को विस्तार देता है। अन्य वाद्यों के साथ इसका सामंजस्य सामूहिक वादन को अधिक प्रभावशाली बनाता है। स्वरद यह अनुभव कराता है कि अलग-अलग ध्वनियां जब एक निर्धारित स्वर-व्यवस्था में जुड़ती हैं, तो वे एक सुंदर सामूहिक अभिव्यक्ति का निर्माण करती हैं।
इन आठ वाद्यों का परिचय यह स्पष्ट करता है कि घोष की प्रभावशीलता किसी एक वाद्य पर निर्भर नहीं करती। ताल, स्वर, गति, संकेत और अनुशासन का समन्वय ही उसे पूर्णता प्रदान करता है। प्रत्येक वादक अपनी भूमिका का निर्वहन करते हुए पूरे घोष-दल की लय और गति के प्रति सजग रहता है। यही अभ्यास सामूहिक उत्तरदायित्व और एकरूपता के संस्कार को मजबूत करता है।
*वाद्ययंत्रों से जीवन-मूल्यों तक : घोष का व्यापक संदेश*
घोष वादन की साधना में संगीत के साथ जीवन के अनेक महत्वपूर्ण मूल्य भी समाहित हैं। किसी वाद्य को सीखने के लिए निरंतर अभ्यास, धैर्य और एकाग्रता की आवश्यकता होती है। सामूहिक वादन के लिए इन गुणों के साथ दूसरों के प्रति सजगता, संकेतों का पालन और अपने दायित्व की समझ भी आवश्यक है।
घोष-दल में प्रत्येक वादक अपनी भूमिका निभाता है, लेकिन कोई भी वादक केवल अपनी ध्वनि को महत्वपूर्ण मानकर सामूहिक वादन को प्रभावी नहीं बना सकता। उसे अपनी गति और स्वर को पूरे समूह की लय के अनुरूप रखना होता है। यही व्यक्तिगत दक्षता और सामूहिक उत्तरदायित्व का संबंध है।
सामाजिक जीवन में भी यही सिद्धांत उपयोगी है। समाज में अलग-अलग स्वभाव, क्षमताएं, विचार और कार्यक्षेत्र होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी विशिष्टता होती है, लेकिन समाज की सामूहिक प्रगति के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपने दायित्व को समझे और व्यापक हित के साथ समन्वय स्थापित करे। विविधता को बनाए रखते हुए एकता का भाव विकसित करना ही सशक्त संगठन और स्वस्थ सामाजिक जीवन का आधार है।
इस अर्थ में घोष का अभ्यास ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा का प्रतीक बन जाता है। व्यक्ति अपनी दक्षता विकसित करता है, लेकिन उसे समूह के साथ जोड़कर व्यापक उद्देश्य की पूर्ति में लगाता है। व्यक्तिगत प्रतिभा का सामूहिक उपयोग ही किसी संगठन की वास्तविक शक्ति बनता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष संगठन की यात्रा, अनुभव और समाजजीवन में उसकी भूमिका पर विचार करने का महत्वपूर्ण अवसर रहा है। इस संदर्भ में ‘मरू निनाद’ जैसे आयोजन घोष की परंपरा के साथ-साथ अनुशासन, प्रशिक्षण, सामूहिकता और निरंतरता के महत्व को भी रेखांकित करते हैं।
घोष के स्वर स्वयंसेवकों को एक साथ चलने और सामूहिक लक्ष्य के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देते हैं। जब विभिन्न क्षेत्रों से आए हजारों वादक एक ही लय में वादन करते हैं, तब उनकी प्रस्तुति में व्यक्तिगत साधना के साथ सामूहिक प्रयास भी मुखर होता है। यह अनुभव बताता है कि बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रतिभा, प्रशिक्षण, अनुशासन और परस्पर समन्वय सभी आवश्यक हैं।
राजस्थान की धरती पर ‘स्वर निनाद’ से ‘स्वर गोविन्दम्’ और अब ‘मरू निनाद’ तक की यात्रा इसी निरंतरता की कहानी है। अजमेर में सैकड़ों घोष वादकों के सामूहिक स्वर से आरंभ हुआ व्यापक आयोजन क्रम अब हजारों घोष वादकों की प्रस्तावित सहभागिता तक पहुंच रहा है। इसके साथ घोष प्रशिक्षण की परंपरा, सामूहिक अभ्यास की संस्कृति और संगठनात्मक समन्वय का महत्व भी सामने आता है।
मरुधरा पर गूंजने वाला ‘मरू निनाद’ केवल वाद्ययंत्रों की ध्वनि का उत्सव नहीं होगा। यह वर्षों की साधना, अभ्यास, अनुशासन और समर्पण का सामूहिक स्वर होगा। इसके प्रत्येक ताल में एकरूपता, प्रत्येक स्वर में साधना और प्रत्येक सामूहिक प्रस्तुति में समन्वय का संदेश सुनाई देगा।
‘स्वर निनाद’ से आरंभ हुई यह यात्रा ‘मरू निनाद’ के विराट स्वर तक पहुंचते हुए एक मूल भाव को अभिव्यक्त करती है—व्यक्ति की दक्षता जब सामूहिक अनुशासन से जुड़ती है, तब वह व्यापक उद्देश्य की शक्ति बन जाती है। घोष की यही साधना संगठनात्मक एकता का अनुभव कराती है और राष्ट्रजीवन के प्रति समर्पण की भावना को स्वर देती है।
**अनेक वाद्य, अनेक स्वर, अनेक साधक—लेकिन लय एक, अनुशासन एक और संकल्प सामूहिक। यही ‘मरू निनाद’ का भाव है और यही घोष की साधना से राष्ट्र साधना तक की यात्रा का मूल संदेश है।**




