
(दिव्यराष्ट्र) कुछ व्यक्तित्व केवल साहित्य नहीं रचते, वे इतिहास रचते हैं। डॉ. सुशील दाहिमा ‘अभय’ ऐसे ही विरल साहित्यकार, पत्रकार, अनुवादक और भाषा-सेतु हैं, जिन्होंने छह दशकों से अधिक समय तक अहिंदी भाषी प्रदेश ओड़िशा में हिंदी साहित्य, पत्रकारिता और भाषाई समन्वय की ऐसी अलख जगाई, जो आज भी प्रेरणा का स्रोत है।
12 अगस्त 1945 को ओड़िशा के राजगांगपुर में जन्मे डॉ. अभय का कर्मक्षेत्र लगभग पाँच दशकों से राउरकेला रहा है। उन्होंने हिंदी और ओड़िया साहित्य के बीच सशक्त सेतु का निर्माण करते हुए अनेक महत्वपूर्ण कृतियों का सृजन, अनुवाद, संपादन एवं प्रकाशन किया। क्षणिका, काई के फूल, टुकड़ों में बंटा मन, अंजुरी का अंगारा, किरचन एक स्वप्न की जैसी उनकी कृतियाँ साहित्य जगत में विशिष्ट स्थान रखती हैं।
उनकी साहित्यिक साधना पर दो एम.फिल. शोध कार्य संपन्न हुए तथा उन्हें राष्ट्रभाषा रत्न, विद्या वाचस्पति, साहित्यरत्न, समाज रत्न, इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन अवार्ड सहित देशभर की अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया।
डॉ. अभय को ओड़िशा में हिंदी पत्रकारिता का आधार-स्तंभ कहा जाता है। सत्तर के दशक में उन्होंने हिंदी पत्रकारिता की सुदृढ़ नींव रखी, हिंदी काव्यगोष्ठियों एवं अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों का शुभारंभ किया तथा ओड़िया, हिंदी और सादरी भाषाओं के समन्वय का अभिनव प्रयास किया। राउरकेला एक्सप्रेस जैसे ओड़िशा के प्रथम पूर्ण हिंदी दैनिक के संपादक तथा उत्कल मेल के संपादकीय नेतृत्व ने हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा और व्यापक पहचान प्रदान की।
81 वर्ष की आयु में भी राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार, सामाजिक जागरूकता, साहित्य-सृजन तथा भाषाई सौहार्द के लिए उनका निरंतर सक्रिय रहना उनकी अदम्य कर्मनिष्ठा का परिचायक है।
“जब एक व्यक्ति अपने जीवन को भाषा, साहित्य और समाज के लिए समर्पित कर देता है, तब वह केवल लेखक नहीं रहता—वह एक युग का प्रेरणास्रोत बन जाता है।”




