
नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल में हुआ इलाज
मुंबई:/ नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने 23 सप्ताह में जन्मे, महज 800 ग्राम वजन वाले बच्चे का सफलतापूर्वक इलाज किया। बच्चे को पेटेंट डक्टस आर्टेरियोसस (पीडीए) नाम की गंभीर हृदय समस्या थी और वह लंबे समय से वेंटिलेटर सपोर्ट पर था।
सिर्फ 800 ग्राम वजन वाले इस बच्चे का जन्म गर्भावस्था के 23वें सप्ताह में हुआ था। दूसरे अस्पताल में एक महीने से अधिक समय तक उसे बार-बार वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत पड़ी। इसके बाद हाल ही में नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल में उस पर कम चीरे वाली सटीक हृदय प्रक्रिया की गई।
नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल की सीनियर कंसल्टेंट पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. प्रिया प्रधान के अनुसार, बच्चा बेहद समय से पहले पैदा हुआ था और लंबे समय से वेंटिलेटर पर था। उसे वेंटिलेटर से हटाने की कई बार कोशिश की गई, लेकिन हर बार उसे दोबारा वेंटिलेटर की जरूरत पड़ गई।
बच्चे की इस गंभीर स्थिति की वजह पेटेंट डक्टस आर्टेरियोसस (पीडीए) थी। यह जन्म से मौजूद हृदय संबंधी समस्या है, जिसमें दो बड़ी रक्त वाहिकाओं के बीच एक अतिरिक्त रास्ता खुला रह जाता है। इनमें से एक फेफड़ों तक रक्त पहुंचाने वाली पल्मोनरी आर्टरी और दूसरी शरीर के बाकी हिस्सों तक रक्त पहुंचाने वाली एओर्टा होती है।
नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल की मेडिकल टीम बच्चे की जान बचाने के लिए एकजुट हुई। इतने कम वजन वाले और बेहद समय से पहले जन्मे बच्चे में इस प्रक्रिया की सफलता केवल इलाज की तकनीक पर ही नहीं, बल्कि पूरी तैयारी, आपसी तालमेल और टीमवर्क पर भी निर्भर थी।
टीम ने बच्चे के पीडीए को बंद करने के लिए पिकोलो डिवाइस सफलतापूर्वक लगाया। यह एक क्रांतिकारी मेडिकल डिवाइस है, जिसे खास तौर पर पीडीए वाले समय से पहले जन्मे बच्चों के लिए बनाया गया है। पीडीए दिल में एक खतरनाक खुला रास्ता होता है।
प्रक्रिया के बाद बच्चे को आईसीयू में रखा गया। इसके बाद उसकी वेंटिलेटर पर निर्भरता काफी हद तक कम कर दी गई। बाद में बच्चे को केवल न्यूनतम वेंटिलेशन सपोर्ट के साथ उसके पहले वाले अस्पताल में वापस भेज दिया गया।
डॉ. प्रधान ने बताया, “पूरे समय पर जन्मे बच्चों में पीडीए आमतौर पर जन्म के पहले दो-तीन दिनों में अपने आप बंद हो जाता है। लेकिन यह बच्चा सिर्फ 23 सप्ताह में पैदा हुआ था और उसका पीडीए बंद नहीं हुआ। इतने छोटे बच्चे के लिए इसे बंद करना जरूरी था, क्योंकि उसे लगातार वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत पड़ रही थी।”
800 ग्राम के बच्चे के इलाज की चुनौतियों से निपटना
सिर्फ 800 ग्राम वजन वाले बच्चे पर यह प्रक्रिया करने के लिए सोच-समझकर योजना बनाने और छोटी से छोटी बात पर ध्यान देने की जरूरत होती है। डॉ. प्रधान के अनुसार, इस प्रक्रिया के मुख्य नियमों में बच्चे को कम से कम और हल्के हाथों से छूना, उसके शरीर का तापमान बनाए रखना और संक्रमण से बचाव शामिल थे।
बच्चे को कैथेटराइजेशन लैब यानी कैथ लैब तक ले जाते समय तापमान बनाए रखना खास तौर पर जरूरी था। कैथ लैब का तापमान सामान्य तौर पर कम रखा जाता है, इसलिए बच्चे को गर्म रखने के लिए हर संभव कोशिश करनी पड़ी। प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली चादरें, त्वचा को संक्रमण-मुक्त करने वाले सॉल्यूशन (पेंटिंग सॉल्यूशन), फ्लशिंग सॉल्यूशन और नसों के जरिए दिए जाने वाले आईवी फ्लूइड्स को भी सही तापमान तक गर्म किया गया।
बच्चे के शरीर में आईवी लाइन लगाना एक और बड़ी चुनौती थी। डॉ. प्रधान ने एनेस्थीसिया टीम के सहयोग की सराहना की, जिसने जरूरी आईवी लाइन लगाने और बच्चे को प्रक्रिया के लिए सुरक्षित रूप से तैयार करने में मदद की।
इस पूरी प्रक्रिया में अलग-अलग विशेषज्ञों की टीम ने मिलकर काम किया। फेलो कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. सुप्रतीम सेन ने प्रक्रिया के दौरान डॉ. प्रधान की सहायता की। साथ ही, कैथेटर से की जाने वाली प्रक्रिया सफल न होने या सर्जरी की जरूरत पड़ने की स्थिति के लिए एक सर्जन को भी तैयार रखा गया था।
बारीकी से देखभाल की अहमियत बताता मामला
इस मामले पर बात करते हुए डॉ. प्रधान ने कहा कि बेहद समय से पहले जन्मे बच्चों का इलाज करते समय सोची-समझी योजना, टीम के बीच पूरा तालमेल और छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देना जरूरी होता है।
, “इस मामले से पता चलता है कि शरीर का तापमान बनाए रखना, संक्रमण से बचाव, बच्चे को सावधानी से संभालना, एनेस्थीसिया टीम का सहयोग, कार्डियोलॉजी विशेषज्ञता और जरूरत पड़ने पर सर्जिकल टीम की मदद, ये सब मिलकर बेहद छोटे और समय से पहले जन्मे बच्चों में जटिल हृदय प्रक्रियाओं को सुरक्षित और सफल बना सकते हैं। यह मामला नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल में बच्चों के ऐसे जटिल मामलों के इलाज के लिए उपलब्ध अलग-अलग विशेषज्ञताओं को भी सामने लाता है।”


