
संगठन, संस्कार और समर्पण का जीवंत अध्याय
5 जुलाई 2026 को जन्म दिवस पर विशेष
(दिव्यराष्ट्र के लिए विमलेश शर्मा)
किसी व्यक्ति के बारे में धारणा बनाना जितना सरल होता है, उसे निकट से समझना उतना ही कठिन। दूर से दिखाई देने वाला व्यक्तित्व अक्सर वास्तविकता से भिन्न होता है। मेरे लिए भी सुशील ओझा कुछ ऐसे ही व्यक्तित्व रहे हैं। वर्ष 2018 से पहले उनसे कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं था। नाम अवश्य सुना था, परंतु सामाजिक संगठनों की गतिविधियाँ मेरी पत्रकारिता की प्राथमिकताओं में कभी शामिल नहीं रहीं। मैं विशुद्ध रूप से पत्रकार था और पत्रकारिता ही मेरी पहचान थी। सामाजिक संगठनों से मेरा संबंध भी उतना ही था, जितना किसी समाचार की आवश्यकता के लिए होना चाहिए।
वर्ष 2018 में जयपुर के रामबाग होटल के सामने आयोजित विप्र फाउंडेशन के संस्कारोदय कार्यक्रम में पहली बार सुशील ओझा से विस्तार से संवाद हुआ। वह केवल एक औपचारिक मुलाकात नहीं थी। बातचीत का वह सिलसिला धीरे-धीरे ऐसा आगे बढ़ा कि समाज, संगठन, राजनीति, भाषा, संस्कृति और जीवन के अनेक विषयों पर निरंतर संवाद होने लगा। उन्हीं संवादों ने मेरे मन में वर्षों से बनी अनेक धारणाओं को बदल दिया।
समय के साथ यह अनुभव हुआ कि किसी व्यक्ति के बारे में सुनी-सुनाई बातें और वास्तविकता में बहुत अंतर होता है। विरोधियों के आरोप और किसी व्यक्ति का वास्तविक जीवन—दोनों हमेशा एक जैसे नहीं होते। आज भी आलोचक मिल जाते हैं, लेकिन सच्चाई को अधिक समय तक झुठलाया नहीं जा सकता।
सच कहूँ तो प्रारंभ में मेरा जुड़ाव केवल सर्व विप्र मार्तंड पत्रिका के प्रकाशन और संचालन तक सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे मैंने पाया कि मेरे सामने एक ऐसा व्यक्ति खड़ा है, जो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर समाज उत्थान के मिशन में स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर चुका है। कब मैं स्वयं उस मिशन का हिस्सा बन गया, इसका उत्तर आज भी मेरे पास नहीं है।
जिस व्यक्ति ने जीवनभर अखबारों में भी अपनी शर्तों पर काम किया हो, वह किसी एक संगठन के साथ नौ वर्षों तक कैसे जुड़ा रह सकता है? यदि इसका उत्तर किसी के पास है तो वह स्वयं सुशील ओझा हैं। मेरे भीतर आए इस परिवर्तन में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। साथ ही विप्र फाउंडेशन के पूर्व अध्यक्ष और मेरे अग्रज महावीर प्रसाद शर्मा का भी विशेष योगदान रहा, जिन्होंने मेरे व्यक्तित्व और स्वाभिमान को सदैव सम्मान दिया।
इन दोनों महानुभावों ने मेरी उस कमजोरी को भी पहचान लिया था, जिसे मैं अपनी ताकत मानता हूँ—मुंह पर खरी-खरी बात कह देना। शायद यही कारण रहा कि कभी टकराव की स्थिति बनी ही नहीं।
नौ वर्षों की निकटता में मैंने सुशील ओझा को एक संगठनकर्ता, लेखक, रणनीतिकार, नवाचारी, वक्ता, श्रोता और कर्मयोगी के रूप में देखा है। लेकिन यदि इन सब विशेषणों से ऊपर एक शब्द चुनना हो, तो मैं उन्हें “संस्कारवान संगठन पुरुष” कहूँगा।
क्योंकि अंततः किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान उसके पद, प्रसिद्धि या उपलब्धियाँ नहीं होतीं, बल्कि वे संस्कार होते हैं, जो उसे लाखों लोगों के हृदय से जोड़ते हैं।
सुशील ओझा को मैंने इसी रूप में देखा, समझा और पाया है।


