नए सरकारी मानकों ने कैसे अश्वगंधा उगाने वाले छोटे किसानों के लिए खोले समृद्धि के द्वार
रामगंजमंडी/दिव्यराष्ट्र: देश के कृषि और आयुर्वेदिक दवा बाजार में इन दिनों एक बड़े नीतिगत बदलाव का जमीनी असर देखने को मिल रहा है। अश्वगंधा, जिसे भारतीय आयुर्वेद की रीढ़ माना जाता है, उसकी खेती करने वाले हजारों किसानों की आर्थिक स्थिति में अचानक बड़ा उछाल आया है। इसका कारण कोई मौसमी बदलाव या कर्ज माफी नहीं है, बल्कि केंद्र सरकार के आयुष मंत्रालय और भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ( एफ़एसएसएआई ) द्वारा लिया गया एक सख्त फैसला है। इन नियामक संस्थाओं द्वारा अश्वगंधा की पत्तियों के कमर्शियल इस्तेमाल पर लगाए गए प्रतिबंध ने न केवल आयुर्वेदिक औषधियों में चल रहे एक बड़े मिलावट के खेल को खत्म कर दिया है, बल्कि किसानों को उनकी उपज का वास्तविक और लाभकारी मूल्य भी दिलाना शुरू कर दिया है।
आयुर्वेद में औषधीय उपयोग के लिए अश्वगंधा की जड़ की ही सिफारिश की गई है। इसके बावजूद, हाल के वर्षों में कॉर्पोरेट जगत में मुनाफा कमाने की होड़ में पत्तियों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ गया था। देश की सबसे बड़ी औषधीय मंडी मध्य प्रदेश की नीमच कृषि उपज मंडी और राजस्थान की रामगंज कृषि उपज मंडी के 2025-26 के आंकड़े इस खेल की पूरी कहानी बयां करते हैं। मंडी में अश्वगंधा की जड़ों का औसत दाम 23,000 रुपये प्रति क्विंटल था, जबकि पत्तियों का दाम महज 650 रुपये प्रति क्विंटल। चूंकि जड़ को जमीन से उखाड़ने में भारी मेहनत लगती है और उत्पादन सीमित होता है, वहीं पत्तियां मुफ्त में और भारी मात्रा में मिल जाती हैं। इसी कीमत के अंतर का फायदा उठाकर कुछ दवा और फूड सप्लीमेंट निर्माता कंपनियों ने महंगी जड़ों की जगह सस्ती पत्तियों को दवाओं में मिलाना शुरू कर दिया था। यह न केवल किसानों के साथ आर्थिक धोखा था, बल्कि आम जनता की सेहत के साथ भी खिलवाड़ था, क्योंकि आधुनिक वैज्ञानिक शोध में अश्वगंधा की पत्तियों के सेवन को स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह पाया गया है।
बाजार की इस विसंगति और स्वास्थ्य जोखिमों पर कड़ा संज्ञान लेते हुए, इसी साल अप्रैल में सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाए। 15 अप्रैल को आयुष मंत्रालय ने एक सख्त निर्देश जारी किया, जिसमें मैन्युफैक्चरर्स और एक्सपोर्टर्स के लिए औषधियों में सिर्फ जड़ों का इस्तेमाल कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया। इस आदेश की स्याही सूखी भी नहीं थी कि 16 अप्रैल को एफएसएसएआई ने फूड सप्लीमेंट्स में इन पत्तियों के उपयोग पर हमेशा के लिए प्रतिबंध लगा दिया। इस डबल स्ट्राइक ने बाजार से सस्ती पत्तियों का विकल्प रातों-रात खत्म कर दिया और कंपनियों को शुद्ध जड़ों की खरीद के लिए मजबूर कर दिया। पत्तियों पर प्रतिबंध के बाद नीमच और रामगंज जैसी प्रमुख औषधीय मंडियों में माहौल पूरी तरह बदल चुका है। अब मंडियों में विदेशी कंपनियों के एजेंट और बड़े निर्यातक खुद मौजूद रहकर शुद्ध सफेद जड़ों की बोली लगा रहे हैं। माल की मांग इतनी अधिक है कि वह हाथों-हाथ बिक रहा है।
किसानों के अनुसार, पहले जड़ें 250 से 350 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिकती थीं, लेकिन अब यह आंकड़ा 400 रुपये के पार जा चुका है। एक एकड़ में 400 से 500 किलो सूखी जड़ निकालने वाले किसानों को प्रति किलो 50 से 70 रुपये का सीधा फायदा हो रहा है, जिससे उनकी आय में 30,000 से 35,000 रुपये प्रति एकड़ की अतिरिक्त वृद्धि हुई है। जमीनी स्तर पर इस नकद प्रवाह का स्पष्ट असर दिख रहा है। इस नीतिगत फैसले ने खेती की तकनीक को भी मानकीकृत किया है। पहले पत्तियों के लालच में किसान जरूरत से ज्यादा सिंचाई कर देते थे, जिससे जड़ें अंदर से खोखली या गल जाती थीं। अब पूरा फोकस केवल जड़ पर होने के कारण, किसान सीमित और नाप-तौल कर पानी दे रहे हैं। इससे जड़ों का वजन और गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ है। इसके साथ ही, मौसम की मार जैसे पाला गिरना जिससे पत्तियां जल जाती हैं, उनका जोखिम भी कम हो गया है, क्योंकि मुख्य फसल जमीन के सुरक्षित घेरे में रहती है। कटाई के बाद किसान अब खुद जड़ों की ग्रेडिंग कर रहे हैं, जिससे उन्हें मंडी में अपनी उपज का प्रीमियम भाव मिल रहा है।
छोटे और सीमांत किसानों के लिए अश्वगंधा अब एक बेहतरीन नकदी फसल बनकर उभरी है। अमेरिका और यूरोप जैसे पश्चिमी बाजारों में भारतीय अश्वगंधा की मांग पहले से ही जोरों पर है। अब सरकारी रोक के बाद गुणवत्ता में आए इस सुधार से वैश्विक बाजार में भारतीय आयुर्वेद की विश्वसनीयता और बढ़ेगी। इस पूरे बदलाव को स्थानीय किसानों के शब्दों में सबसे बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। वो कहते हैं, “सालों से हमारी असली मेहनत को इन कौड़ियों के भाव वाली पत्तियों ने ढक रखा था। सरकार के इस फैसले से आयुर्वेद का कचरा साफ हो गया है। किसान के नजरिए से कहें तो ‘पत्ती गई, प्रगति आई’। आज किसान सीना तानकर अश्वगंधा उगा रहा है।”
नीतियों का यह सटीक क्रियान्वयन इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि यदि सिस्टम के लूपहोल्स को सही समय पर बंद किया जाए, तो उसका सीधा लाभ कॉर्पोरेट के बंगलों के बजाय देश के अन्नदाता के खलिहानों तक पहुंचता है।