बारां के ग्रामीण इलाकों में आजीविका के क्षेत्र में बदल रही तस्वीरें
जयपुर, दिव्यराष्ट्र:/ राजस्थान का बारां जिला लंबे समय से खेती और पशुपालन पर आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था वाला क्षेत्र रहा है। यहां अधिकांश परिवारों की आय खेती और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर रहती है, लेकिन मौसम की अनिश्चितता और सीमित संसाधनों के कारण यह आय हमेशा स्थिर नहीं रह पाती। ऐसे में यदि गांवों में आय के नए अवसर पैदा हों और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाएं लोगों के दरवाजे तक पहुंच जाएं, तो इसका असर सीधे लोगों के जीवन पर दिखाई देता है। कवाई क्षेत्र के कई गांव आज इसी बदलाव के गवाह बन रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों में यहां डेयरी को अतिरिक्त आजीविका के रूप में विकसित करने की दिशा में काम हुआ है। अदाणी फाउंडेशन द्वारा वर्ष 2022 में स्थापित हाडोती प्रगतिशील प्रोड्यूसर्स कंपनी लिमिटेड (एफपीओ) ने ग्रामीण महिलाओं और किसानों को एक साझा मंच दिया। इसके बाद अप्रैल 2024 में साबर-अमूल डेयरी के सहयोग से बल्क मिल्क कूलर की स्थापना हुई, जिससे गांवों का दूध सीधे संगठित बाजार तक पहुंचने लगा।
शुरुआत भले ही कुछ लीटर दूध से हुई हो, लेकिन आज यह पहल बड़े स्तर पर पहुंच चुकी है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में 17.48 लाख लीटर दूध का संग्रह हुआ और इससे लगभग 9.29 करोड़ रुपये का कारोबार दर्ज किया गया। वर्तमान वित्तीय वर्ष 2026-27 के शुरुआती तीन महीनों में ही 3.26 लाख लीटर दूध खरीदा जा चुका है। जून 2026 तक 1.02 लाख लीटर दूध का संग्रह हुआ, जबकि जून महीने में औसतन 3,410 लीटर प्रतिदिन दूध एकत्रित किया गया और 55.19 लाख रुपये का व्यवसाय किया गया ।
इन आंकड़ों के पीछे सबसे बड़ी कहानी गांव के उन परिवारों की है, जिन्होंने डेयरी को केवल घरेलू जरूरत तक सीमित रखने के बजाय आय के स्थायी स्रोत के रूप में अपनाया। आज एक हजार से अधिक परिवार इस पहल से जुड़े हैं। औसतन प्रत्येक परिवार को हर महीने करीब 9,500 रुपये की अतिरिक्त आय हो रही है। यह आय अब बच्चों की पढ़ाई, बेहतर भोजन, स्वास्थ्य सुविधाओं और घरेलू जरूरतों को पूरा करने में मदद कर रही है।
डेयरी विकास के साथ-साथ पशुओं की नस्ल सुधार पर भी विशेष ध्यान दिया गया। कृत्रिम गर्भाधान यानी आर्टिफिशियल इन्सेमिनेशन की सुविधा गांवों तक पहुंचाई गई, जिससे बेहतर नस्ल के पशु तैयार होने लगे हैं और दूध उत्पादन बढ़ा है।
डडवाडा गांव के 55 वर्षीय किसान घनश्याम इसकी मिसाल हैं। पहले उनके पास देसी नस्ल की एक गाय और दो भैंस थीं, जिनसे इतना दूध भी नहीं मिलता था कि पशुओं के चारे का खर्च निकल सके। बेहतर नस्ल के पशु खरीदना उनके लिए आर्थिक रूप से मुश्किल था। आर्टिफिशियल इन्सेमिनेशन योजना से जुड़ने के बाद उनके यहां मुर्रा नस्ल की भैंस और गिर नस्ल की गाय के बछड़े हुए। आज उनकी भैंस प्रतिदिन लगभग 7 लीटर और गाय 4 लीटर दूध देती है। परिवार की जरूरत पूरी करने के बाद वे प्रतिदिन लगभग 4 लीटर दूध बेचकर करीब 7 हजार रुपये प्रति माह की अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं। नियमित टीकाकरण, खनिज मिश्रण, कैल्शियम और हरे चारे जैसी तकनीकी सहायता ने उनके पशुपालन को और मजबूत बनाया है।
फाउंडेशन की पहल से आर्थिक बदलाव के साथ स्वास्थ्य सेवाओं में भी सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों और गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए अस्पताल तक पहुंचना हमेशा आसान नहीं होता। इसी चुनौती को देखते हुए मोबाइल हेल्थकेयर यूनिट के माध्यम से गांवों में ही प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
ग्रामीण विकास केवल योजनाएं शुरू करने से नहीं होता, बल्कि तब होता है जब उनका लाभ लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई देने लगे। बारां के इन गांवों में डेयरी, बेहतर पशुपालन और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से जो परिवर्तन सामने आया है, वह इसी दिशा में एक सकारात्मक उदाहरण है। बढ़ता दूध उत्पादन, अतिरिक्त आय, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और घर के पास उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाएं यह संकेत देती हैं कि यदि समुदाय की जरूरतों के अनुसार योजनाएं लागू की जाएं, तो उनका असर लंबे समय तक समाज में दिखाई देता है।