
वर्ल्ड अर्थराइटिस डे आज
डॉ. ज्योत्स्ना ओक (सीनियर रूमेटोलॉजिस्ट, कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल, मुंबई)
दिव्य राष्ट्र के लिए विवेक शुक्ला सीनियर हेल्थ जर्नलिस्ट
जब बात शरीर के जोड़ों (जॉइंट्स) के संदर्भ में शुरू होती है, तब घुटने, कूल्हे और कंधे का जिक्र पहले होना स्वाभाविक है, क्योंकि ये शरीर के महत्वपूर्ण जोड़ों में शुमार हैं। घुटने और कूल्हे की गठिया ( अर्थराइटिस) के मामले आमतौर पर उम्र बढ़ने या मध्य आयु (मिडिल एज) के बाद सामने आते हैं, लेकिन इन दिनों अस्वास्थ्यकर खान-पान जैसे जंक फूड्स आदि के कारण युवा वर्ग भी अर्थराइटिस की चपेट में आ रहा है। युवा वर्ग में रूमैटाइड अर्थराइटिस के मामले कहीं ज्यादा सामने आते हैं।
*जरूरी है स्वस्थ जीवन-शैली पर अमल करना**
विश्वविख्यात मेडिकल जर्नल -दि लैंसेट – के एक अध्ययन के अनुसार जोड़ों ( जॉइंट्स) की समस्या को अक्सर लोग उम्र बढ़ने का एक सामान्य लक्षण मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं। हालांकि, जोड़ों से जुड़ी कई समस्याओं के पीछे ऐसे कारण होते हैं, जिन पर हम काफी हद तक नियंत्रण रख सकते हैं। इनमें प्रमुख है-स्वस्थ जीवनशैली अपनाना, नियमित रूप से सक्रिय रहना, शरीर के वजन को नियंत्रित रखना, मांसपेशियों की शक्ति और क्षमता को बनाए रखना और चोटों से बचने के लिए सावधानी बरतना—ये सभी कदम लंबे समय तक घुटनों, कूल्हों और कंधों को स्वस्थ रखने में मदद कर सकते हैं।
इसके बावजूद जब दवाओं, फिजियोथेरेपी और अन्य व्यायामों से घुटनों और कूल्हों की गठिया से पीड़ित लोगों को राहत नहीं मिलती तो अंतिम उपचार के रूप में इनका प्रत्यारोपण (रिप्लेसमेंट) किया जा सकता है। घुटने के प्रत्यारोपण को नी रिप्लेसमेंट और कूल्हे के प्रत्यारोपण को हिप रिप्लेसमेंट कहते हैं। वही कंधे की समस्याओं के कई कारण हो सकते हैं, जिनसे बचा जा सकता है और समय रहते इनका उपचार भी संभव है।
*घुटनों की गठिया (नी अर्थराइटिस) से बचाव**
घुटनों का गठिया आमतौर पर अचानक नहीं होता। उम्र बढ़ने के साथ जोड़ में होने वाले बदलावों के कारण यह धीरे-धीरे बढ़ता है। शरीर का अधिक वजन होना, घुटने के आसपास की मांसपेशियों की कमजोरी और पूर्व में कभी लगी चोट, ये सभी कारण घुटने के जोड़ को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
नियमित रूप से शारीरिक गतिविधियां (जिसमें सैर करना और अन्य व्यायाम भी शामिल हैं) जोड़ों को सशक्त रखकर उनकी कार्यक्षमता को बनाए रखने में सहायक होती हैं। ऐसी गतिविधियों से जोड़ों के क्षीण होने की प्रक्रिया उम्र बढ़ने के बावजूद धीमी रहती है।
पैदल चलना, साइकिल चलाना, तैराकी और मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम ऐसे अच्छे विकल्प हैं, जो जोड़ों पर अनावश्यक दबाव डाले बिना शारीरिक क्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। जांघों, कूल्हों और पैरों की मांसपेशियों को मजबूत करने से रोजमर्रा की गतिविधियों के दौरान घुटनों को बेहतर सहारा मिलता है।
*वजन का घुटनों के स्वास्थ्य पर असर**
घुटनों के स्वास्थ्य के संदर्भ में शरीर के वजन की अनदेखी नहीं की जा सकती है। शरीर का प्रत्येक अतिरिक्त किलोग्राम रोजमर्रा की गतिविधियों, जैसे चलने के दौरान, घुटनों पर पड़ने वाले दबाव को बढ़ाता है।
अधिक वजन होने का संबंध घुटनों के गठिया के बढ़े हुए जोखिम से है। वजन में धीरे-धीरे कमी लाने से जोड़ों पर पड़ने वाला दबाव कम हो सकता है और रोजमर्रा की गतिविधियों में चलना-फिरना अधिक आरामदायक हो सकता है।
*कूल्हों की गठिया से बचाव**
कूल्हों का गठिया कई कारणों से प्रभावित होता है। उम्र और आनुवंशिकता जैसे कुछ कारणों को बदला नहीं जा सकता। हालांकि, कूल्हों और पैरों के आसपास की मांसपेशियों को मजबूत बनाए रखना हमारे नियंत्रण में है। एरोबिक व्यायाम और मांसपेशियों को मजबूत करने वाले अन्य व्यायाम का संयोजन, व्यक्ति की क्षमता के अनुसार धीरे-धीरे बढ़ाया जाए, तो कूल्हे की गतिशीलता और मांसपेशियों की ताकत बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
ऐसी गतिविधियों को लेकर भी सावधानी बरतनी चाहिए जिनसे गिरने का खतरा बढ़ता हो या कूल्हों पर बार-बार अत्यधिक दबाव पड़ता हो। चोट से बचाव करना कूल्हे के जोड़ की सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
*कंधों की समस्या से मिलेगी राहत**
कंधे का दर्द हमेशा गठिया के कारण नहीं होता। टेंडन से जुड़ी समस्याएं, मांसपेशियों की कमजोरी, कुछ विशेष कार्य या फिर खेलकूद आदि के दौरान पड़ने वाला अत्यधिक शारीरिक दबाव भी कंधे के दर्द या समस्या का कारण हो सकते हैं। कंधे में दर्द की समस्या होने पर डॉक्टर के परामर्श से ही पेनकिलर्स लें, क्योंकि ये इस समस्या का स्थाई इलाज नहीं होते।
अपने ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ और फिजियोथेरेपिस्ट से परामर्श लेकर पीठ की ऊपरी मांसपेशियों को सशक्त करने वाले व्यायाम करने चाहिए ताकि आपके कंधे स्वस्थ रहते हुए अपनी गतिविधियों को अच्छी तरह संचालित करने में सक्षम बने रहें।
जरूरत से ज्यादा कंधों पर दबाव न डालें : किसी भी व्यायाम (एक्सरसाइज) या फिर किसी खेल के शुरुआती दौर में कंधों पर जरूरत से ज्यादा दबाव डालना ठीक नहीं है। जैसे वजन उठाने की एक्सरसाइज या सिर के ऊपर हाथों का अधिक इस्तेमाल करने वाले खेलों (बास्केटबॉल,वॉलीबॉल, बैडमिंटन और टेनिस आदि) में व्यायाम की तीव्रता या फिर प्रशिक्षण की अवधि को बहुत तेजी से बढ़ाने से मांसपेशियों और टेंडन पर उनकी वर्तमान क्षमता से अधिक दबाव पड़ सकता है। इसलिए व्यायाम की तीव्रता धीरे-धीरे बढ़ाना और हर सत्र के बीच शरीर को पर्याप्त आराम देना कंधों की सेहत के लिए फायदेमंद है।
*क्या करें जोड़ों को स्वस्थ रखने के लिए **
अपने डाक्टर व फिटनेस एक्सपर्ट से परामर्श लेकर अपनी शारीरिक क्षमता और उम्र के अनुसार जोड़ों को सशक्त करने से संबंधित व्यायाम करने चाहिए। नियमित रूप से योग व व्यायाम करें, मांसपेशियों को सशक्त बनाए रखने वाले व्यायामों का भी अपना महत्व है और शरीर के वजन को नियंत्रित रखें। ये सभी कदम जोड़ों को स्वस्थ रखने में मदद कर सकते हैं।
ध्यान दें लगातार बने रहने वाला दर्द, सूजन, कमजोरी या जोड़ की गतिविधि में किसी तरह की दिक्कत को केवल उम्र बढ़ने का सामान्य लक्षण मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इन लक्षणों को शुरुआत में ही पहचानना और समय पर उचित चिकित्सकीय सलाह लेना महत्वपूर्ण है। इससे समस्या का समय पर पता लगाने और उचित उपचार एवं प्रबंधन में मदद मिल सकती है।
*अर्थराइटिस क्या है ?**
किसी चोट के बगैर जोड़ों में सूजन, जकड़न और दर्द बने रहने की स्थिति को अर्थराइटिस (गठिया) कहते हैं। अर्थराइटिस के 100 से अधिक प्रकार हैं, लेकिन प्रमुख रूप से इसके दो प्रकार हैं, पहला, ऑस्टियो अर्थराइटिस (ओए) और दूसरा रूमैटाइड अर्थराइटिस(आरए)। युवा वर्ग ऑस्टियो अर्थराइटिस की तुलना में रूमैटाइड अर्थराइटिस (आरए) से कहीं ज्यादा ग्रस्त है।
*ऑस्टियो अर्थराइटिस क्या है?**
उम्र बढ़ने के बाद जोड़ों के कार्टिलेज घिसने लगते हैं,जो कालांतर में ऑस्टियो अर्थराइटिस (ओए)की समस्या उत्पन्न करते हैं। हालांकि ऑस्टियो अर्थराइटिस घुटनों को ही सर्वाधिक प्रभावित करता है, लेकिन यह कूल्हों और कंधों को भी प्रभावित कर सकता है।




