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भारत की पहचान है सनातन

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(दिव्यराष्ट्र के लिए गोविंद पारीक, पूर्व अतिरिक्त निदेशक डीआईपीआर)

भारतीय शासन के मूल्यों और संरचना में सनातन सांस्कृतिक और दार्शनिक सिद्धांतों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भारतीय संविधान की नींव में ही सनातन सन्निहित है। सही मायने में सनातन भारत की पहचान है। सनातन भारतीय भौगोलिक इकाई पर पुष्पित, पल्लवित और विकसित शाश्वत और अपरिवर्तनीय परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है।

भारतीय संविधान में निहित मौलिक मूल्यों में स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, लोकतंत्र और प्रकृति और सभी जीवित प्राणियों के प्रति सम्मान शामिल हैं। इन सभी मूल्यों का हमारी सनातन संस्कृति से गहरा संबंध है। सनातन संस्कृति दुनिया की सबसे प्राचीन, समृद्ध, विविध विशाल और सबसे स्थायी सभ्यता है। संविधान की प्रस्तावना में निहित भाईचारे का मूल मूल्य सीधे तौर पर उपनिषद के ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के आदर्श से लिया गया है।

‘भारत’ नाम ही सनातन से लिया गया है। महाभारत काल में महान सम्राट भरत ने भारतीय उपमहाद्वीप को एक एकल राजनीतिक इकाई “भारतवर्ष” के नाम से एकजुट किया। भारतीय संस्कृति के विविध, बहुलवादी और सहिष्णु होने से यहाँ अनेक उप-संस्कृतियां भी पनपीं। विविध उपसंस्कृतियों की उपस्थिति के बावजूद, भारत में हमेशा सनातन के सांस्कृतिक सिद्धांतों द्वारा निर्देशित एक अंतर्निहित राजनीतिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता रही है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51-ए में वर्णित मौलिक कर्तव्यों में भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना, उत्कृष्टता के लिए प्रयास करना और प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण करना शामिल है। ये मौलिक कर्तव्य सहिष्णुता, सद्भाव और धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद भाईचारे की साझा भावना की हमारी सनातन संस्कृति के अनुरूप ही हैं। संविधान का अनुच्छेद 51-ए(जी) प्रत्येक नागरिक के कर्तव्य पर जोर देता है कि वह जंगलों, झीलों, नदियों, वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करे और जीवित प्राणियों के प्रति दया रखे।

सनातन में प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की एक मजबूत परंपरा है। सनातनी जीवन शैली न केवल मनुष्यों का सम्मान करती है बल्कि जीव जंतुओं, वनस्पति और पर्यावरण का भी सम्मान करती है। संविधान का अनुच्छेद 48 राज्य को कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक आधार पर व्यवस्थित करने, गाय की नस्लों के संरक्षण और सुधार पर जोर देने और गायों और बछड़ों के वध पर रोक लगाने का निर्देश देता है। भारतीय सनातनी समाज में गाय के प्रति अगाध श्रद्धा है।

महर्षि मनु ने सार्वभौमिक मानव मूल्यों का वर्णन किया है। इन मानव मूल्यों में धृति, क्षमा, संयम, अस्तेय, पवित्रता, साधना, विद्या, सत्य और अक्रोध आदि शामिल हैं। इन्ही से प्रेरणा लेते हुए भारतीय संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों में बंधुता और सभी भारतीयों के प्रति समान भाईचारे की भावना तथा समरसता की भावना को शामिल किया गया है।

सनातन के शाश्वत सिद्धान्त समस्त विश्व के कल्याण के लिए उपयोगी हैं। सनातन धर्म ने ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का उदार भाव व्यक्त किया। आज भी धार्मिक अनुष्ठानों का समापन ‘विश्व का कल्याण हो, प्राणियों में सद्भावना हो‘ – जैसे उद्घोष के साथ होता है। प्रकृति के साथ सनातन की गहरी आस्था नदी, सागर, पर्वत, वन, बादल, भूमि, वायु आदि में देवत्व का दर्शन कराती है।
अद्वैत दर्शन ने मनुष्य के साथ-साथ प्रत्येक जीवमात्र में परम सत्ता का अस्तित्व मानता है। श्रीमद्भगवदगीता भी समस्त जीवजगत में ईश्वर की उपस्थिति की शिक्षा देती है।

सनातन चिर पुरातन और नित नवीन है। सनातन में अपने अस्तित्व को बचाने की अद्भुत क्षमता है। सैंकड़ों वर्षों की परतंत्रता के प्रभावों के कारण छुआछूत, पर्दाप्रथा, बालविवाह, पाखण्ड, आदि अनेक विकृतियां पनपी। प्राचीन भारत में सनातन व्यवस्था में दलित समझे जाने वाले वर्ग की आर्थिक स्थिति का अनुमान इसी संदर्भ से लगाया जा सकता है कि अयोध्या नरेश सत्यवादी हरिश्चन्द्र को काशी के एक डोम ने खरीदा था।

विदेशी आक्रांताओं के आक्रमणों और कुटिल षड्यंत्रों के बावजूद उदार चिन्तन और मानवीय मूल्यों के कारण आज भी सनातन संस्कृति अपना अस्तित्व बचाये हुए हैं। सनातन के आदर्श यथार्थपरक, गतिमान और परिवर्तनशील है। उसमें समय के साथ आने वाली विकृतियों को दूर करने की अद्भुत क्षमता है। सनातन व्यवस्था की छाया में ही भारत सोने की चिड़िया कहलाता था।

सनातन परम्पराओं के अनुसार वेद सृष्टि के आरम्भ से हैं और वे सर्वपूज्य हैं।कर्मफल अटल है और अनिवार्य है एवं पुनर्जन्म सत्य है। सनातन के अनुसार ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है एवं प्रत्येक जीव में ईश्वर का अंश विद्यमान है। सनातन के अनुसार अहिंसा परम धर्म है अर्थात किसी भी प्राणी के प्रति द्रोहभाव और द्वेष दुर्भाव का सम्पूर्ण अभाव। प्रत्येक सनातनी गौरक्षा को अपना कर्तव्य समझता है।सनातन एक धर्म नहीं बल्कि मानवतावाद और मानवता को समाहित करने वाली एक जीवन शैली है।

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