ऑटिज्म के कारण बच्चा अपनी परेशानी बता नहीं सका, तीन महीने तक श्वासनली में फंसी मूंगफली ने सामान्य घटना को बना दिया जटिल और उच्च जोखिम वाला मामला-
जयपुर, दिव्यराष्ट्र:/ फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल, जयपुर के विशेषज्ञों ने एक दुर्लभ और चुनौतीपूर्ण मामले में तीन वर्षीय ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे के फेफड़े में तीन महीने से फंसी मूंगफली एवं उसका छिलका सफलतापूर्वक निकालकर उसे संभावित स्थायी फेफड़ों की क्षति से बचाया। बच्चे के ऑटिज्म से ग्रसित होने के कारण वह अपनी तकलीफ माता-पिता या डॉक्टरों को स्पष्ट रूप से बता नहीं सका, जिससे सही बीमारी का पता लगाने में काफी देरी हुई और उसके फेफड़ों व जीवन दोनों पर गंभीर खतरा मंडराने लगा।
बच्चा पिछले तीन महीनों से लगातार खांसी, रात में बेचैनी, नींद में बाधा तथा सांस लेने में तकलीफ से परेशान था। शुरुआत में परिवार के बाल रोग विशेषज्ञ ने इसे अस्थमा की संभावना मानते हुए सामान्य खांसी की दवाएं और इनहेलर दिए, लेकिन कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। इसके बाद बच्चे को फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल, जयपुर लाया गया, जहां डॉ. विनोद कुमार शर्मा, कंसल्टेंट – पल्मोनोलॉजी, क्रिटिकल केयर एवं एक्सपर्ट ब्रोंकोस्कोपिस्ट ने उसकी विस्तृत जांच की।
जांच के दौरान माता-पिता ने बताया कि लगभग तीन महीने पहले मूंगफली खाते समय बच्चे को करीब 30 सेकंड तक लगातार तेज खांसी आई थी। इस महत्वपूर्ण जानकारी के आधार पर चिकित्सकों ने आगे जांच की। सीटी स्कैन में पता चला कि बच्चे की बाईं श्वासनली (एयरवे) में लगभग 4 मिमी × 6 मिमी आकार की छिलके सहित मूंगफली फंसी हुई थी, जिसके आसपास के ऊतक (टिश्यू) में गंभीर सूजन आ चुकी थी।
बच्चे की कम उम्र, अत्यंत संकरी एवं संवेदनशील श्वासनली को देखते हुए डॉ. विनोद कुमार शर्मा के नेतृत्व में विशेषज्ञों की बहु-विषयक (मल्टीडिसिप्लिनरी) टीम ने सामान्य एनेस्थीसिया के तहत रिजिड ब्रोंकोस्कोपी करने का निर्णय लिया। यह तकनीक छोटे बच्चों में अधिक सुरक्षित मानी जाती है क्योंकि इससे पूरी प्रक्रिया के दौरान श्वासनली पर बेहतर नियंत्रण बना रहता है। यह प्रक्रिया फ्लेक्सिबल ब्रोंकोस्कोपी की तुलना में अधिक जटिल होती है। लगभग 20 मिनट की सफल प्रक्रिया में सूजे हुए टिश्यू के साथ फंसी मूंगफली को सुरक्षित रूप से बाहर निकाल लिया गया। उपचार के बाद बच्चे की सभी तकलीफें समाप्त हो गईं और उसे अगले ही दिन स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
डॉ. विनोद कुमार शर्मा, कंसल्टेंट – पल्मोनोलॉजी, क्रिटिकल केयर एवं एक्सपर्ट ब्रोंकोस्कोपिस्ट , फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल, जयपुर ने कहा, “छह महीने से तीन वर्ष तक की उम्र के बच्चों में भोजन या अन्य छोटी वस्तुओं का गलती से श्वासनली में चले जाना आम बात है। यदि समय पर इसकी पहचान नहीं हो, तो यह फेफड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है। इस बच्चे के ऑटिज्म के कारण वह अपनी परेशानी व्यक्त नहीं कर सका, जिससे बीमारी का पता लगाने में देरी हुई। यह मामला डॉक्टरों और अभिभावकों दोनों के लिए सीख है कि यदि किसी बच्चे की खांसी सामान्य उपचार से ठीक नहीं हो रही हो, तो श्वासनली में किसी बाहरी वस्तु के फंसने की संभावना को भी गंभीरता से जांचना चाहिए।”
डॉ. मनीष अग्रवाल, फैसिलिटी डायरेक्टर, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल , जयपुर ने कहा, “ऐसे मामलों में, जहां मरीज अपनी तकलीफ स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर पाता, वहां चिकित्सकों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे सामान्य संभावनाओं से आगे बढ़कर हर पहलू की जांच करें। इस चुनौतीपूर्ण मामले का सफल उपचार हमारी अनुभवी मल्टीडिसिप्लिनरी टीम, आधुनिक तकनीक और रोगी-केंद्रित उपचार प्रणाली का उत्कृष्ट उदाहरण है।”