मेवाड़ राजघराने की विरासत को समाज सेवा का माध्यम बनाया • पाँच वर्ष की उम्र में टाइप-1 डायबिटीज से जूझीं, लेकिन उसी दर्द को लाखों लोगों की उम्मीद में बदल दिया • स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा और सांस्कृतिक विरासत संरक्षण को समर्पित है जीवन
संकलनकर्ता- डॉ सीमा दाधीच

दिव्य राष्ट्र:/ जयपुर, (उमेन्द्र दाधीच)। जब उदयपुर के राजमहलों की ऊँची-ऊँची दीवारें, झीलों की चमक और शाही वैभव दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, तब उसी शहर के एक शांत कोने में एक राजकुमारी वर्षों से उन लोगों के जीवन में रोशनी भरने में जुटी है, जिनके पास इलाज, शिक्षा और जागरूकता जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं।
यह कहानी मेवाड़ राजघराने की राजकुमारी पद्मजा कुमारी परमार की है, जिन्होंने विरासत को केवल शाही पहचान नहीं, बल्कि समाज सेवा का संकल्प बना दिया।

पद्मजा कुमारी, स्वर्गीय अरविंद सिंह मेवाड़ की पुत्री और मेवाड़ के गौरवशाली सिसोदिया राजवंश की सदस्या हैं। यह वही वंश है जिसे दुनिया के सबसे पुराने निरंतर राजवंशों में गिना जाता है। लेकिन उन्होंने राजसी ठाठ-बाट की राह छोड़कर समाज की सेवा का रास्ता चुना।

पाँच साल की उम्र में बीमारी ने बदल दी पूरी ज़िंदगी
सिर्फ पाँच वर्ष की उम्र में उन्हें टाइप-1 डायबिटीज होने का पता चला। परिवार के लिए यह किसी बड़े सदमे से कम नहीं था, लेकिन उनकी माँ ने बेटी को कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वह किसी कमजोरी के साथ जी रही है।
उन्होंने सिखाया कि बीमारी जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक चुनौती है जिसे साहस और अनुशासन से हराया जा सकता है।
आज चार दशक से अधिक समय से टाइप-1 डायबिटीज के साथ जीवन जी रही पद्मजा कुमारी इसी बीमारी को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती हैं। उनका कहना है कि इसी बीमारी ने उन्हें जिम्मेदारी, अनुशासन और दूसरों के दर्द को समझने की संवेदनशीलता दी।

महल से अमेरिका तक… लेकिन जड़ें हमेशा मेवाड़ में रहीं
पद्मजा की प्रारंभिक शिक्षा उदयपुर के स्थानीय विद्यालयों और मेवाड़ पब्लिक स्कूल में हुई। राजपरिवार की बेटी होने के बावजूद उन्होंने सामान्य विद्यार्थियों के बीच पढ़ाई की, खेली और वही जीवन जिया।
16 वर्ष की आयु में वे अमेरिका चली गईं। वहाँ नॉर्थफील्ड माउंट हर्मन स्कूल में अध्ययन किया और बाद में ट्यूलाने यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल रिलेशन्स एवं बिजनेस स्टडीज में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।
विदेश में शिक्षा और वैश्विक अनुभव ने उन्हें दुनिया देखने का अवसर दिया। वे तीसरी पीढ़ी की हेरिटेज होटलियर बनीं, अंतरराष्ट्रीय हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में कार्य किया और लंदन के प्रतिष्ठित बुल्गारी होटल के एडवाइजरी बोर्ड से भी जुड़ी रहीं।
लेकिन सफलता और शाही विरासत के बावजूद उनके मन में एक सवाल हमेशा बना रहा—क्या जीवन का उद्देश्य केवल विरासत संभालना है, या समाज के लिए कुछ ऐसा करना जो लोगों की ज़िंदगी बदल दे?

2011 की शाही शादी, लेकिन जीवन का लक्ष्य रहा समाज सेवा
मार्च 2011 में पद्मजा कुमारी का विवाह गुजरात के संतरामपुर-बाबरोल राजपरिवार के डॉ. कुश सिंह परमार से हुआ।
मेहंदी और संगीत का आयोजन उदयपुर के जगमंदिर महल में हुआ, विवाह के फेरे जनाना महल में सम्पन्न हुए और 8 मार्च को शिकारबाड़ी में भव्य स्वागत समारोह आयोजित किया गया।
हालाँकि यह विवाह शाही परंपराओं के अनुरूप था, लेकिन निमंत्रण-पत्रों पर एक विशेष संदेश लिखा गया था—
“कृपया कोई उपहार न लाएँ।”
आज दोनों बोस्टन में अपने परिवार के साथ रहते हैं और भारतीय परंपराओं के साथ वैश्विक सामाजिक सरोकारों को आगे बढ़ा रहे हैं।

दर्द से जन्मा एक मिशन—’फ्रेंड्स ऑफ मेवाड़’
वर्ष 2013 में पद्मजा कुमारी परमार ने “फ्रेंड्स ऑफ मेवाड़” नामक गैर-सरकारी संगठन की स्थापना की।
यह संगठन राजस्थान, विशेषकर उदयपुर और आसपास के क्षेत्रों में स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा तथा सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के क्षेत्र में लगातार कार्य कर रहा है।
संगठन का मुख्य उद्देश्य है—
टाइप-1 डायबिटीज के प्रति जागरूकता फैलाना।
मरीजों और उनके परिवारों को सहयोग उपलब्ध कराना।
अंधत्व रोकने के लिए स्वास्थ्य अभियान चलाना।
महिलाओं और बालिकाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता, नेतृत्व क्षमता एवं आजीविका से जोड़ना।
पारंपरिक कारीगर परिवारों को सहयोग देकर उनकी कला और संस्कृति को जीवित रखना।
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जब निजी संघर्ष बन गया लाखों लोगों की उम्मीद
पद्मजा स्वयं स्वीकार करती हैं कि यदि उनका समय पर निदान नहीं होता और उनकी माँ का सहयोग उन्हें नहीं मिलता, तो शायद उनकी जिंदगी इतनी सहज नहीं होती।
इसी अनुभव ने उन्हें महसूस कराया कि देश के अनेक परिवार आज भी टाइप-1 डायबिटीज जैसी बीमारी के बारे में जानकारी के अभाव में अपने बच्चों को खो देते हैं।
यही पीड़ा उनके सामाजिक मिशन की सबसे बड़ी प्रेरणा बनी।
उनका संगठन यूनिसेफ, क्लिंटन फाउंडेशन तथा अन्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ मिलकर तपेदिक (टीबी) सहित अनेक स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों का संचालन भी कर चुका है।
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राजसी पहचान नहीं, समाज की बेटी बनने का निर्णय
कॉर्पोरेट दुनिया में सफल करियर बनाने के अवसर होने के बावजूद पद्मजा ने वह रास्ता चुना जहाँ नाम से अधिक काम की आवश्यकता थी।
उन्होंने उदयपुर की झीलों और महलों की चमक के पीछे छिपी गरीबी, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और महिलाओं की चुनौतियों को अपनी प्राथमिकता बनाया।
आज वे हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, प्रिंसटन तथा ब्रेकथ्रू टी1डी जैसी संस्थाओं से जुड़ी हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान उन गाँवों और बस्तियों में है, जहाँ उनका संगठन वर्षों से लोगों के जीवन में बदलाव ला रहा है।
सच्ची शाही पहचान क्या होती है…
आज जब शाही विरासत को अक्सर केवल महलों, पर्यटन और प्रदर्शन तक सीमित समझ लिया जाता है, तब राजकुमारी पद्मजा कुमारी परमार यह साबित करती हैं कि किसी भी राजघराने की सबसे बड़ी पहचान उसके महलों की ऊँचाई नहीं, बल्कि उसके लोगों के प्रति उसकी जिम्मेदारी होती है।
मेवाड़ की यह बेटी महलों की सीमाओं से बाहर निकलकर समाज के सबसे कमजोर वर्गों के साथ खड़ी है।
उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि—
सच्चा राजसी वैभव ताज, सिंहासन और महलों में नहीं, बल्कि उन मुस्कानों में होता है जिन्हें किसी के प्रयास से नया जीवन मिल जाए।