दिव्यराष्ट्र, जयपुर: राजस्थान में तेजी से विकास और औद्योगिकीकरण के कारण बिजली (ऊर्जा) की खपत तेजी से बढ़ रही है। 2036 तक 32.16 गीगावाट (32,168 मेगावाट) बिजली की मांग होगी। जो वर्ष 2024-25 के 19,165 मेगावाट के मुकाबले करीब 67 फीसदी अधिक होगा। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण द्वारा तैयार रिसोर्स एडवोकेसी प्लान 2035-36 की रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगले दस वर्षों में राज्य की कुल बिजली आवश्यकता और पीक लोड क्रमशः 5.3% और 4.5% की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ने की उम्मीद है।
बिजली खपत की आवश्यकता को देखते हुए उत्पादन पर विशेष जोर दिया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बिजली उत्पादन से अधिक इसके ट्रांसमिशन पर काम करने की आवश्यकता है। यही कारण है कि अदानी और रेसोनिया जैसी बड़ी ट्रांसमिशन कंपनियां अपने नेटवर्क का विस्तार कर रही है। इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड कर रही है।
एक वरिष्ठ ट्रांसमिशन विशेषज्ञ ने कहा कि राजस्थान की नवीकरणीय क्षमता तेज़ी से बढ़ रही है, लेकिन ग्रिड विस्तार उसी गति से नहीं हो पा रहा। असली चुनौती अब बिजली निकासी (‘इवैकुएशन’) है। बड़े कॉरिडोर और आधुनिक सबस्टेशन नहीं होंगे तो उत्पादन केंद्रों में ही बिजली फंसकर रह जाएगी।
पश्चिमी राजस्थान—जो देश के सबसे बड़े सौर और पवन संसाधनों वाला क्षेत्र है—राज्य की भविष्य की नवीकरणीय ऊर्जा का बड़ा हिस्सा देगा। लेकिन इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि ट्रांसमिशन कॉरिडोर की सीमित क्षमता, राइट-ऑफ-वे मंजूरियों में देरी, और सबस्टेशनों के धीमे आधुनिकीकरण से राज्य की स्वच्छ ऊर्जा को खपत वाले इलाकों और उद्योगों तक पहुंचाने में बाधा आ सकती है। यह चुनौती अस्थायी नहीं, बल्कि संरचनात्मक मानी जा रही है।
एनर्जी सेक्टर के एक्सपर्ट सद्दाफ आलम का कहना है कि बढ़ती मांग को देखते हुए ट्रांसमिशन प्रणाली में अब छोटे-छोटे सुधारों से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर बदलाव की जरूरत है। इसमें 400 kV और 765 kV कॉरिडोर का तेजी से निर्माण, राज्य के भीतर मजबूत लिंक विकसित करना, और डिजिटल सबस्टेशन, डायनेमिक लाइन रेटिंग तथा उन्नत ग्रिड मॉनिटरिंग जैसी आधुनिक तकनीकें शामिल हैं।
उन्होंने बताया कि आने वाला दशक ट्रांसमिशन डेवलपर्स—चाहे वे सरकारी हों या निजी—दोनों के लिए बड़ा अवसर लेकर आया है। मांग के स्पष्ट रोडमैप के साथ हाई-वोल्टेज कॉरिडोर, इंटर-स्टेट लिंक और नवीकरणीय ऊर्जा इवैकुएशन लाइनों की जरूरत तेज़ी से बढ़ेगी। चूंकि ट्रांसमिशन परियोजनाओं को मंजूरी से लेकर निर्माण तक कई साल लगते हैं, इसलिए आज की देरी भविष्य में बिजली कमी का कारण बन सकती है।
राजस्थान को नवीकरणीय ऊर्जा का अग्रणी राज्य बनाने की राह अब उसके ट्रांसमिशन नेटवर्क की मजबूती पर निर्भर करेगी। सरकारी और निजी डेवलपर्स के बीच समन्वय, स्पष्ट नीतियां और तेज़ क्रियान्वयन ही तय करेंगे कि राज्य अपनी ऊर्जा क्षमता को कितनी कुशलता से इस्तेमाल कर पाता है।





