दिव्य राष्ट्र के लिए सुभाष राज, स्वतंत्र पत्रकार
जब दुनिया के विकसित देश—अमेरिका से लेकर यूरोपीय संघ तक—मेटा, गूगल और एप्पल जैसी टेक कंपनियों पर खरबों डॉलर के जुर्माने ठोक रहे हैं और उनके एल्गोरिदम की काट खोज रहे हैं, तब दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजार भारत में इन कंपनियों पर लगाम कसना आज भी मुश्किल क्यों है?
हाल ही एक अमेरिकी अदालत के फैसले ने सिलिकॉन वैली की बुनियाद को फिर हिलाकर रख दिया है। अमेरिका के न्यू मेक्सिको की अदालत ने मेटा पर 25 अरब डॉलर का ऐतिहासिक जुर्माना ठोका है। क्योंकि उस पर यूजर डेटा की चोरी, गोपनीयता का खुला उल्लंघन और कैम्ब्रिज एनालिटिका जैसे मामलों में जनता को लगातार गुमराह करने के आरोप थे। यूरोप और अमेरिका में यह कोई पहला वाकया नहीं है। इससे पहले यूरोपीय संघ भी डेटा ट्रांसफर नियमों की धज्जियां उड़ाने पर मेटा पर 1.3 अरब डॉलर का भारी-भरकम जुर्माना लगा चुका है। पश्चिमी देशों में बात केवल जुर्माने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वहां की अदालतें और एजेंसियां इन टेक दिग्गजों के एल्गोरिदम की कार्यप्रणाली को भी कटघरे में खड़ा करती हैं ताकि किसी भी कंपनी का मुनाफा नागरिकों की मानसिक सेहत और निजता से बड़ा न हो सके।
इसके विपरीत दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट उपभोक्ता बाजार यानी भारत की तस्वीर देखें, तो स्थिति पूरी तरह उलट नजर आती है। भारत में शायद ही कभी किसी ने टेक कंपनियों पर अरबों-खरबों के जुर्माने की कोई खबर पढ़ी हो। ये कंपनियां बिना किसी गंभीर वैधानिक खौफ के भारत में दिन दोगुनी रात चौगुनी रफ्तार से फल-फूल रही हैं। परिणामस्वरूप, देश के बड़े अस्पतालों की मनोचिकित्सा ओपीडी में डिजिटल एडिक्शन के शिकार बच्चों, युवाओं और किशोरों की कतारें लंबी हो रही हैं। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक के रील्स-शॉर्ट्स एल्गोरिदम इंसान के दिमाग में डोपामाइन का ऐसा चक्रव्यूह बनाते हैं जिसके चलते यूजर रासायनिक नशे की तरह इसका आदी हो जाता है। इससे भारत का युवा अवसाद, एंग्जायटी, एकाग्रता की कमी और गंभीर अनिद्रा का शिकार हो रहा है, लेकिन इसके बावजूद मुख्यधारा की बहसों में ये राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट के रूप में नहीं देखा जाता।
भारत में अक्सर ये पूछा जाता है कि क्या देश के मौजूदा कानूनी ढांचे के भीतर टेक कंपनियों पर नकेल कसी जा सकती है। ‘हां’ कसी जा सकती है। क्योंकि भारतीय संविधान और मौजूदा कानूनी ढांचे में ऐसे कई मजबूत प्रावधान हैं जिनके जरिए न्यायपालिका और नियामक संस्थाएं टेक दिग्गजों को पूरी तरह जवाबदेह बना सकती हैं।
अगर कानूनों की बात करें तो भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के पास असीम शक्तियां हैं और प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के तहत उसके पास बाजार में एकाधिकार और अनुचित व्यावसायिक प्रथाओं को रोकने का मजबूत हथियार है। हाल ही प्रतिस्पर्धा आयोग ने व्हाट्सएप प्राइवेसी पॉलिसी मामले में मेटा पर 213 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाकर इस हथियार की ताकत भी दिखाई, लेकिन यह राशि मेटा की एक दिन की कमाई के बराबर भी नहीं है। अगर कानूनी भाषा में कहें तो न्यायपालिका और प्रतिस्पर्धा आयोग इस अधिनियम का दायरा व्यापक करके टेक कंपनियों की मुश्कें कस सकती हैं और यूरोप तथा अमेरिका की तर्ज पर ही लाखों-करोड़ों के जुर्माने लगा सकती हैं, क्योंकि भारत में मौजूदा कानूनों के तहत कंपनियों के टर्नओवर के आधार पर भारी-भरकम जुर्माना लगाने का भी स्पष्ट प्रावधान है। अमेरिका और यूरोप की तरह अरबों रुपये का दंड ही इन टेक कंपनियों को भारतीय नियमों का पालन करने के लिए मजबूर कर सकता है।
इसके अलावा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत भ्रामक डिजाइन और मानसिक शोषण के खिलाफ केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण टेक कंपनियों को डार्क पैटर्न्स बदलने पर मजबूर कर सकता है और मौजूदा उपभोक्ता कानूनों के तहत देश के नागरिक या उपभोक्ता संगठन मिलकर टेक कंपनियों के खिलाफ सामूहिक मुकदमे दायर कर सकते हैं, जिससे अदालतें स्वतः संज्ञान लेकर बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने के एवज में इन कंपनियों से भारी मुआवजा वसूल सकती हैं। यही नहीं, भारत के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट में भी स्पष्ट प्रावधान हैं कि यदि कंपनियां भारतीय नागरिकों के डेटा की सुरक्षा में कोताही बरतती हैं तो उन पर भारी वित्तीय दंड लगाया जा सकता है। न्यायपालिका भी स्वतः संज्ञान लेकर कार्यपालिका को यह निर्देश दे सकती है कि टेक कंपनियां अपने एल्गोरिदम की कार्यप्रणाली को स्वतंत्र ऑडिट के लिए पेश करें और बच्चों के खातों के लिए सेफ-बाय-डिफ़ॉल्ट के नियम अनिवार्य किए जाएं।
भारतीय न्यायपालिका का इतिहास गवाह है कि जब-जब कार्यपालिका या नीति निर्माता किसी बड़े जनहित के मुद्दे पर सुस्त रहे हैं, तब-तब सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर मील का पत्थर साबित होने वाले फैसले दिए हैं और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत मानसिक स्वास्थ्य और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार शामिल है। टेक कंपनियों के आपराधिक कार्यव्यवहार, जो आज बच्चों और किशोरों के लिए एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुके हैं, उन्हें इसी दायरे में रखकर सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार और इन कंपनियों को कड़े आदेश दे सकता है ताकि युवा पीढ़ी के स्क्रीन टाइम और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा की जा सके। असल में भारत में कानूनों की कमी नहीं है बल्कि सबसे बड़ी चुनौती उन कानूनों के क्रियान्वयन और राजनीतिक इच्छाशक्ति की है, और यदि न्यायपालिका और नियामक संस्थाएं ठान लें तो मौजूदा कानूनों के तहत ही वैश्विक टेक कंपनियों को भारतीय नागरिकों की मानसिक सेहत, गोपनीयता और आर्थिक संप्रभुता से खिलवाड़ करने से रोका जा सकता है, अन्यथा भारत के भविष्य को डिजिटल गुलामी का स्थायी बंधक बनने से रोकना बेहद मुश्किल होगा।