
‘ग्लोबल वॉइसेज़, वन विज़न’ विषय पर आधारित मरीज़ सुरक्षा पर केन्द्रित हा
मुंबई, दिव्यराष्ट्र/: इंटरनेशनल हेल्थ डायलॉग (आईएचडी) 2026 की शुरूआत हैदराबाद हुई, जिसमें देश-विदेश से चिकित्सकों, मरीज़ सुरक्षा लीडरों, प्रत्यायन विशेषज्ञों एवं स्वास्थ्य प्रणाली से जुड़े नीति निर्माताओं ने हिस्सा लिया। ‘ग्लोबल वॉइसेज़, वन विज़न’ विषय पर आधारित पहला दिन मरीज़ सुरक्षा पर केन्द्रित रहा। चर्चा के दौरान एक दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से दिखाई दियाः बड़े पैमाने पर मरीज़ों की देखभाल में भारत का अनुभव तथा इस क्षेत्र में जवाबदेहिता को मजबूत बनाना। साथ ही इस विषय पर भी विचार रखे गए कि दुनिया आज मरीज़ों की सुरक्षा और भरोसे के बारे में किस तरह से सोचती है।
सम्मेलन की शुरूआत डॉ संगीता रेड्डी, जॉइन्ट मैनेजिंग डायरेक्टर, अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप ने की, उन्होंने आईएचडी को ज्ञान के आदान-प्रदान का ऐसा प्लेटफॉर्म बताया जो किसी व्यक्तिगत सिस्टम तक सीमित नहीं रहना चाहिए। ‘हमारे अस्पतालों और हमारे सिस्टम में ढेरों इनोवेशन्स हो रहे हैं। हम हर दिन कुछ नया सीखते हैं। फिर यह ज्ञान सिर्फ हमारे सिस्टम तक ही सीमित क्यों रहे? क्यों न हम इसे खुल कर सभी के साथ बांटें?’ उन्होंने कहा। ‘हम हमेशा से जो कुछ भी सीखते हैं, उसे दूसरे के साथ साझा करना चाहते हैं।’ इस प्लेटफॉर्म की प्रासंगिकता के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि आईएचडी 2026 के लिए 5000 से अधिक रजिस्ट्रेशन, 300 से अधिक पेपर सबमिशन तथा दुनिया भर के 75 से अधिक संस्थानों से 120 से अधिक अवॉर्ड एंट्रीज़ मिली हैं। डॉ संगीता रेड्डी नेकहा,‘‘हेल्थकेयर की मांग लगातार बढ़ रही है। हम लिनियर समाधानों से इतने बड़े पैमानों पर समस्याओं को हल नहीं कर सकते। इसके लिए अनुशासन और जवाबदेहिता के साथ निवारक रणनीतियों परिणामों के स्पष्ट मापन और डिजिटल टूल्स पर काम करना होगा।‘’
दिन भर के दौरान प्रवक्ताओं ने एक व्यवहारिक पहलु पर विचार रखेः मरीज़ की सुरक्षा के परिणाम बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करते हैं कि सिस्टम कितनी अच्छी तरह आपसी तालमेल में काम करता है। इस सिस्टम में विनियामक, सेवा प्रदाता, टेक्नोलॉजी पार्टनर्स सभी शामिल होते हैं। शुरूआती संबोधन में डॉ मधु ससिधर, प्रेज़ीडेन्ट एवं सीईओ, हॉस्पिटल्स डिविज़न, अपोलो हॉस्पिटल्स एंटरप्राइज़ लिमिटेड ने साझा स्वामित्व एवं संगठनात्मक जवाबदेहिता पर ज़ोर दिया। ‘मरीज़ की सुरक्षा सिर्फ एक हितधारक पर निर्भर नहीं करती। इसके लिए विनियामकों, सरकारों, प्रत्यायन एजेंसियों, प्रदाताओं एवं टेक्नोलॉजी फर्मों को एकजुट होकर काम करना पड़ता है। मरीज़ की सुरक्षा किसी एक विभाग की ज़िम्मेदारी नहीं। यह वास्तव में संगठन में लीडरशिप की ज़िम्मेदारी है।’’
डॉ कार्सटन इंगल, सीईओ, इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर क्वालिटी इन हेल्थकेयर ने कहा,‘‘दशकों से मरीज़ की सुरक्षा एजेंडा का केन्द्रबिन्दु रही है, लेकिन इसके बावजूद हमें बहुत बहुत लम्बी दूरी तय करनी है। हम सुरक्षा के नाम पर सुरक्षा, प्रक्रियाओं और गतिविधियों को जोखिम में डालते हैं, जिससे सुरक्षा में सुधार नहीं हो पाता।’ इस संदर्भ में उन्होंने लीडर्स से आग्रह करते हुए कहा, ‘ये मत पूछें कि लोगों ने क्या किया, उन्हें क्या करना चाहिए। इसके बजाए पूछें कि उन्होंने क्या सोच कर ऐसा किया।’
डॉ अतुल मोहन कोचर, सीईओ, नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स ने निष्पादन-कहा,‘‘मरीज़ की सुरक्षा सिर्फ एक तकनीकी मुद्दा नहीं। यह एक नैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक अनिवार्यता है। अकेले नीतियां- सुरक्षा में सुधार नहीं ला सकतीं। निष्पादन की दक्षता को सुनिश्चित करना ज़रूरी है। हमें मरीज़ की सुरक्षा के लिए महत्वाकांक्षी रूख अपनाना होगा। शून्य नुकसान को सुनिश्चित कर के ही हम मरीज़ की सुरक्षा को जोखिम क दायरे से बाहर रख सकते हैं।’
सुरक्षा के परिणामों, कार्यान्वयन एवं जवाबदेहिता पर ज़ोर देते हुए अपोलो हॉस्पिटल्स ने पहले दिन रोचे डायग्नॉस्टिक्स इंडिया के साथ एक एमओयू भी साईन किया, जिसके तहत चिकित्सकीय निर्णय निर्धारण में अडवान्स्ड एआई के इंटीग्रेशन का मूल्यांकन किया जाएगा। यह साझेदारी एआई-इनेबल्ड रूझानों को व्यवहारिक एवं चिकित्सा अनुकूल सपोर्ट में बदलने के लिए काम करेगी, जहां जोखिम की जल्द पहचान तथा बड़े पैमाने पर ज़्यादा सुरक्षित एवं मानक देखभाल पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा।






