मुंबई दिव्यराष्ट्र,/:अब डायबिटीज की पहचान बिना खून की जांच के भी संभव हो सकती है। येनपोया (डीम्ड टू बी) विश्वविद्यालय, मंगलुरु, मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन, चेन्नई और एमोरी यूनिवर्सिटी, अटलांटा (अमेरिका) के शोधकर्ताओं की एक संयुक्त टीम ने आंखों की रेटिना (नेत्र-पटल) की हाई-रिज़ॉल्यूशन तस्वीर के जरिये डायबिटीज की पहचान की नई तकनीक विकसित की है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, रेटिना शरीर का एकमात्र ऐसा हिस्सा है जहां बिना किसी सर्जरी या इनवेसिव प्रक्रिया के जीवित रक्त वाहिकाओं को सीधे देखा जा सकता है। वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से रेटिना में मौजूद रक्त वाहिकाओं की बनावट का विश्लेषण किया और पाया कि डायबिटीज से ग्रस्त लोगों की आंखों की नसों में सूक्ष्म लेकिन स्पष्ट बदलाव दिखाई देते हैं।
यह अध्ययन 23 जनवरी 2026 को अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘डायबिटीज टेक्नोलॉजी एंड थैरेप्यूटिक्स’ में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में बताया गया है कि एआई तकनीक आंखों की रक्त वाहिकाओं में मौजूद उन सूक्ष्म संकेतों को पहचान सकती है, जिन्हें सामान्य मानव आंख नहीं देख पाती। इसके माध्यम से बिना फिंगर-प्रिक ब्लड टेस्ट के मधुमेह से ग्रस्त और गैर-मधुमेह व्यक्तियों में अंतर किया जा सकता है।
अध्ययन की प्रमुख लेखिका, येनपोया (डीम्ड टू बी) विश्वविद्यालय की नेत्र रोग विशेषज्ञ और एमोरी यूनिवर्सिटी की ग्लोबल हेल्थ की सहायक प्रोफेसर डॉ. सौजन्या कौप ने कहा,
“आंख शरीर के भीतर झांकने की एक खिड़की की तरह है। एआई की मदद से इस खिड़की में छिपे छोटे संकेतों को पढ़कर हम केवल एक रेटिनल फोटो से यह बता सकते हैं कि किसी व्यक्ति को डायबिटीज है या नहीं।”
एमोरी यूनिवर्सिटी की सह-प्रमुख लेखिका डॉ. सुदेशना सिल कर ने बताया कि एआई को डायबिटीज से पीड़ित और गैर-पीड़ित लोगों की रेटिनल तस्वीरों के जरिये प्रशिक्षित किया गया। उन्होंने कहा,
“यह एक डिजिटल जासूस की तरह काम करता है, जो केवल एक तस्वीरन के आधार पर लगभग 95 प्रतिशत सटीकता से डायबिटीज की पहचान कर सकता है।”
अध्ययन की वरिष्ठ लेखिका और मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन तथा डॉ. मोहन’स डायबिटीज स्पेशलिटीज सेंटर में मेडिकल रेटिना एवं ऑक्यूलर रिसर्च की प्रमुख डॉ. आर. राजलक्ष्मी ने कहा कि इस शोध में नियमित नेत्र जांच के दौरान ली गई रेटिनल तस्वीरों का ही उपयोग किया गया।
उन्होंने बताया, “हमने पाया कि आंखों की रक्त वाहिकाओं में सूक्ष्म बदलाव डायबिटीज विकसित होने से पहले ही शुरू हो जाते हैं।”
एमोरी एम्पैथेटिक एआई फॉर हेल्थ इंस्टीट्यूट के निदेशक और सह-लेखक डॉ. अनंत मदभूशी ने कहा कि यह तकनीक सभी के लिए सुलभ है।
उन्होंने कहा, “इसमें महंगे लैब टेस्ट की जरूरत नहीं है। न खून निकालना, न उपवास—सिर्फ आंख के पीछे की एक तस्वीर और एआई का उपयोग।”
डॉ. मोहन’स डायबिटीज स्पेशलिटीज सेंटर के चेयरमैन और देश के वरिष्ठ मधुमेह विशेषज्ञ डॉ. वी. मोहन ने कहा कि भारत में 10 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं और बड़ी संख्या में लोगों को इसका पता ही नहीं चल पाता।
उन्होंने कहा, “यदि एआई आधारित रेटिनल इमेजिंग से डायबिटीज की शुरुआती पहचान संभव होती है, तो भविष्य में इसे रियल-टाइम स्क्रीनिंग टूल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए बड़े स्तर पर और अध्ययन आवश्यक हैं।”
एमोरी ग्लोबल डायबिटीज रिसर्च सेंटर के कार्यकारी निदेशक डॉ. के.एम. वेंकट नारायण ने कहा कि यह अध्ययन एआई और आंखों को पूरे शरीर से जुड़ी बीमारियों की शुरुआती पहचान के एक प्रभावी माध्यम के रूप में स्थापित करता है।
अध्ययन से जुड़े प्रमुख तथ्य:
* उच्च सटीकता: एआई प्रणाली ने रेटिनल तस्वीरों के आधार पर 95 प्रतिशत संवेदनशीलता के साथ डायबिटीज की पहचान की।
* प्रारंभिक चेतावनी: यह तकनीक प्री-डायबिटीज की पहचान भी कर सकती है, जहां जीवनशैली में बदलाव से बीमारी को रोका जा सकता है।






