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नमो को रोकने के लिए सात समंदर पार से हो रहा था खेला

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विदेशी और देशी चुनावी साजिश

नई दिल्ली डिसइन्फो लैब ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि विदेशी ताकतें भारत के चुनाव को प्रभावित करने में जुटी थीं. अरबों रुपये फूंक डाले

(दिव्यराष्ट्र के लिए प्रभात उपाध्याय की खास रिपोर्ट)

हाल ही में संपन्न भारत के लोकसभा चुनाव को विदेशी ताकतों ने प्रभावित करने की कोशिश की. दुनिया भर में इनफॉर्मेशन वॉरफेयर और साइकोलॉजिकल ऑपरेशन को ट्रैक करने वाली संस्था डिसइन्फो लैब ने यह दावा किया है. रिपोर्ट के मुताबिक जब भारत चुनाव की तैयारी कर रहा था और मतदाता नई सरकार चुनने का मन बना रहे थे, तब विदेशी ताकतें चुनाव को इनफ्लुएंस करने की प्लानिंग कर रही थीं.

किसने की चुनाव प्रभावित करने की कोशिश?

डिसइन्फो लैब ने ”द इनविजिबल हैंड्स: फॉरेन इंटरफेरेंस इन इंडियन इलेक्शंस 2024” नाम से 85 पन्नों की रिपोर्ट जारी की है. इसमें विस्तार से बताया है कि किस तरीके से अमेरिका और यूरोपियन यूनियन की कुछ संस्थाएं और ताकतवर लोगों ने भारत के लोकसभा चुनाव में अरबों रुपये फूंके. ताकि रिजल्ट उनके मुताबिक आ सकें.डिसइन्फो लैब की रिपोर्ट के मुताबिक लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आया, भारतीय संस्थानों की आलोचना, नरेंद्र मोदी की अगुआई में मानवाधिकारों के हनन जैसे विषयों पर केंद्रित आर्टिकल की संख्या बढ़ने लगी. आखिरी 6 महीने में तो ऐसे आर्टिकल्स की बाढ़ आ गई. रिपोर्ट में मुख्य तौर पर 3 फैक्टर की चर्चा है, जिनके जरिये लोकसभा चुनाव के बीच खास नैरेटिव तैयार करने की कोशिश की गई. इनको किस तरीके से भारी भरकम फंडिंग मिली. इनमें अमेरिका स्थित हेनरी लूस फाउंडेशन अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस की संस्था ‘ओपन सोसायटी फाउंडेशन’ और फ्रेंच विचारक और पॉलीटिकल साइंटिस्ट क्रिस्टोफ जाफ्रेलॉट शामिल हैं.

फ्रेंच मीडिया की क्यों इतनी दिलचस्पी?

डिसइन्फो लैब की रिपोर्ट के मुताबिक फ्रेंच मीडिया ने भारत के लोकसभा चुनाव में खास दिलचस्पी दिखाई. फ्रांस के प्रमुख अखबारों मे से एक ‘ली मोंडे’ ने लोकसभा चुनाव पर दर्जनों आर्टिकल प्रकाशित किए. जो भारत में इस्लामोफोबिया, अलोकतांत्रिक रवैया, मानवाधिकारों के हनन और जातिगत भेदभाव के इर्द-गिर्द केंद्रित थे. एक तरीके से इन आर्टिकल्स के जरिए भारत विरोधी नैरेटिव सेट करने का प्रयास किया जा रहा था और मतदाताओं के प्रभावित करने की कोशिश की जा रही थी.

क्रिस्टोफ जाफ्रेलॉट की भूमिका….

चौंकाने वाली बात यह थी कि फ्रेंच मीडिया में प्रकाशित ज्यादातर रिपोर्ट्स और आर्टिकल्स या तो फ्रेंच पॉलिटिकल साइंटिस्ट क्रिस्टोफ जाफ्रेलॉट द्वारा लिखी गई थीं या उनके बयान पर आधारित थीं. पश्चिमी मीडिया और इंडियन मीडिया के एक सेक्शन ने भी बहुत एग्रेसिव तरीके से क्रिस्टोफ जाफ्रेलॉट के आर्टिकल्स छापे और उनके बयान को आधार बनाते हुए खबरें प्रकाशित कीं. फ्रेंच मीडिया में क्रिस्टोफ जाफ्रेलॉट द्वारा भारत में जाति जनगणना पर किये काम के इर्द-गिर्द कई खबरें छपीं. दिलचस्प यह है कि जाति जनगणना पर क्रिस्टोफ की जिस स्टडी को लोकसभा चुनाव के बीच बार-बार कोट किया गया और भारत में जातिगत भेदभाव बड़ी समस्या बताई गई, उसे अमेरिका के हेनरी लूस फाउंडेशन ने फंडिंग दी थी. क्रिस्टोफ ने एक और नैरेटिव बिल्ड करने की कोशिश की कि किस तरीके से भारत में ऊंची जातियों का प्रभाव बढ़ रहा है.

इस रिपोर्ट में अशोका यूनिवर्सिटी के त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डाटा की भूमिका पर भी बात की गई है, जिसे यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिशीगन से 15 करोड़ की फंडिंग मिली थी. इस सेंटर के को-फाउंडर्स में से एक गिलीस वर्नियर्स भी थे, जो बेल्जियम के रहने वाले हैं और क्रिस्टोफ उनके मेंटॉर रहे हैं.

हेनरी लूस फाउंडेशन का रोल….

हेनरी लूस फाउंडेशन के रोल पर विस्तार से बात की गई है. इस संस्था ने क्रिस्टोफर जाफ्रेलॉट और एंटी इंडिया नैरेटिव को बढ़ावा देने वाले एकेडमिक्स को फंडिंग दी. इस फाउंडेशन की स्थापना हेनरी लूस ने की है, जो टाइम मैगजीन के फाउंडर्स में से एक हैं. एचएलएफ ने इंडियन पॉलिटिक्स और सोसायटी के इर्द-गिर्द केंद्रित कई प्रोजेक्ट्स की फंडिंग की. इनमें से एक प्रोजेक्ट का नाम था ‘मुस्लिम्स इन ए टाइम ऑफ हिंदू मेजोरिटेरियनिज्म’ ( हिंदू बहुसंख्यकवाद के दौर में मुसलमानों की हालत ).

लोकसभा चुनाव में HLF की फंडिंग देखें—

इस प्रोजेक्ट की अगुआई क्रिस्टोफ जाफ्रेलॉट ही कर रहे थे. उन्हें साल 2021 से 2024 के बीच 38,500,0 डॉलर की फंडिंग मिली. एचएलएफ ने कई और प्रोजेक्ट की फंडिंग की. जैसे ‘द हिंदू राइट एंड इंडियाज रिलिजियस डिप्लोमेसी’. इसके अलावा फाउंडेशन ने ह्यूमन राइट्स वॉच को एक खास प्रोजेक्ट के लिए 3 लाख डॉलर की भारी-भरकम फंडिंग दी. यह प्रोजेक्ट एशिया खासकर भारत में धार्मिक हिंसा पर केंद्रित था.

जॉर्ज सोरोस ने अरबों फूंके……..

रिपोर्ट में अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस की संस्था (ओपन सोसायटी फाउंडेशन) की भूमिका पर भी विस्तार से बात की गई है. किस तरीके से सोरोस की संस्था OSF ने एंटी इंडिया और एंटी मोदी नैरेटिव बिल्ड करने के लिए फंडिंग की. सोरोस की संस्था ने क्रिस्टोफ जाफ्रेलॉट और कनाडाई-इंडियन एक्टिविस्ट रिकेन पटेल को फंडिंग दी. साल 2016 से 2022 के बीच पटेल की संस्था नमाती फाउंडेशन को osf ने भारी भरकम रकम दी. 2023 में पटेल ‘फ्रेंड्स ऑफ डेमोक्रेसी’ ग्रुप के को-चेयर बनाए गए. इस ग्रुप के प्रमुख एजेंडे में भारत को बचाने के लिए रूलिंग पार्टी से लड़ाई भी शामिल था. ‘फ्रेंड्स ऑफ डेमोक्रेसी’ ने भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने जैसे मुद्दों को हवा दी.

सोरोस से पटेल और फिर भारत तक आया पैसा—

दिलचस्प बात यह है कि जॉर्ज सोरोस की संस्था से पहले पटेल की संस्था को फंडिंग मिली. फिर पटेल की संस्था से यह फंडिंग कई इंडियन थिंक टैंक्स तक पहुंची. जैसे नई दिल्ली बेस्ड सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर). मोदी सरकार, सीपीआर का फॉरेन फंडिंग लाइसेंस रद्द कर चुकी है.

सरकार के खिलाफ प्रोटेस्ट, ट्विटर ट्रेंड—

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले फ्रेंड्स ऑफ डेमोक्रेसी ने ‘कन्वरसेशंस ऑन इंडियन डेमोक्रेसी’ जैसी टॉक सीरीज आयोजित की. ‘मोदी मिराज’ जैसी रिपोर्ट स्पॉन्सर की, जिसमें मुख्य तौर पर नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली सरकार की आलोचना की गई थी. रिपोर्ट के मुताबिक फ्रेंड्स ऑफ डेमोक्रेसी ने ‘हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स’ और ‘फाउंडेशन लंदन स्टोरी’ जैसे संस्थानों से कोलैबोरेशन भी किया और उनकी अगुआई में सरकार के खिलाफ तमाम प्रोटेस्ट हुए और सोशल मीडिया ट्रेंड्स वगैरह भी चलाया गया।

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