
मिनिमली इनवेसिव थोराकोस्कोपी से 10 वर्षीय बच्ची को मिला नया जीवन
मुंबई, दिव्यराष्ट्र/ साढ़े तीन साल की उम्र से मायशा को लगातार खांसी रहती थी। कभी टीबी का इलाज हुआ, कभी अस्थमा समझकर दवाएं दी गईं और कई बार निमोनिया का उपचार भी किया गया। लेकिन समस्या बार-बार लौट आती थी। जब मायशा को नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल, मुंबई लाया गया, तब जांच में पता चला कि उसकी श्वास नली में पिछले करीब सात वर्षों से एक छोटी-सी वस्तु फंसी हुई थी। इसी वजह से उसके बाएं फेफड़े को धीरे-धीरे गंभीर नुकसान पहुंच रहा था।
जांच में समस्या की असली वजह सामने आने के बाद डॉक्टरों ने ब्रोंकोस्कोपी के जरिए करीब सात वर्षों से श्वास नली में फंसी बाहरी वस्तु को निकालने का फैसला किया। इसके लिए नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल की सीनियर कंसल्टेंट (पीडियाट्रिक पल्मोनोलॉजी) डॉ. इंदु खोसला के नेतृत्व में पल्मोनोलॉजी, एनेस्थीसिया और ईएनटी विशेषज्ञों की संयुक्त टीम गठित की गई। इस बाहरी चीज को सफलतापूर्वक निकालने के बाद फेफड़े के क्षतिग्रस्त हिस्से की मिनिमली इनवेसिव थोराकोस्कोपिक सर्जरी की गई। अब मायशा पहले की तुलना में ज्यादा बेहतर तरीके से सांस ले पा रही है और तेजी से स्वस्थ हो रही है।
मायशा का जन्म सामान्य था और शुरुआती बचपन भी स्वस्थ रहा। लेकिन साढ़े तीन साल की उम्र के बाद उसे लगातार खांसी और बुखार रहने लगा। इसके साथ उसकी भूख कम हो गई और वजन भी नहीं बढ़ रहा था। शुरुआती जांच में डॉक्टरों को टीबी की आशंका हुई, इसलिए उसका इलाज शुरू किया गया। जब इससे भी कोई फायदा नहीं हुआ तो अस्थमा मानकर इनहेलर दिए गए। इसके बावजूद उसकी परेशानी बनी रही और उसे बार-बार श्वसन संक्रमण होने लगा। साथ ही उसका वजन भी अच्छी तरह नहीं बढ़ पा रहा था।
अगले पांच वर्षों में किए गए सीटी स्कैन से पता चला कि उसके बाएं फेफड़े का निचला हिस्सा लगातार खराब होता जा रहा है, जबकि ऊपरी हिस्सा उसकी भरपाई करने की कोशिश कर रहा था। लंबे समय तक इलाज के बावजूद एक ही हिस्से की हालत बिगड़ती देख डॉक्टरों ने बीमारी की असली वजह तलाशने का फैसला किया।
मायशा के पूरे इलाज के रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन करने के बाद डॉक्टरों को शंका हुई कि उसकी सांस की नली में लंबे समय से कोई बाहरी चीज फंसी हो सकती है। फ्लेक्सिबल ब्रोंकोस्कोपी में यह आशंका सही साबित हुई। जांच में बाएं फेफड़े की निचली श्वास नली के शुरुआती हिस्से में एक बाहरी वस्तु फंसी मिली, जिसे फ्लेक्सिबल और रिजिड ब्रोंकोस्कोपी की मदद से सुरक्षित निकाल लिया गया।
हालांकि श्वास नली में फंसी बाहरी वस्तु निकाल दी गई थी, लेकिन लंबे समय तक रुकावट बने रहने से फेफड़े के प्रभावित हिस्से को स्थायी नुकसान पहुंच चुका था। इसके कारण ब्रोंकिएक्टेसिस (श्वास नलियों का असामान्य रूप से फैल जाना) विकसित हो गया था, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ गया। वहीं, बाएं फेफड़े के निचले हिस्से में नेक्रोसिस (फेफड़े के ऊतकों का नष्ट हो जाना) भी हो चुका था।
ऐसे में फेफड़े के स्वस्थ हिस्से को सुरक्षित रखने और बार-बार होने वाले संक्रमण से बचाने के लिए विशेषज्ञों की टीम ने मिनिमली इनवेसिव थोराकोस्कोपिक लेफ्ट लोअर लोबेक्टॉमी की। इस प्रक्रिया में फेफड़े के क्षतिग्रस्त हिस्से को हटाकर स्वस्थ ऊतकों को सुरक्षित रखा गया। सर्जरी सफल रही और ऑपरेशन के पांच दिन बाद मायशा को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
ऑपरेशन के बाद फेफड़ों की कार्यक्षमता बेहतर बनाने के लिए उसे एयरवे क्लियरेंस थेरेपी दी गई। एक महीने बाद हुई जांच में उसकी सांस लेने की क्षमता में सुधार के साथ-साथ वजन भी सामान्य रूप से बढ़ता हुआ पाया गया।
इस मामले को विस्तार से बताते हुए डॉ. इंदु खोसला ने कहा, “कई बार बच्चों की सांस की नली में फंसी कोई बाहरी चीज वर्षों तक पकड़ में नहीं आती, खासकर तब जब दम घुटने की शुरुआती घटना किसी की नजर में न आई हो या याद न हो। यदि किसी बच्चे को लंबे समय तक खांसी रहे, बार-बार सीने में संक्रमण हो या इलाज के बावजूद फेफड़े का वही हिस्सा बार-बार प्रभावित हो, तो डॉक्टरों को सांस की नली में किसी बाहरी वस्तु की संभावना पर भी विचार करना चाहिए। समय पर जांच और फ्लेक्सिबल ब्रोंकोस्कोपी से ऐसी समस्या का पता लगाया जा सकता है, जिससे फेफड़ों को स्थायी नुकसान से बचाया जा सके। देर से पहचान होने पर भी समय पर ब्रोंकोस्कोपी, फेफड़ों की पुनर्वास चिकित्सा और जरूरत पड़ने पर सर्जरी से बच्चे के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है।”
डॉक्टरों के अनुसार, यह मामला बताता है कि यदि श्वसन संबंधी लक्षण लंबे समय तक बने रहें और सामान्य इलाज से भी राहत न मिले, तो उनकी वजह सामान्य बीमारियों से अलग भी हो सकती है। समय पर सही जांच, आधुनिक ब्रोंकोस्कोपी और मिनिमली इनवेसिव सर्जरी जैसी तकनीकों की मदद से न सिर्फ फेफड़ों को सुरक्षित रखा जा सकता है, बल्कि बच्चे को सामान्य और स्वस्थ जीवन जीने का अवसर भी दिया जा सकता है।




