
जयपुर, दिव्यराष्ट्र/जयपुर के कोकून हॉस्पिटल में एक हाई-रिस्क महिला की जटिल लैप्रोस्कोपिक सर्जरी सफलतापूर्वक की गई। मरीज कई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थी, लेकिन डॉक्टरों की सावधानीपूर्वक प्लानिंग और पर्सनलाइज़्ड ट्रीटमेंट की वजह से जटिल लैप्रोस्कोपिक सर्जरी पूरी तरह सुरक्षित रही। ऑपरेशन के बाद महिला की रिकवरी अच्छी रही और किसी भी प्रकार की पोस्ट-सर्जिकल जटिलताएं नहीं आईं। यह केस साबित करता है कि सही समय पर और सही योजना के साथ इलाज करने से मुश्किल मेडिकल स्थितियों में भी सुरक्षित और बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
यह महिला मरीज अनियमित माहवारी और लगातार कमजोरी की शिकायत के साथ अस्पताल पहुंची। बेहद डिटेल्ड मेडिकल इवैल्युएशन के बाद उन्हें एबनॉर्मल यूटेराइन ब्लीडिंग का पता चला, जो एडेनोमायोसिस के कारण थी। यह एक ऐसी कंडीशन है, जिसमें गर्भाशय की अंदरूनी टिश्यूज़, गर्भाशय की मस्क्युलर वॉल में बढ़ने लगती हैं, जिससे समय के साथ ज्यादा ब्लीडिंग और लंबे समय तक परेशानी बनी रहती है।
इन सभी फैक्टर्स को ध्यान में रखते हुए, मरीज को जयपुर के कोकून हॉस्पिटल में भर्ती किया गया, जहां सीनियर कंसल्टेंट डॉ. मितुल गुप्ता, ऑब्स्टेट्रिक्स और गायनेकोलॉजी, की देखरेख में इलाज किया गया। पूरी डिटेल्ड मेडिकल असेसमेंट और सावधानीपूर्वक प्लानिंग के बाद टीम ने मिनिमली इनवेसिव सर्जिकल अप्रोच अपनाते हुए टोटल लैप्रोस्कोपिक हिस्टरेक्टॉमी करने का फैसला किया। पूरे प्रक्रिया के दौरान मरीज की लगातार क्लोज़ मॉनिटरिंग की गई।
इस केस के बारे में डॉ. मितुल गुप्ता ने बताया कि जब किसी पेशेंट को एक साथ कई स्वास्थ्य समस्याएँ होती हैं, तो इलाज से जुड़े फैसले बहुत सावधानी से लेने चाहिए। ध्यान केवल सर्जरी पर नहीं बल्कि उससे जुड़े जोखिमों जैसे ब्लड थिनिंग मेडिकेशन, क्लॉटिंग टेंडेंसी और ओवरऑल रिकवरी को मैनेज करना ज्यादा जरूरी होता है। ऐसे मामलों में डिटेल्ड मेडिकल प्लानिंग और लगातार मॉनिटरिंग से हर स्टेज पर पेशेंट की सेफ्टी सुनिश्चित की जा सकती है।
यह केस मेडिकल रूप से भी चुनौतीपूर्ण था क्योंकि पेशेंट की हेल्थ हिस्ट्री काफी कॉम्प्लेक्स थी। उन्हें हाइपोथायरॉयडिज़्म का डायग्नोसिस था और 2018 में ब्रेस्ट कैंसर से जुड़ा ट्रीटमेंट भी हो चुका था। इसके अलावा उन्होंने पहले लैप्रोस्कोपिक एपेन्डेक्टॉमी भी करवाई थी और उन्हें डीप वेन थ्रॉम्बोसिस (DVT) का इतिहास भी था, जो एक गंभीर कंडीशन है और इसमें वेन्स में ब्लड क्लॉट्स बन सकते हैं। इस वजह से पेशेंट लंबे समय तक ब्लड थिनिंग मेडिकेशन पर थीं, जो सर्जरी के दौरान अत्यधिक ब्लीडिंग का रिस्क बढ़ा देता है।
इस लैप्रोस्कोपिक प्रोसीजर ने सर्जिकल स्ट्रेस कम किया, ब्लड लॉस घटाया और पेशेंट की तेज रिकवरी में मदद की। मरीज ने ट्रीटमेंट पर बहुत अच्छा रिस्पॉन्स दिया और बिना किसी पोस्ट-ऑपरेटिव जटिलता के आसानी से रिकवर कर लिया। यह केस साफ़ दिखाता है कि जटिल स्वास्थ्य समस्याओं वाले हाई-रिस्क पेशेंट्स के लिए व्यक्तिगत देखभाल, समय पर जांच और सावधानीपूर्वक प्लानिंग कितनी महत्वपूर्ण है। सही मेडिकल अप्रोच से मुश्किल मामलों में भी सर्जरी सुरक्षित रहती है, रिकवरी तेज़ होती है और पोस्ट-सर्जिकल परेशानियां कम होती हैं, जिससे मरीज की जीवन गुणवत्ता बेहतर होती है।




