समय रहते चिकित्सा संबंधी इच्छाएं व्यक्त करने और लिविंग विल की प्रक्रिया समझने में मिलेगी मदद
जयपुर, दिव्यराष्ट्र:/ गंभीर बीमारी की स्थिति में जब व्यक्ति स्वयं अपने इलाज से जुड़े निर्णय लेने में सक्षम नहीं रह जाता, तब उसकी पहले से व्यक्त चिकित्सा संबंधी इच्छाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इसी दिशा में जागरूकता बढ़ाने और लोगों को लिविंग विल की प्रक्रिया की जानकारी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल में प्रदेश का पहला लिविंग विल काउंसलिंग सेंटर शुरू किया जा रहा है। इस केंद्र के माध्यम से लोगों को लिविंग विल के कानूनी एवं चिकित्सकीय पहलुओं, इसे तैयार करने की प्रक्रिया और इससे जुड़ी आवश्यक औपचारिकताओं के बारे में मार्गदर्शन दिया जाएगा।
सेंटर की शुरूआत 10 अक्टूबर को विश्व हॉस्पिस एवं पैलिएटिव केयर डे के मौके पर की जा रही है। इस पहल के तहत अस्पताल प्रबंधन ने चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, राजस्थान सरकार की प्रमुख शासन सचिव गायत्री राठौड़ से मुलाकात कर इस विषय पर चर्चा की। उन्होंने इस पहल की सराहना करते हुए इसे एक महत्वपूर्ण सामाजिक एवं मानवीय प्रयास बताया और इस दिशा में अस्पताल को सरकार की ओर से सहयोग का आश्वासन दिया। बैठक में लिविंग विल की प्रक्रिया को प्रदेश में व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक सरकारी प्रक्रियाओं पर भी चर्चा हुई। इस संबंध में माह के अंत तक अस्पताल प्रबंधन और राज्य सरकार के बीच संयुक्त बैठक प्रस्तावित है।
सप्ताह में एक दिन मिलेगी काउंसलिंग सुविधा*
अस्पताल के अधिशासी निदेशक मेजर जनरल एस सी पारीक ने बताया की लिविंग विल काउंसलिंग सेंटर में पूर्व पंजीकरण के आधार पर लोगों को काउंसलिंग प्रदान की जाएगी। इस पहल का उद्देश्य केवल गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों तक जानकारी पहुंचाना नहीं, बल्कि स्वस्थ व्यक्तियों को भी समय रहते अपनी चिकित्सा संबंधी इच्छाओं पर विचार करने और उन्हें स्पष्ट रूप से व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करना है। अस्पताल की चिकित्सा निदेषक डॉ गीतांजली अग्रवाल जोशी ने बताया कि काउंसलिंग की जिम्मेदारी बीएमसीएच की हॉस्पिस एवं पेलिएटिव केयर विभाग की निदेषक डॉ. अंजुम खान जोड़ की ओर से निभाई जाएंगी। डॉ. अंजुम पहले से ही लिविंग विल की दिशा में कार्य कर रहे संबंधित क्लीनिकों और विशेषज्ञों के संपर्क में हैं, ताकि उपलब्ध अनुभव और प्रक्रियाओं के आधार पर लोगों को उचित जानकारी दी जा सके।
भविष्य में आने वाले कठिन निर्णयों की तैयारी लिविंग विल
डॉ. अंजुम खान जोड ने बताया कि लिविंग विल एक कानूनी दस्तावेज है, जिसके माध्यम से कोई वयस्क व्यक्ति पहले से यह स्पष्ट कर सकता है कि यदि भविष्य में वह किसी ऐसी गंभीर और अपरिवर्तनीय चिकित्सा स्थिति में पहुंच जाए, जहां वह स्वयं निर्णय लेने या अपनी इच्छा व्यक्त करने में सक्षम न हो, तो वह किस प्रकार का उपचार चाहता है और किन जीवन रक्षक उपायों को नहीं चाहता। इसमें वेंटिलेटर, कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली अथवा अन्य आक्रामक उपचारों से संबंधित व्यक्ति की इच्छाओं को दर्ज किया जा सकता है। इसका मूल उद्देश्य मरीज की स्वायत्तता और गरिमा को बनाए रखना है। इसे बनाते समय स्वस्थ व्यक्ति भी अपने परिवार के साथ इस विषय पर बातचीत कर सकता है। अगर कभी मैं खुद फैसला लेने की स्थिति में न रहूँ तो मेरे इलाज के बारे में कौन फैसला करेगा? अगर मेरे ठीक होने की संभावना न हो तो क्या मैं लंबे समय तक लाइफ सपोर्ट पर रहना चाहूंगा? मेरी इच्छा परिवार और डॉक्टरों तक कैसे पहुंचेगी? इन सवालों पर समय रहते बातचीत मरीज की इच्छा को स्पष्ट करने के साथ-साथ परिवार को भविष्य में आने वाले कठिन निर्णयों के मानसिक दबाव से भी बचा सकती है।
मरीज की इच्छा और गरिमा को प्राथमिकता*
लिविंग विल का उद्देश्य मृत्यु को चुनना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति की स्वायत्तता, गरिमा और पहले से व्यक्त चिकित्सा संबंधी इच्छाओं का सम्मान सुनिश्चित करना है, जब वह स्वयं अपनी बात रखने में सक्षम न हो। इसके प्रति जागरूकता से मरीजों और उनके परिवारों को कठिन चिकित्सा परिस्थितियों में निर्णय लेने से जुड़े मानसिक दबाव को समझने और कम करने में भी मदद मिल सकती है। सेंटर की यह पहल लोगों को सही जानकारी और मार्गदर्शन उपलब्ध कराने के साथ-साथ राजस्थान में लिविंग विल की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए स्वास्थ्य विभाग के साथ समन्वय स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
तीन राज्यों की सरकारों ने शुरू किए प्रयास*
लिविंग विल का कानून 2018 में बना लेकिन इस वर्ष देश के कुछ राज्यों की सरकारों ने इसे जमीन पर लागू करना शुरू कर दिया है। महाराष्ट्र सरकार द्वारा इसके लिए देश का पहला डिजिटल पोर्टल शुरू करने और तमिलनाडु व गोवा जैसे राज्यों द्वारा आधिकारिक गाइडलाइंस जारी करने से इसमें तेजी आई है। इसके अलावा, अस्पतालों के आईसीयू में बिना किसी सुधार की उम्मीद के मरीज को वेंटिलेटर पर रखना होता है क्योंकि परिवार का सदस्य निर्णय नहीं ले पाता। यह विल ऐसे समय में निर्णय में सहायक होती और परिवार के लोग अनावश्यक लाखों रुपये के आर्थिक कर्ज और गंभीर मानसिक तनाव से बच सकेंगे।
बुज़ुर्गों, परिवार के साथ हॉस्पिटल पर भी पड़ेगा असर*
भारत के बुज़ुर्गों पर भी ’लिविंग विल’ का असर पड़ेगा, क्योंकि कम और मध्यम आय वाले देशों में होने वाली लगभग 80 प्रतिषत मौतें दिल की बीमारी, डायबिटीज़ और सांस की पुरानी बीमारियों जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों की वजह से होती हैं, जो बुज़ुर्गों में मौत का मुख्य कारण हैं। भारत की लगभग 10 प्रतिषत आबादी बुज़ुर्ग है, यानी करीब 16 करोड़ लोग, और 2036 तक यह संख्या आबादी का 15 प्रतिषत हो सकती है। इस विल का असर परिवार और हॉस्पिटल दोनों पर पडेगा। कई बार परिवार डॉक्टर के बताने के बाद भी यह निर्णय नहीं ले पाता कि उसके पेशेंट को लाइफ सपोर्ट से हटा दिया जाए। ऐसे में वह भी आर्थिक बोझ के नीचे दबता चला जाता है। यह विल परिवार के सदस्य को निर्णय लेने में सपोर्ट करेगी तो चिकित्सालय भी अपने उपलब्ध वेंटिलेटर और डायलिसिस जैसे संसाधनों को उन रोगियों को देने में प्राथमिकता दे पाएंगा जिन्हें इसकी ज्यादा जरूरत है और जो इस सपोर्ट की सहायता से ठीक हो सकते है।



