
जयपुर, दिव्यराष्ट्र/ कुछ व्यक्तित्व अपने पीछे केवल स्मृतियाँ नहीं छोड़ते, बल्कि ऐसे संस्कारों की विरासत छोड़ जाते हैं जो पीढ़ियों तक जीवन का मार्ग आलोकित करती रहती है। मानकंवर सचेती का जीवन भी ऐसा ही था। 96 वर्ष की आयु में उन्होंने जैन परंपरा के सर्वोच्च व्रत संलेखना (संथारा) को पूर्ण श्रद्धा, धैर्य और आत्मिक जागृति के साथ स्वीकार कर संसार से विदा ली। यह केवल मृत्यु का वरण नहीं था, बल्कि पूरे जीवन साधे गए संयम, तप और समता का अंतिम उत्सव था।
उनके पति स्व. ज्ञानचंद सचेती भी 5 जून 2006 को संथारा के साथ देवलोक गमन कर चुके थे। पति के पश्चात उन्होंने लगभग दो दशकों तक अकेले रहते हुए भी कभी जीवन से शिकायत नहीं की। वे सदैव सकारात्मक सोच, कर्मशीलता और आत्मविश्वास का उदाहरण बनी रहीं। उनके चेहरे पर संतोष की मुस्कान और व्यवहार में सहज आत्मीयता देखने वालों को सहज ही प्रभावित कर देती थी।
धर्म उनके लिए केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं था, वे स्थानकवासी परंपरा के आचार्य हस्तीमल महाराज तथा हीरामुनि महाराज की अनन्य अनुयायी थीं। प्रतिदिन दो सामायिक करना उनका अटल नियम था। वे अपनी निजी पुस्तिका में संथारे का भाव भी लिखकर रखती थीं, मानो जीवन के प्रत्येक दिन को आत्मकल्याण की तैयारी मानकर जी रही हों। जब तक उनके पति जीवित रहे, तब तक वे प्रत्येक चातुर्मास में साधु-संतों के दर्शन और प्रवचनों का लाभ लेने अवश्य जाती थीं।
उनकी संलेखना भी अत्यंत अनुशासित और प्रेरणादायी रही। अंतिम सात दिनों में उन्होंने पहले पांच दिन त्रिविहारी त्याग किया और फिर अंतिम दो दिन चौविहार व्रत का पालन करते हुए पूर्ण शांति और समता के साथ आत्मयात्रा पूर्ण की। यह दृश्य परिवार के लिए भावुक अवश्य था, किंतु साथ ही आत्मबल और धर्मनिष्ठा का अनुपम उदाहरण भी।
घर-परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वहन उन्होंने पूरे समर्पण से किया। दिनभर कढ़ाई-बुनाई, गृहकार्य और परिवार की आवश्यकताओं में व्यस्त रहते हुए भी उनके मन में कभी थकान नहीं दिखी। उन्होंने अपनी पुत्रियों आशा सिंघी, वीणा कोठारी, शशि लोढ़ा और मधु जुनीवाल तथा पुत्र सुनील सचेती एवं बहू मीनू को परिश्रम, सेवा, सादगी और धार्मिक संस्कारों की अमूल्य धरोहर दी। अपनी माताजी की सेवा भी उन्होंने पूरे समर्पण और प्रेम से की, जिससे परिवार में सेवा और संवेदना की परंपरा और सुदृढ़ हुई।
उनका परिवार भी समाज में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। उनके देवर गुलाबचंद सचेती (95 वर्ष) तथा कैलाशचंद सचेती (87 वर्ष) आज भी परिवार की वरिष्ठ पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वहीं स्वर्गीय प्रकाशचंद सचेती, जो राजस्थान प्रशासनिक सेवा में सुपर टाइम स्केल अधिकारी रहे, वर्ष 2020 में देवलोक गमन कर चुके हैं। उनके बड़े पुत्र निर्मल जी का 2008 में स्वर्गवास हो चुका था
श्रीमती मानकंवर सचेती का जीवन हमें यह सिखाता है कि दीर्घायु होने से अधिक महत्वपूर्ण है सार्थक जीवन जीना। सेवा में विनम्रता, कर्म में निष्ठा, विचारों में सकारात्मकता और धर्म में अटूट विश्वास इन चार स्तंभों पर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन खड़ा किया। इसलिए उनका जाना केवल एक परिवार की क्षति नहीं, बल्कि उन सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है जिन्होंने उन्हें निकट से देखा और उनके स्नेह का स्पर्श पाया।
ऐसी संयममयी साधिका को विनम्र श्रद्धांजलि। उनका तप, त्याग, सेवा और धर्मनिष्ठ जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का दीपक बना रहेगा। संथारा 29 जुलाई को सुबह 7:40 पर लिया और 30 जुलाई को रात को 10:21 पर सीज गया व देह त्यागी, 31 जुलाई को बैकुंठी के साथ उनका देहलोक गमन हुआ और 1 अगस्त को उनकी श्रद्धांजलि सभा हुई।
शोक मग्न होते हुए भी परिवार ने उनका संथारा दिवस खुशी से मनाया।
संथारा साधिका मान कवंर जस्टिस अनुरूप सिंघी की नानी है।





