गुरूग्राम, दिव्यराष्ट्र:/ मुंबई में उमस भरी शाम में, जब एअर इंडिया के वाइडबॉडी विमान लंदन, न्यूयॉर्क और फ्रैंकफर्ट के लिए रात की उड़ान भरने की तैयारी कर रहे होते हैं, इस बीच पैसेंजर केबिन के नीचे मौजूद कार्गो होल्ड में एक अनोखा यात्री यात्रा के लिए तैयार हो रहा होता है, जिसका दुनिया भर में बेसब्री से इंतज़ार हो। सावधानी से पैक किए गए आम, जो भले ही बक्से में बंद हो, पर उसे आसानी से पहचाना जा सकता है।
हर साल, भारत में गर्मी के मौसम में यह सिलसिला फिर शुरू हो जाता है। 2026 में इसका पैमाना बहुत बड़ा रहा है।
मार्च और मई 2026 के बीच, एअर इंडिया ने अपने नेटवर्क पर 3,300 टन से अधिक ताज़े फल-सब्ज़ियाँ पहुँचाईं। इस कार्गो में 1,000 टन से अधिक आम थे – वह फल जो भारत के खान-पान और संस्कृति में एक खास, महत्व रखता है, पौराणिक कथाओं से भी इसका ताल्लुक रहा है और और विदेशों में बसे भारतीयों के बीच भी इस फल को उतना ही पसंद किया जाता है।
दूर-दराज़ के शहरों में इंतज़ार कर रहे लोगों के लिए, आम का पहुँचना सिर्फ़ एक डिलीवरी नहीं, बल्कि एक खास इवेंट होता है।
टनों में मापा गया सीज़न
यह आंकड़ा लगातार बढ़ा है। मार्च में पहले कन्साइन्मेन्ट के ज़रिए एअर इंडिया ने 805 टन फल और सब्ज़ियाँ पहुंचाईं। अप्रैल तक, जब फ़सल कटाई ज़ोरों पर थी, यह आँकड़ा बढ़कर 1,275 टन हो गया और मई में भी 1,233 टन के साथ मज़बूत बना रहा।
इस मात्रा का एक बड़ा हिस्सा भारत के पश्चिमी इलाके से आता है, खासकर महाराष्ट्र और गुजरात के आम के बागानों से, जहाँ अल्फ़ोंसो और केसर किस्में उगाई जाती हैं। अपनी मिठास, बनावट और खुशबू के लिए मशहूर इन आमों के प्रशंसक दुबई से लेकर न्यू जर्सी तक फैले हुए हैं।
खेती के इस मुख्य इलाके के नज़दीक स्थित मुंबई इस सीज़न के लॉजिस्टिक्स का मुख्य केंद्र बन जाता है।
शहर के कार्गो टर्मिनलों से, कन्साइनमेन्ट अलग-अलग महाद्वीपों तक भेजे जाते हैं। तीन महीने की अवधि के दौरान, पीक सप्ताहों में मुंबई से लंदन हीथ्रो के लिए हर सप्ताह 180 टन तक माल भेजा गया। फ्रैंकफर्ट को लगभग 40 टन माल मिला, जबकि दुबई, नेवार्क और न्यूयॉर्क जेएफके -इन तीनों को हर सप्ताह लगभग 30 टन माल भेजा गया।
फल का सफ़र*
ये रास्ते माइग्रेशन, स्वाद और यादों की कहानी बयां करते हैं।
दुबई जैसे पश्चिम एशियाई शहरों में, भारतीय आमों को खूब पसंद किया जाता है। वहीं लंदन और न्यूयॉर्क में, इनके आने से एक विशेष रीटेल विंडो की शुरुआत होती है, जहाँ स्पेशलटी ग्रॉसर्स इन्हें क्रेट्स में सजा कर बेचते हैं और ग्राहक बड़ी मात्रा में इन्हें खरीदते हैं। अक्सर इन्हें आगे दोस्तों और परिवार वालों को भेजते हैं।
दिल्ली से, एअर इंडिया के विमान सैन फ्रांसिस्को, टोरंटो, पेरिस, हांेगकांेग और सिडनी जैसे दूर-दराज़ के शहरों तक जल्दी खराब होने वाले सामान पहुँचाते हैं और भारतीय उपज को ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनाते हैं। ऐसी चेन जो कमर्शियल होने के साथ-साथ इमोशनल यानि भावनात्मक महत्व भी रखती है।
आज यह एयरलाइन हर साल 4,00,000 टन से ज़्यादा कार्गो हैंडल करती है, और भारत की सबसे बड़ी इंटरनेशनल कार्गो ऑपरेटर बन गई है।
ताज़गी को बरक़रार रखने का तरीका
खेत से लेकर विदेश में बिकने तक आम के इस सफ़र में सिर्फ़ दूरी मायने नहीं रखती, यहां बात तापमान को सही बनाए रखने की है।
विमान के दरवाज़े बंद होने से बहुत पहले ही कोल्ड चेन का काम शुरू हो जाता है। आईएटीए से मंज़ूरी प्राप्त एजेंट्स की देखरेख में, फल और सब्ज़ियाँ रेफ्रिजरेटेड ट्रकों से एयरपोर्ट टर्मिनल तक पहुँचाई जाती हैं। जहाँ खास पैलेट और कंटेनर में लोड करने से पहले इन्हें तापमान-नियंत्रित माहौल में रखा जाता है, जो आमतौर पर 15 डिग्री सेल्सियस से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है।
लैंडिंग के बाद भी यही प्रक्रिया दोहराई जाती है, जहाँ सामान की डिलीवरी होने तक तापमान-नियंत्रित हैंडलिंग जारी रहती है।
पिछले कुछ सालों में, एअर इंडिया ने इस सिस्टम को मज़बूत बनाने के लिए निवेश किया है। आज, एयरलाइन 14 हवाई-अड्डों पर कोल्ड-स्टोरेज और एक्टिव-कंटेनर की सुविधाएँ उपलब्ध कराती है। इनमें दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरु, लंदन हीथ्रो, फ्रैंकफर्ट और न्यूयॉर्क के जेएफके और नेवार्क जैसे बड़े हब शामिल हैं।
कूल डॉली से लेकर थर्मल ब्लैंकेट जैसे सहायक उपकरण यह सुनिश्चित करते हैं कि टरमैक पर तापमान स्थिर बना रहे।
ये सुविधाएँ जीडीपी-सर्टिफाइड हैं, और तापमान के प्रति संवेदनशील कार्गो को संभालने के विश्वस्तरीय मानकों को अनुपालन करती हैं।
एअर इंडिया के कार्गो हेड, रमेश मामिडाला ने कहा, “सिर्फ़ तीन महीनों में 1,000 टन से अधिक आमों का ट्रांसपोर्टेशन बढ़ती मांग के साथ-साथ हमारी कोल्ड-चेन प्रक्रियाओं की मज़बूती को भी दर्शाता है। जल्दी खराब होने वाली चीज़ों को बहुत सावधानी से संभालने की ज़रूरत होती है, और हमारी टीमें हर कदम पर गुणवत्ता बनाए रखने के लिए साझेदारों के साथ मिलकर काम करती हैं।”
लॉजिस्टिक्स के दायरे से कहीं बढ़कर
यह गतिविधि को सिर्फ़ संचालन की कामयाबी नहीं, इसके गहरे महत्व को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
हर शिपमेंट में फल-सब्ज़ियां नहीं बल्कि मौसम का अहसास भी होता है। एक ऐसी चीज़ जो ग्लोबल फ़ूड इकॉनमी में तेज़ी से दुर्लभ हो रही है। और एक ऐसी उम्मीद जो महाद्वीपों को एक दूसरे के साथ जोड़ती है।
भारतीय मूल के लोगों के लिए, सीज़न का पहला आम अक्सर जानी-पहचानी ज़िंदगी के साथ फिर से जुड़ने का अहसास देता है, भले ही यह कुछ ही पलों के लिए हो। बाकी लोगों के लिए, यह एक ऐसे फल से परिचय है जिसने अपनी असली खूबियों को बरक़रार रखते हुए हज़ारों मील का सफ़र तय किया है।
लंदन और न्यूयॉर्क जैसे शहरों में आम का सीज़न बहुत छोटा होता है; पीक सीज़न कुछ ही सप्ताह तक रहता है। हालांकि इस दौरान माँग तेज़ी से बढ़ती है, दुकानों के शेल्फ़ जल्दी खाली हो जाती हैं, और घरों, बाज़ारों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर एक ही सवाल रहता हैः क्या आम आ गए?
कम होती दूरियाँ
एअर इंडिया के कार्गो के आँकड़े असल में सिर्फ़ बड़े पैमाने तक सीमित नहीं हैं। ये भारत के खेतों को दुनिया भर की डाइनिंग टेबल के साथ जोड़ते हैं। और व्यापार के साथ-साथ पहचान एवं यादों को भी तरोताज़ा बनाए रखते हैं।
एक रात की उड़ान में, पश्चिमी भारत में तोड़े गए फल दुनिया के दूसरे कोने में मौजूद रसोई तक पहुँच जाते हैं। और वहां पहुंच कर भी ये आम उसी ताज़गी एवं गर्मियों की याद दिलाते हैं।
यह पहलु एक बार फिर से याद दिलाता है कि एविएशन का काम सिर्फ़ लोगों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाना नहीं है। यह उद्योग स्वाद, परम्पराओं और उम्मीदों को भी दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँचाता है, और दूरियों को न सिर्फ़ भौगोलिक, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी कम करता है।
तो लंबी दूरी तय करने वाले विमान के किसी कोने में, मुंबई और लंदन के बीच, आमों के बक्सों के ज़रिए गर्मियाँ सफ़र करती हैं।


