
(दिव्यराष्ट्र के लिए महावीर जयंती पर विशेष डॉ.लोकेश कुमार चंदेल)
जयपुर। भगवान महावीर ने अपने उपदेश में कहा था कि “स्वयं से लड़ो, बाहरी दुश्मन से क्या लड़ना’ ? स्वयं पर विजय प्राप्त करना, लाखों शत्रुओं पर विजय पाने से बेहतर है। जो स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेगा, उसे आनंद की प्राप्ति होगी। आपकी आत्मा से परे कोई भी शत्रु नहीं है। असली शत्रु आपके भीतर रहते हैं, वे शत्रु हैं क्रोध, मान, माया और लोभ। क्रोध को क्षमा से, मान को मृदुता से, माया को सरलता से और लोभ को संतोष से विजय प्राप्त कर सकते हैं। महावीर स्वामी का जन्म 599 ई.पू. वैशाली के पास कुंडग्राम (वर्तमान बिहार) में हुआ था। उनका जन्म एक राजपरिवार में हुआ और बचपन में उनका नाम वर्धमान था । 30 साल की उम्र में भगवान महावीर ने अपना राज्य और परिवार को त्याग दिया ताकि वह स्वयं को और सच की खोज कर सकें। 12 साल तक कठिन ध्यान, उपवास और अनुशासन के बाद भगवान महावीर को सच्चा ज्ञान प्राप्त हुआ और एक गुरु बन गए। भगवान महावीर 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे। बहुत ही कम उम्र में उन्होंने सत्य और शांति की तलाश के लिए अपना राजसी जीवन छोड़ दिया । भगवान महावीर की शिक्षाएं जैन धर्म की नींव मानी जाती हैं, एक ऐसा धर्म जो हर जीव के लिए शांति और सम्मान को महत्व देता है। उनका मानना था कि हर एक इंसान को क्रोध, लालच और नफरत छोड़ कर एक सही जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। उनके सिद्धांत- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह सिद्धांत ही तीसरे विश्व युद्ध के खतरे से निजात दिला सकते हैं। अमेरिका, इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो ) के सदस्य देशों पर गुस्सा निकालते हुए कहा कि ईरान के खिलाफ लड़ाई में नाटो ने अमेरिका की कोई सहायता नहीं की है। कई देश इस युद्ध में नहीं चाहते भी भाग लेना पड़ सकता है। यह बड़ी बात नहीं है कि यह तीसरे विश्व युद्ध का रूप ले लें। महावीर के सिद्धांत न केवल व्यक्तिगत शांति, तनाव मुक्ति और नैतिक जीवन का मार्ग प्रशस्त करते हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक सौहार्द और वैश्विक समस्याओं के समाधान में भी अहम भूमिका निभाते हैं।
महावीर स्वामी के सिद्धांतों का महत्वः-
अहिंसा :-आज के संघर्ष और युद्ध के दौर में ‘जीओ और जीने दो’ का संदेश बहुत महत्वपूर्ण है। यह न केवल मनुष्यों बल्कि पशु-पक्षियों और पर्यावरण के प्रति भी करुणा और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने से भी पीछे नहीं है।
अपरिग्रहः-यह सिद्धांत अत्यधिक भौतिकवाद और लोभ को नियंत्रित करने में सहायता प्रदान करता है। वर्तमान में संसाधन सीमित हैं और यह शिक्षा हमें आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करने और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार रहने की प्रेरणा प्रदान करती है।
सत्यः-यह ईमानदारी, पारदर्शी व्यवहार और गलत सूचनाओं के दौर में सच्चाई के प्रति अडिग रहने की प्रेरणा प्रदान करता है, जिससे विश्वास का माहौल बनता है।
अस्तेयः- यह दूसरों के अधिकारों और संपत्ति का सम्मान करने की सीख प्रदान करता है, जो एक न्यायपूर्ण समाज के लिए आवश्यक है।
ब्रह्मचर्यः-यह आत्म-नियंत्रण, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने और एकाग्रता को बढ़ावा देने में सहायता प्रदान करता है।
अनेकांतवादः-यह दूसरों के दृष्टिकोण का सम्मान करने और सहिष्णुता को बढ़ावा देता है, जो सांप्रदायिक और वैचारिक मतभेदों को सुलझाने में सहायक प्रदान करता है।
ये सिद्धांत जैन धर्म का मूल हैं और सभी प्राणियों को शांति, करुणा और सम्मान से भरा जीवन जीने की शिक्षा देते हैं। किसी भी प्राणी को नहीं मारें, उन पर शासन करने का प्रयास भी नहीं करें। जिस प्रकार आप दुःख पसंद नहीं करते, उसी तरह और लोग भी इसे पसंद नहीं करते। भगवान महावीर ने ये सीख दी कि हर व्यक्ति सही ज्ञान, सही विश्वास और सही आचरण से सच्ची समझ और सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। भगवान महावीर ने 72 साल की उम्र में पावापुरी (जो आज के बिहार में है) में निर्वाण पाया। यह जगह अब जैन धर्म के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थान बन गया है।
बहरहाल, हम यहीं कह सकते हैं कि भगवान महावीर स्वामी के सिद्धांत एक संतुलित, शांत और नैतिक जीवन जीने के लिए आज के वर्तमान युग में प्रासंगिक मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। किसी भी जीव को नुकसान नहीं पहुचाएं, गाली नहीं दें, अत्याचार नहीं करें, उसे दास नहीं बनाएं, उसका अपमान नहीं करें, उसे सताएं अथवा प्रताड़ित नहीं करें और उसकी हत्या नहीं करें। सुख में और दुःख में, आनंद में और कष्ट में, हमें हर जीव के प्रति वैसी ही भावना रखनी चाहिए, जैसा की हम अपने प्रति रखते हैं।




