
‘साधो! सबद साधना कीजे’ कार्यक्रम में हुआ साहित्यिक विमर्श
जयपुर। वरिष्ठ साहित्यकार एवं कला समीक्षक डॉ. राजेश व्यास ने कहा कि लालित्य की सबसे बड़ी शर्त है कि हम उसे पहले अनुभूत करें, तभी उसे प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त कर सकते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार कुबेरनाथ राय और विद्यानिवास मिश्र ने अपनी रचनाओं में इसी लालित्य को अभिव्यक्ति दी। साहित्य में वासुदेव शरण अग्रवाल और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ भी इस परंपरा के महत्वपूर्ण नाम हैं।
‘साधो! सबद साधना कीजे’ कार्यक्रम के दूसरे दिन आयोजित ‘भाषा में लालित्य’ सत्र में डॉ. व्यास ने कहा कि कुबेरनाथ राय हमें उन अनेक बातों का स्मरण कराते हैं, जो आधुनिक जीवन की आपाधापी में पीछे छूटती चली जाती हैं। उन्होंने शब्दों में निहित सौंदर्य को पाठकों तक पहुंचाया और भारतीय परंपराओं को पुराणों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भाषा केवल व्याकरण से निर्मित नहीं होती, बल्कि शब्दों के उच्चारण का भी उसमें महत्वपूर्ण योगदान होता है। व्याकरण भाषा को अनुशासन देती है, जबकि उच्चारण और शब्द-संवेदना उसमें लालित्य का संचार करते हैं।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए देश के प्रसिद्ध साहित्यकार प्रयाग शुक्ल ने कहा कि यहां आकर उनकी अनेक साहित्यिक स्मृतियां जागृत हो गई हैं। उन्होंने कहा कि विद्यानिवास मिश्र हिंदी जगत के नामी हस्ताक्षर थे और उनके विचारों की प्रासंगिकता बढ़ रही है। इस अवसर पर उन्होंने साहित्यकार अज्ञेय की दो कविताओं का पाठ भी किया।
कार्यक्रम में मंचासीन अतिथियों ने डॉ. शोभा सिंह द्वारा लिखित पुस्तक ‘नील सरोरूह नीलमणि’ का विमोचन किया। पुस्तक के विमोचन के अवसर पर साहित्य और भाषा के विभिन्न पक्षों पर वक्ताओं ने अपने विचार साझा किए।
साहित्यकार डॉ. शोभा सिंह ने विद्यानिवास मिश्र के साहित्यिक अवदान पर चर्चा करते हुए कहा कि वे एक गांव में संस्कृत परंपरा वाले परिवार में जन्मे, लेकिन उनका कर्मक्षेत्र हिंदी भाषा बना। उन्होंने व्याकरण और भाषा पर महत्वपूर्ण कार्य किया तथा देश की लोक परंपराओं को एकत्रित करने का उल्लेखनीय प्रयास किया। उनकी रचनावली 21 खंडों में प्रकाशित हुई है।
दिल्ली से आए साहित्यकार अमरनाथ अमर ने सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ के साहित्य पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी रचनाएं कालजयी हैं। अज्ञेय कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं के संपादक रहे और उनके यात्रा संस्मरण सांस्कृतिक चेतना से ओतप्रोत हैं। वे विश्व साहित्य और भूगोल के भी गहरे जानकार थे। उन्होंने कहा कि अज्ञेय का ‘शेखर : एक जीवनी’ चरित्र-प्रधान उपन्यास है, जिसे रामस्वरूप चतुर्वेदी ने भाषा की दृष्टि से अत्यंत सुगठित माना है।
कार्यक्रम का संचालन अभिलाषा पारीक और इंदु झुनझुनवाला ने किया। ग्रासरूट मीडिया फाउंडेशन के प्रमोद शर्मा ने बताया कि यह दो दिवसीय संगोष्ठी अभ्युदय अंतरराष्ट्रीय संस्था और राजस्थान फोरम के सहयोग से आयोजित की गई।
अंत में राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति, जयपुर के अध्यक्ष राजेंद्र बोड़ा ने आभार व्यक्त किया, जबकि ग्रासरूट मीडिया फाउंडेशन की ओर से एडवोकेट अनुज शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।





