
(दिव्य राष्ट्र के लिए लेख राम विश्नोई जोधपुर)
जोधपुर, दिव्यराष्ट्र:/ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति में घोष केवल वाद्ययंत्रों का सामूहिक वादन नहीं है, बल्कि यह अनुशासन, एकरूपता, साधना और सामूहिक चेतना का प्रभावशाली माध्यम है। संघ की शाखाओं में घोष के स्वर स्वयंसेवकों में लय, ताल, अनुशासन और संगठनात्मक भाव को जागृत करते हैं। जब सैकड़ों और हजारों घोष वादक एक साथ एक ही ताल और स्वर में वादन करते हैं, तो वह केवल संगीत की प्रस्तुति नहीं रहती, बल्कि सामूहिक शक्ति और राष्ट्रभाव की अनुभूति बन जाती है।
राजस्थान में संघ के घोष कार्य की इसी समृद्ध परंपरा का एक उल्लेखनीय अध्याय अजमेर के अजयमेरु स्थित आज़ाद पार्क में आयोजित ‘स्वर निनाद’ घोष शिविर रहा। यह चार दिवसीय शिविर 30 जनवरी से 2 फरवरी 2014 तक आयोजित हुआ था। इसमें चित्तौड़ प्रांत के अंतर्गत आने वाले 11 जिलों से लगभग 700 घोष वादक एवं संगीत साधक स्वयंसेवकों ने भाग लिया। शिविर का उद्देश्य घोष वादन के प्रशिक्षण के साथ-साथ स्वयंसेवकों में अनुशासन, सामूहिकता और राष्ट्रभाव को और अधिक सुदृढ़ करना था। समापन समारोह में संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का सानिध्य प्राप्त हुआ।
‘स्वर निनाद’ जैसे शिविर केवल संघ में किसी कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने वाला माध्यम नहीं है। इसके पीछे निरंतर अभ्यास, साधना और एकाग्रता होती है। अलग-अलग वाद्ययंत्रों को एक साथ साधना और सैकड़ों स्वयंसेवकों का एक ही ताल में चलना संगठनात्मक अनुशासन की जीवंत अभिव्यक्ति है।
इसी परंपरा का एक और विराट स्वरूप जयपुर के केशव विद्यापीठ, जामडोली में आयोजित ‘स्वर गोविन्दम्’ घोष शिविर में 2017 में देखने को मिला। उस विशाल आयोजन में लगभग 1500 घोष वादक स्वयंसेवकों ने सहभागिता की। जयपुर प्रांत बनने के बाद यह घोष का एक अत्यंत बड़ा आयोजन माना गया। इसका उद्देश्य घोष की वाद्य कला को अधिक प्रभावी बनाना, स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित करना तथा सांघिक कार्यक्रमों और संचलन में घोष की भूमिका को व्यापक रूप से सामने लाना था।
अजमेर का ‘स्वर निनाद’ हो या जयपुर का ‘स्वर गोविन्दम्’, दोनों आयोजनों ने राजस्थान में घोष की साधना को नई ऊंचाई प्रदान की। इन आयोजनों से प्रशिक्षित स्वयंसेवकों ने आगे विभिन्न शाखाओं और सांघिक कार्यक्रमों में घोष की परंपरा को मजबूत करने में योगदान दिया।
इसी क्रम में अब संघ शताब्दी वर्ष पूर्ण होने के ठीक पश्चात जोधपुर प्रांत में ‘मरू निनाद’ घोष शिविर का आयोजन एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनने जा रहा है। जोधपुर प्रांत में लगभग छह वर्ष पूर्व ‘मरू निनाद प्रांत घोष वर्ग’ की योजना बनाई गई थी, लेकिन उस समय श्रीराम जन्मभूमि, अयोध्या से संबंधित ऐतिहासिक निर्णय के कारण इसे स्थगित करना पड़ा। अब शताब्दी वर्ष पूर्ण होने के ठीक पश्चात यह आयोजन 12 से 15 नवंबर तक जोधपुर में है।
इस शिविर में लगभग 5,000 घोष वादक स्वयंसेवकों के भाग लेने की संभावना है। यदि यह आयोजन निर्धारित स्वरूप में होता है तो यह राजस्थान क्षेत्र के तीनों प्रांतों में अब तक के सबसे बड़े घोष आयोजनों में से एक होगा। इतने बड़े स्तर पर घोष वादकों का एक साथ प्रशिक्षण और वादन राजस्थान में संघ के घोष कार्य की व्यापकता और उसकी निरंतर साधना को प्रदर्शित करेगा। इस आयोजन को संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत जी का सानिध्य भी प्राप्त होगा।
‘मरू निनाद’ केवल एक विशाल घोष शिविर नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही साधना, प्रशिक्षण और संगठनात्मक अनुभव की अगली कड़ी है। ‘स्वर निनाद’ में 700 घोष वादकों से प्रारंभ हुई यह यात्रा ‘स्वर गोविन्दम्’ में लगभग 1500 और अब ‘मरू निनाद’ में लगभग 5,000 घोष वादकों तक पहुंच रही है। यह विस्तार संख्या मात्र का विस्तार नहीं, बल्कि घोष कार्य के प्रति बढ़ती रुचि, समर्पण और साधना का परिचायक है।
घोष के प्रत्येक स्वर में अनुशासन है, प्रत्येक ताल में सामूहिकता है और प्रत्येक लय में राष्ट्रभाव का संदेश है। जब हजारों स्वयंसेवक एक साथ घोष वादन करते हैं तो उनकी ध्वनि केवल वातावरण को गुंजायमान नहीं करती, बल्कि ‘मैं’ से ‘हम’ और व्यक्तिगत साधना से सामूहिक राष्ट्र साधना की यात्रा का अनुभव कराती है।
संघ के शताब्दी वर्ष में आयोजित होने वाला ‘मरू निनाद’ इसी परंपरा का विराट स्वर बनने जा रहा है—जहां वाद्ययंत्रों के स्वर, स्वयंसेवकों का अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की भावना मिलकर राजस्थान की धरती पर एक अद्भुत सांघिक अनुभूति का निर्माण करेंगे।