(दिव्य राष्ट्र के लिए लेखाराम बिश्नोई)
‘नमामि भारतम्’ के सामूहिक गायन से जागेगा मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता का भाव भारत के राष्ट्रीय जीवन में कुछ शब्द ऐसे हैं, जो केवल शब्द नहीं रहते। वे समय की सीमाओं को पार कर भावनाओं, संघर्षों और संकल्पों के प्रतीक बन जाते हैं। ‘वन्दे मातरम्’ ऐसे ही शब्द हैं। इन दो शब्दों में भारतभूमि के प्रति श्रद्धा है, मातृत्व का भाव है, स्वतंत्रता का स्वप्न है और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व का स्मरण भी है।
‘वन्दे मातरम्’ की रचना को 150 वर्ष पूर्ण होने का अवसर इसलिए केवल किसी गीत की वर्षगांठ नहीं है। यह उस राष्ट्रीय चेतना को स्मरण करने का अवसर है, जिसने पराधीन भारत में आत्मविश्वास जगाया और स्वतंत्रता के संघर्ष को भावनात्मक आधार प्रदान किया। इसी ऐतिहासिक भावभूमि में 25 सितंबर 2026 को देशभर में ‘वन्दे मातरम्’ के सामूहिक गायन का आयोजन ‘नमामि भारतम्’ अभियान के अंतर्गत किया जा रहा है।
विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान द्वारा आयोजित यह राष्ट्रव्यापी अभियान गीत को केवल गाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि उसके पीछे निहित राष्ट्रभाव को जन-जन तक पहुंचाने का अवसर है। पुणे जैसे ऐतिहासिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक नगर में इस अभियान का महत्व और भी व्यापक दिखाई देता है।
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वन्दे मातरम्’ की रचना की। बाद में यह उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना। उस समय भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था और समाज में राजनीतिक दासता के साथ आत्मविश्वास का संकट भी था।
ऐसे वातावरण में
“सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्।”
जैसी पंक्तियों ने भारतभूमि को एक जीवंत मातृस्वरूप में देखने की दृष्टि दी।
यहां भारत केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं है। वह अन्न देने वाली धरती है, जल देने वाली भूमि है, जीवन और संस्कृति को पोषित करने वाली माता है। इसलिए ‘वन्दे मातरम्’ का भाव भारतीय परंपरा के उस चिंतन से जुड़ता है, जिसमें जन्मभूमि के प्रति कृतज्ञता को जीवन का स्वाभाविक संस्कार माना गया है।
1905 के बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन में ‘वन्दे मातरम्’ की गूंज व्यापक हुई। सभाओं और आंदोलनों में यह राष्ट्रीय जागरण का प्रमुख स्वर बना। अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे अपने संघर्ष और आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति के रूप में अपनाया।
इस गीत की शक्ति केवल उसके शब्दों में नहीं थी। उसकी शक्ति उस सामूहिक भावना में थी, जिसे वह व्यक्त करता था। जब हजारों लोग एक साथ ‘वन्दे मातरम्’ कहते थे, तब उनके बीच भाषा, प्रांत, जाति और सामाजिक भेदों से ऊपर उठकर एक साझा राष्ट्रीय अनुभूति निर्मित होती थी।
यही किसी राष्ट्रगीत की वास्तविक शक्ति होती है—वह व्यक्ति को अकेलेपन से निकालकर सामूहिक चेतना से जोड़ता है।
देश की भूमि स्वयं सामाजिक जागरण, शिक्षा, राष्ट्रचिंतन और स्वतंत्रता आंदोलन की अनेक धाराओं की साक्षी रही है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा सार्वजनिक गणेशोत्सव और शिवजयंती जैसे आयोजनों को सामाजिक चेतना के माध्यम के रूप में विकसित करना इस बात का उदाहरण है कि सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां किस प्रकार समाज में सार्वजनिक सहभागिता और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत कर सकती हैं।
राष्ट्र की शैक्षिक परंपरा ने भी विचार और समाज के बीच संवाद को महत्व दिया है। इसलिए जब आज ‘नमामि भारतम्’ के माध्यम से विद्यार्थी, शिक्षक, परिवार और समाज के विभिन्न वर्ग एक साथ ‘वन्दे मातरम्’ का सामूहिक गायन करेंगे, तो यह केवल अतीत की स्मृति नहीं होगी। यह पुणे की उसी सार्वजनिक चेतना से संवाद का एक नया अवसर भी होगा।
सामूहिक गायन की अपनी विशिष्ट मनोवैज्ञानिक और सामाजिक शक्ति होती है। अकेला व्यक्ति जब कोई गीत गाता है तो वह उसकी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति होती है, लेकिन हजारों कंठ एक साथ वही स्वर उठाते हैं तो वह सामूहिक अनुभूति बन जाती है।
25 सितंबर को जब देश के विभिन्न हिस्सों में विद्यार्थी, शिक्षक, परिवार और नागरिक एक साथ ‘वन्दे मातरम्’ का गायन करेंगे, तब यह आयोजन पीढ़ियों को जोड़ने वाला अवसर बन सकता है। नई पीढ़ी उस गीत को केवल पाठ्यपुस्तक में पढ़ने के बजाय उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ से परिचित होगी।
विशेषकर बच्चों और युवाओं के लिए यह समझना आवश्यक है कि राष्ट्रप्रेम केवल किसी विशेष अवसर पर व्यक्त की जाने वाली भावना नहीं है। यह अपने दैनिक जीवन में जिम्मेदारी निभाने से भी प्रकट होता है—ईमानदारी से कार्य करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रहना, समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदना रखना और देश के विकास में अपना योगदान देना भी राष्ट्रसेवा के ही रूप हैं।
‘वन्दे मातरम्’ का मूल भाव मातृभूमि की वंदना है। भारतीय संस्कृति में ‘माँ’ शब्द केवल संबंध नहीं, बल्कि संरक्षण, त्याग, ममता और कृतज्ञता का प्रतीक है।
जब हम भारत को ‘माता’ कहते हैं तो उसके साथ हमारा संबंध केवल अधिकार का नहीं, दायित्व का भी बनता है। जिस भूमि से हमें जीवन, अन्न, जल और पहचान मिलती है, उसके प्रति कृतज्ञता स्वाभाविक है।
इसलिए ‘वन्दे मातरम्’ का सामूहिक गायन तभी सार्थक होगा, जब गीत के साथ उससे जुड़े दायित्व का भाव भी हमारे जीवन में उतरे।
आज भारत तेजी से बदल रहा है। तकनीक, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में नई संभावनाएं सामने आ रही हैं। साथ ही परिवार, पर्यावरण, सामाजिक समरसता, नागरिक अनुशासन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास जैसे विषय भी हमारे सामने हैं। ऐसे समय में ‘वन्दे मातरम्’ हमें विकास के साथ अपनी जड़ों और जिम्मेदारियों को याद रखने की प्रेरणा देता है।
‘वन्दे मातरम्’ की सबसे बड़ी शक्ति उसकी राष्ट्रीय स्मृति में निहित है। इसे किसी एक क्षेत्र, भाषा या पीढ़ी तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। स्वतंत्रता आंदोलन के लंबे दौर में यह विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की भावनाओं से जुड़ा।
आज भी इसका सामूहिक गायन समाज में संवाद और सहभागिता का अवसर बन सकता है। ‘नमामि भारतम्’ की सार्थकता इसी में है कि इसमें विद्यालयों से लेकर परिवारों तक और युवा पीढ़ी से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक सभी की भागीदारी हो।
‘वन्दे मातरम्’ के 150 वर्ष हमें इतिहास की ओर देखने के साथ भविष्य की ओर बढ़ने का अवसर भी देते हैं। स्वतंत्रता सेनानियों ने जिस भारत के लिए संघर्ष किया, वह केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का भारत नहीं था। वह ऐसा भारत था, जिसमें आत्मसम्मान, स्वावलंबन और सामाजिक एकता हो।
आज स्वतंत्र भारत की नई पीढ़ी के सामने चुनौती अलग है। उसे अपने ज्ञान, कौशल, श्रम और नवाचार के माध्यम से भारत को आगे बढ़ाना है। इसलिए ‘वन्दे मातरम्’ का आज का अर्थ यह भी है कि हम अपने-अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता और ईमानदारी के साथ राष्ट्र के लिए योगदान दें।
‘नमामि भारतम्’ का सामूहिक गायन इस दिशा में एक प्रतीकात्मक किंतु प्रभावशाली अवसर बन सकता है।
देशभर से उठने वाला ‘वन्दे मातरम्’ का स्वर केवल कुछ विद्यालयों तक सीमित न रहे—वह घरों, विद्यालयों, महाविद्यालयों और समाज के बीच राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता और उत्तरदायित्व का संवाद बने, यही इस आयोजन की वास्तविक सफलता होगी।
‘वन्दे मातरम्’ ने कभी स्वतंत्रता के संघर्ष को स्वर दिया था। आज वही स्वर स्वतंत्र भारत में कर्तव्य, कृतज्ञता और राष्ट्रनिर्माण की प्रेरणा बन सकता है।
25 सितंबर का ‘नमामि भारतम्’ केवल एक दिन का सामूहिक गायन न बने। यह अवसर हमें अपने बच्चों को इतिहास बताने, परिवार में राष्ट्र और समाज पर संवाद करने तथा अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे नागरिक दायित्वों को अपनाने की प्रेरणा दे।
क्योंकि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता। राष्ट्र बनता है नागरिकों की चेतना से, उनके चरित्र से, उनके परिश्रम से और मातृभूमि के प्रति उनके दायित्वबोध से।
25 सितंबर को जब देश के करोड़ों कंठ एक साथ गूंजेंगे—
“वन्दे मातरम्!”
तो वह केवल अतीत का स्मरण नहीं होगा। वह वर्तमान की चेतना और भविष्य के भारत के लिए एक सामूहिक संकल्प का स्वर भी होगा।