(दिव्य राष्ट्र के लिए लेखराम विश्नोई जोधपुर)
भारत की सांस्कृतिक विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में लोककला, लोकसंगीत और लोकभाषाएँ हमारी परंपराओं को जीवंत बनाए रखती हैं। इन अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित और लोकप्रिय बनाने में अनेक लोक कलाकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ऐसी ही एक महान लोकगायिका थीं दीवालीबेन पुंजभाई भील, जिन्होंने अपने मधुर स्वर और लोकसंगीत साधना के माध्यम से गुजरात की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया।
दीवालीबेन भील का जन्म 2 जून 1943 को गुजरात के एक साधारण भील परिवार में हुआ था। आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने लोकसंगीत को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। उनकी गायिकी में गुजरात की मिट्टी की सुगंध, लोकजीवन की सरलता और जनभावनाओं की सहज अभिव्यक्ति दिखाई देती थी। उन्होंने गरबा, लोकगीत, भजन और गुजराती फिल्मों के गीतों के माध्यम से लाखों लोगों के हृदय में विशेष स्थान बनाया।
भारत में लोकसंगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज की स्मृतियों, परंपराओं और जीवन मूल्यों का संवाहक भी है। दीवालीबेन ने अपने गायन से इस सांस्कृतिक परंपरा को नई पीढ़ियों तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके गीतों में ग्रामीण जीवन, प्रकृति, सामाजिक संबंधों और आध्यात्मिक भावनाओं का सुंदर चित्रण मिलता है। यही कारण है कि उनके द्वारा गाए गए अनेक गीत आज भी गुजरात के गाँवों और शहरों में समान रूप से लोकप्रिय हैं।
दीवालीबेन का योगदान केवल गुजरात तक सीमित नहीं था। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भारत की लोक परंपराएँ हमारी राष्ट्रीय एकता की आधारशिला हैं। विविध भाषाओं और संस्कृतियों के बीच लोककला एक ऐसा सेतु है जो पूरे देश को भावनात्मक रूप से जोड़ता है। उनकी कला ने यह संदेश दिया कि जनजातीय और लोक समुदायों की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ भी राष्ट्रीय विरासत का अभिन्न अंग हैं और उन्हें समान सम्मान मिलना चाहिए।
उनकी लोकसंगीत साधना और सांस्कृतिक योगदान को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1990 में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया। यह सम्मान केवल एक कलाकार की उपलब्धि नहीं था, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति और जनजातीय कला परंपराओं के प्रति राष्ट्र की श्रद्धा का भी प्रतीक था। यह गौरव उन असंख्य लोक कलाकारों के लिए प्रेरणा बना जो सीमित संसाधनों में भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का कार्य कर रहे हैं।
19 मई 2016 को दीवालीबेन का निधन हो गया, किंतु उनकी आवाज़ आज भी लोकसंगीत प्रेमियों के बीच जीवित है। उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि राष्ट्र की सांस्कृतिक शक्ति केवल बड़े मंचों और महानगरों में नहीं, बल्कि गाँवों, जनजातीय समाजों और लोक परंपराओं में भी निहित है।
दीवालीबेन पुंजभाई भील भारतीय लोकसंस्कृति की ऐसी स्वर साधिका थीं, जिन्होंने अपने गीतों के माध्यम से लोकजीवन की आत्मा को अभिव्यक्ति दी। उनका योगदान भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, लोकपरंपराओं के संरक्षण और राष्ट्रीय एकात्मता की भावना को सुदृढ़ करने वाली अमूल्य धरोहर के रूप में सदैव स्मरणीय रहेगा।
लेखाराम बिश्नोई
लेखक व विचारक