(दिव्य राष्ट्र के लिए सुनील कुमार चाष्टा सलूम्बर)
मानसून को रुठे हुए सप्ताह से अधिक समय हो चुका है और आषाढ़ का आधा महीना भी निकल गया है, लेकिन अब तक जितनी बारिश होनी चाहिए थी वह नहीं हुई है । ऐसे में जब बादल मेहरबान नहीं होते तो सदियों पुरानी लोक परंपराएं फिर जीवंत हो उठती हैं। कहीं खुले मैदान में दाल-बाटी-चूरमे की सामूहिक महाप्रसादी होती है, कहीं महिलाएं मंगल गीतों के साथ इंद्रदेव से वर्षा की प्रार्थना करती हैं, तो कहीं मेंढक-मेंढकी का विवाह रचाकर प्रकृति से मेहरबानी की गुहार लगाई जाती है। इन दिनों भी यही परंपराएं फिर से निभाई जाने लगी हैं। ग्रामीण भारत में बारिश केवल एक मौसम नहीं, बल्कि जीवन और आजीविका का आधार है। जब मानसून में देरी होती है या सूखा पड़ने की स्थिति बनती है, तो ग्रामीण समाज में इंद्र देव और प्रकृति को प्रसन्न करने के लिए सदियों पुरानी पारंपरिक प्रथाएं और अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं।बारिश की कामना के लिए मनाई जाने वाली इस परंपरा को मुख्य रूप से उज्जैनी या उजमनी कहा जाता है, जो मध्य प्रदेश और राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में बहुत लोकप्रिय है।
इनमें उज्जैनी या ओजनी एक बेहद अनूठी और महत्वपूर्ण प्रथा है
यह प्रथा मुख्य रूप से मध्य प्रदेश , राजस्थान और महाराष्ट्र के कुछ ग्रामीण हिस्सों में प्रचलित है।
उज्जैनी के दिन पूरे गांव के लोग अपने घरों में ताला लगा देते हैं। उस दिन घर के चूल्हे नहीं जलते। गांव के सभी बच्चे, बूढ़े, महिलाएं अपने मवेशियों और खाने-पीने के राशन के साथ गांव की सीमा से बाहर किसी मंदिर, नदी के किनारे या देव-स्थान पर चले जाते हैं।
और गांव की सीमा के बाहर, पेड़ों की छांव में लोग मिट्टी के अस्थायी चूल्हे बनाते हैं और सामूहिक रूप से भोजन जैसे बाटी, चूरमा, दाल पकाते हैं।सबसे पहले वहां स्थित स्थानीय देवता या इंद्र देव की पूजा की जाती है, उन्हें भोग लगाया जाता है, और फिर पूरा गांव एक साथ बैठकर भोजन करता है।
माना जाता है कि जब इंसान प्रकृति की गोद में जाकर पूरी श्रद्धा से प्रार्थना करता है, तो भगवान पिघलते हैं। इसे एक तरह से “प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने” और “इंद्र देव को मनाने” का उत्सव माना जाता है। शाम को पूजा संपन्न होने के बाद ही लोग गांव लौटते हैं।
ग्रामीण जगत में उज्जैनी के अलावा भी देश के अलग-अलग हिस्सों में कई तरह के टोटके, अनुष्ठान और प्रथाएं निभाई जाती हैं जैसे मेंढक-मेंढकी का विवाह चूंकि मेंढक का सीधा संबंध बारिश और पानी से माना जाता है, इसलिए ग्रामीण दो मेंढकों को पकड़कर उन्हें दूल्हा-दुल्हन की तरह सजाते हैं। वैदिक मंत्रोच्चार और ढोल-नगाड़ों के साथ उनकी शादी कराई जाती है। इसके बाद उन्हें जलाशय में छोड़ दिया जाता है ताकि उनकी आवाज सुनकर इंद्र देव बारिश कर दें। इक और प्रथा बच्चों द्वारा काल मेघा या कळसा की टोली इसमें छोटे बच्चों की एक टोली कीचड़ में लथपथ होकर घर-घर जाती है। वे गाते हैं— “काले मेघा पानी दे, गगरी फूटी बैल प्यासा…”। ग्रामीण महिलाएं इन बच्चों के ऊपर घड़े से पानी डालती हैं और उन्हें अनाज या पैसे दान करती हैं। मान्यता है कि बच्चों की मासूम पुकार ईश्वर जल्दी सुनते हैं।
रामायण कालीन परंपरा अनुसार इक और प्रथा जिसमें हल जोतती महिलाएं दिखती है मान्यताओं के अनुसार, त्रेतायुग में राजा जनक ने सूखा पड़ने पर खुद हल चलाया था, जिससे माता सीता का प्राकट्य हुआ और भारी वर्षा हुई। इसी तर्ज पर, कई गांवों में रात के समय महिलाएं खेतों में जाकर प्रतीकात्मक रूप से हल चलाती हैं और बारिश के लोकगीत गाती हैं। बारिश की कामना हेतु इंद्र देव की विशेष पूजा और यज्ञ किए जाते हैं।गांवों के मुख्य मंदिरों में पंडितों द्वारा ‘पर्जन्य यज्ञ’ या इंद्र देव का विशेष अनुष्ठान कराया जाता है। इसके अलावा, कई जगहों पर शिव जी के शिवलिंग को पूरा पानी में डुबोकर रखा जाता है अर्थात् जलधारा अनुष्ठान किया जाता है ताकि वे जगत को शीतलता प्रदान करें और बारिश हो। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भले ही इन प्रथाओं का सीधा संबंध बारिश से न हो, लेकिन ग्रामीण समाज में इनका गहरा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक महत्व है ।यह
सामूहिक एकता व समरसता का परिचायक हैं। संकट के समय पूरा गांव बिना किसी जाति या वर्ग भेद के एक साथ आता है और सामूहिक भोज करता हैं। सूखे की चिंता से जूझ रहे किसानों को ये अनुष्ठान एक सकारात्मक उम्मीद और मानसिक ढांढस बंधाते हैं।
ये प्रथाएं याद दिलाती हैं कि मनुष्य का अस्तित्व पूरी तरह प्रकृति और पंचभूतों पर निर्भर है।
अजब-गजब लोक टोटके जैसे गधों की पूजा या हल उलटना मेवाड़ और उससे सटे मालवा-वागड़ के कुछ अंदरूनी ग्रामीण अंचलों में कुछ बेहद अजीबोगरीब टोटके भी आजमाए जाते हैं।गधों से जुड़ा टोटका इसमें कई बार बारिश की कामना के लिए गधों को श्मशान ले जाकर विशेष पूजा की जाती है या उन्हें हल में जोतने का स्वांग रचा जाता है। मेवाड़ के गांवों में ये परंपराएं अंधविश्वास से ज्यादा सामुदायिक सद्भाव और प्रकृति के साथ जुड़ाव का माध्यम हैं, जहां पूरा गांव अपने मतभेद भुलाकर एक स्वर में प्रकृति से दुआ मांगता है।